{"_id":"5e35d55f8ebc3e4b4c439acf","slug":"mentallly-challenged-son-shahjahanpur-news-bly3942308100","type":"story","status":"publish","title_hn":"मानसिक मंदित बेटे को जंजीरों में कैद करने को मजबूर हैं मां-बाप, मदद की दरकार","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
मानसिक मंदित बेटे को जंजीरों में कैद करने को मजबूर हैं मां-बाप, मदद की दरकार
विज्ञापन
शाहजहांपुर। हर माता-पिता की इच्छा होती है कि वह अपने बच्चों को बेहतर सुख सुविधा दे, लेकिन सदर तहसील के सिमरिया सहसपुर गांव में एक माता-पिता ने अपने ही बेटे को जंजीरों से जकड़ रखा है।
यह मामला सिमरिया सहसपुर का है। चार साल पहले यहां रहने वाले एक मजदूर का 16 वर्षीय बेटा बीमारी की गिरफ्त में आ गया था। माता-पिता ने उसका काफी इलाज कराया, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ और धीरे-धीरे उसकी बीमारी बढ़ती चली गई। समय बीतने के साथ ही वह मानसिक संतुलन खो बैठा और राह चलते लोगों पर अक्सर हमलावर होने लगा। उसके पिता का कहना है कि बेटे को लेकर लोगों की शिकायतें भी काफी बढ़ गईं। समस्या समझने के बजाय कई बार लोग विवाद पर आमादा होने लगे। कोई रास्ता न देख उन्हें बेटे को मजबूरन जंजीरों से जकड़ना पड़ा। मगर बेटे की हर ख्वाहिश पूरी करते हैं।
सरकारी योजनाओं को नहीं मिला लाभ
लड़के के पिता का कहना है कि उन्हें सरकारी मदद के नाम पर कुछ भी नहीं मिला। मजदूरी कर परिवार चलाने के साथ ही जितना हो सका बेटे के लिए किया। जब इलाज का खर्च और कोई उम्मीद नहीं बची तो अब थक कर बैठ गए हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन
यह मामला सिमरिया सहसपुर का है। चार साल पहले यहां रहने वाले एक मजदूर का 16 वर्षीय बेटा बीमारी की गिरफ्त में आ गया था। माता-पिता ने उसका काफी इलाज कराया, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ और धीरे-धीरे उसकी बीमारी बढ़ती चली गई। समय बीतने के साथ ही वह मानसिक संतुलन खो बैठा और राह चलते लोगों पर अक्सर हमलावर होने लगा। उसके पिता का कहना है कि बेटे को लेकर लोगों की शिकायतें भी काफी बढ़ गईं। समस्या समझने के बजाय कई बार लोग विवाद पर आमादा होने लगे। कोई रास्ता न देख उन्हें बेटे को मजबूरन जंजीरों से जकड़ना पड़ा। मगर बेटे की हर ख्वाहिश पूरी करते हैं।
विज्ञापन
सरकारी योजनाओं को नहीं मिला लाभ
लड़के के पिता का कहना है कि उन्हें सरकारी मदद के नाम पर कुछ भी नहीं मिला। मजदूरी कर परिवार चलाने के साथ ही जितना हो सका बेटे के लिए किया। जब इलाज का खर्च और कोई उम्मीद नहीं बची तो अब थक कर बैठ गए हैं।
विज्ञापन