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23 साल से वीरान लोको स्टीम शेड के बहुरेंगे दिन
ब्यूरो/शाहजहांपुर
Updated Wed, 24 Aug 2016 11:38 PM IST
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23 साल से वीरान लोको स्टीम शेड के बहुरेंगे दिन
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250 डीजल इंजनों की मरम्मत क्षमता वाली रोजा जंक्शन की लोको वर्कशाप को इलेक्ट्रिक शेड में बदलने के लिए उत्तर रेलवे के अपर मंडल रेल प्रबंधक राजीव मिश्रा मुरादाबाद से बुधवार सुबह किसान एक्सप्रेस से यहां पहुंचे। उनके साथ इलेक्ट्रिक शेड बनाने के लिए चयनित अमेरिका की जी कंपनी के इंजीनियर्स की टीम भी यहां पहुंची। एडीआरएम ने इंजीनियर्स के साथ प्रस्तावित निर्माण स्थल और दुर्घटना राहत ट्रेन समेत दोनों स्टेशनों पर अन्य व्यवस्थाओं का भी निरीक्षण भी किया है।
बता दें कि उत्तर रेलवे में रनिंग मूवमेंट के समय उचित रख-रखाव के कारण डीजल इंजन फेल होने के कई मामले सामने आये हैं। ऐसे इंजनों की तकनीकी कमियों को दूर करने के लिए लखनऊ और गाजियाबाद में लोको वर्कशाप है। उधर, रेलवे लाइनों का इलेक्ट्रिफिकेशन होने के बाद बिजली से चलने वाले इंजनों की मरम्मत के लिए रोजा लोको शेड को इलेक्ट्रिक शेड में कनवर्ट करने का रेलवे के उच्चाधिकारियों ने निर्णय किया। इसी काम की शुरुआत कराने के लिए एडीआरएम यहां पहुंचे।
उन्होंने सड़क मार्ग से सीनियर डीईएम जितेंद्र सिंह और सीनियर डीईई आशीष कुमार और जी कंपनी के इंजीनियरों के साथ रोजा पहुंचकर कार्यवाहक लोको प्रभारी ध्रुव शुक्ला सीनियर, क्र्यू कंट्रोलर मनोज सिंह एआरटी प्रभारी रवि कुमार को साथ लिया और निरीक्षण पर निकले। निर्माण तकनीक के बारे में जी कंपनी के इंजीनियरों के साथ काफी देर तक माथा मच्ची करते रहे। दोपहर बाद एडीआरएम का काफिला स्टेशन पर एआरटी को चेक करने पहुंच गया। सब कुछ ओके पाए जाने पर दोपहर बाद करीब चार बजे अधिकारियों का दल शाहजहांपुर पहुंचा और वहां प्लेटफार्म समेत फर्स्ट क्लास रिटायरिंग रूम में यात्री सुविधाओं का जायजा लिया।
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युद्ध के दौरान लोको शेड की सराहनीय भूमिका
कहते हैं कि घूरे के दिन भी बारह साल बाद बहुरते हैं, लेकिन यहां के स्टीम शेड के दिन बहुरने में 23 साल का लंबा वक्त लग गया। बता दें कि अंग्रेजों ने बेहतर संचालन के लिए रोजा जैसी सुनसान जगह में 1945 में स्टीम शेड बनाकर इलाके में रौनक पैदा कर दी थी, जिसने 1962 के चीन युद्ध, 1965 और 1971 में पाकिस्तान से हुए युद्ध के दौरान सराहनीय भूमिका निभाते हुए भारतीय सेनाओं को ओर से छोर तक भेजने का काम किया था, लेकिन प्रशासनिक और राजनीतिक अदूरदर्शिता से 1993 में यहां के स्टीम शेड को बंद कर दिया गया था, तब से करीब 150 एकड़ में फैला यहां रेलवे शेड श्मशान की स्थिति में पहुंच गया, कार्यरत रेलकर्मियों की कैटेगरी चेंज कर अन्य स्थानों में समायोजित कर दिया गया तब से यह खंडहर में तब्दील हो चुका है। अब रेलवे ने यहां इलेक्ट्रिक शेड बनाने का फैसला लिया है तो इलाके के लोग इसे क्षेत्र के लिये एक बड़ी उपलब्धि मान रहे हैं।
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बता दें कि उत्तर रेलवे में रनिंग मूवमेंट के समय उचित रख-रखाव के कारण डीजल इंजन फेल होने के कई मामले सामने आये हैं। ऐसे इंजनों की तकनीकी कमियों को दूर करने के लिए लखनऊ और गाजियाबाद में लोको वर्कशाप है। उधर, रेलवे लाइनों का इलेक्ट्रिफिकेशन होने के बाद बिजली से चलने वाले इंजनों की मरम्मत के लिए रोजा लोको शेड को इलेक्ट्रिक शेड में कनवर्ट करने का रेलवे के उच्चाधिकारियों ने निर्णय किया। इसी काम की शुरुआत कराने के लिए एडीआरएम यहां पहुंचे।
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उन्होंने सड़क मार्ग से सीनियर डीईएम जितेंद्र सिंह और सीनियर डीईई आशीष कुमार और जी कंपनी के इंजीनियरों के साथ रोजा पहुंचकर कार्यवाहक लोको प्रभारी ध्रुव शुक्ला सीनियर, क्र्यू कंट्रोलर मनोज सिंह एआरटी प्रभारी रवि कुमार को साथ लिया और निरीक्षण पर निकले। निर्माण तकनीक के बारे में जी कंपनी के इंजीनियरों के साथ काफी देर तक माथा मच्ची करते रहे। दोपहर बाद एडीआरएम का काफिला स्टेशन पर एआरटी को चेक करने पहुंच गया। सब कुछ ओके पाए जाने पर दोपहर बाद करीब चार बजे अधिकारियों का दल शाहजहांपुर पहुंचा और वहां प्लेटफार्म समेत फर्स्ट क्लास रिटायरिंग रूम में यात्री सुविधाओं का जायजा लिया।
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युद्ध के दौरान लोको शेड की सराहनीय भूमिका
कहते हैं कि घूरे के दिन भी बारह साल बाद बहुरते हैं, लेकिन यहां के स्टीम शेड के दिन बहुरने में 23 साल का लंबा वक्त लग गया। बता दें कि अंग्रेजों ने बेहतर संचालन के लिए रोजा जैसी सुनसान जगह में 1945 में स्टीम शेड बनाकर इलाके में रौनक पैदा कर दी थी, जिसने 1962 के चीन युद्ध, 1965 और 1971 में पाकिस्तान से हुए युद्ध के दौरान सराहनीय भूमिका निभाते हुए भारतीय सेनाओं को ओर से छोर तक भेजने का काम किया था, लेकिन प्रशासनिक और राजनीतिक अदूरदर्शिता से 1993 में यहां के स्टीम शेड को बंद कर दिया गया था, तब से करीब 150 एकड़ में फैला यहां रेलवे शेड श्मशान की स्थिति में पहुंच गया, कार्यरत रेलकर्मियों की कैटेगरी चेंज कर अन्य स्थानों में समायोजित कर दिया गया तब से यह खंडहर में तब्दील हो चुका है। अब रेलवे ने यहां इलेक्ट्रिक शेड बनाने का फैसला लिया है तो इलाके के लोग इसे क्षेत्र के लिये एक बड़ी उपलब्धि मान रहे हैं।