रोडवेज बसों में खतरे में जान, बेबस है मुसाफिर 

अमर उजाला ब्यूरो, शाहजहांपुर Updated Mon, 05 Jun 2017 11:57 PM IST
रोडवेज बस
रोडवेज बस - फोटो : शाहजहांपुर ब्यूरो
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रोडवेज बस पर यात्रा सबसे सुरक्षित मानी जाती है, लेकिन बरेली में रविवार रात हुए हादसे के बाद बस में सुरक्षित सफर अब एक सपना सरीखा लगने लगा है। डिपो की जर्जर हो चुकी बसों में न तो सुरक्षा मानकों पर ध्यान रखा जा रहा है, न ही यात्री सुविधाओं की ओर विभाग का जोर है। जिले की डिपो में भी हालात इससे जुदा नहीं है। कौन सी बस कहां दगा दे जाए, कुछ नहीं कहा जा सकता। खटारा बसें और उनमें जर्जर सीटें, खिड़कियों से गायब शीशों के कारण अंदर आती धूूल, इतनी तकलीफें झेलने के बाद भी मुसाफिर बेबस होकर सफर करने को मजबूर हैं। 
जिले की पांच तहसीलों और 15 ब्लॉक को जोड़ने वाली शाहजहांपुर की सड़कों पर परिवहन निगम की 109 बसें दौड़ती हैं। यात्रियों की संख्या अधिक होने के कारण निगम ने 78 बसों को अनुबंध पर ले रखा है। इन बसों से शाहजहांपुर डिपो को प्रति माह लगभग 18 से 20 लाख रुपये की आमदनी होती है। इसके बावजूद डिपो यात्रियों की सुरक्षा के प्रति लापरवाह है। डिपो की लगभग 28 बसें ऐसी हैं, जिनकी मियाद पूरी हो चुकी है, फिर भी उन्हें डिपो की ओर से चलाया जा रहा है। खटारा हो चुकीं अधिकांश बसों में न तो आग से बचाव का कोई उपकरण लगा है और न ही फर्स्ट एड बॉक्स, ताकि यात्री को चोट लगने पर उन्हें प्राथमिक उपचार दिया जा सके। इमरजेंसी खिड़की तो मानों कभी खोली ही नहीं गई। कभी यह देखने की जरूरत महसूस नहीं की जाती कि इमरजेंसी खिड़की जाम तो नहीं हो गई है। हालत यह है कि डिपो से निकलने के बाद बस गंतव्य तक पहुंच भी पाएगी या नहीं इस बात की गारंटी कोई नहीं है। वर्कशॉप में चार से पांच बसें हर रोज केवल मरम्मत के लिए ही खड़ी रहती हैं।  
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लोकल रूट बसों की नहीं होती सफाई
स्वच्छ भारत-स्वस्थ भारत की पहल की भी रोडवेज बसें धज्जियां उड़ा रहीं हैं। बस के अंदर फैली गंदगी से जाहिर होता है कि इन बसों के अंदर महीनों से सफाई नहीं की है। इसके पीछे एक कारण यह भी है कि जब बसों की खिड़कियों में शीशे नहीं हैं तो सफाई के बाद कुछ किलोमीटर चलने पर खुद व खुद गंदगी अंदर आ जाएगी।
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मेंटीनेंस के नाम पर होता है खेल
रोडवेज बसों को दुरुस्त करने के लिए पुवायां रोड पर वर्कशॉप भी है। वर्कशॉप में मौजूद कर्मचारी से लेकर चालक और परिचालक मेंटीनेंस के नाम पर निगम को हजारों रुपये का चूना लगाते हैं। इसके साथ ही वाहनों से भी खिलवाड़ करते हैं। इसी कारण कुछ चालकों की वर्कशॉप कर्मचारियों से अनबन रहती है और उन्हें बस में काम करवाने के लिए एआरएम या अन्य अधिकारियों से सिफारिश करानी पड़ती हैं।

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फैक्ट फाइल -
डिपो की बस -109
अनुबंधित बस -78
चालक -70 से 75 
परिचालक -120 
आमदनी 18-20 लाख
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कोट्स
लगभग सारी बसें दुरुस्त हैं, यदि किसी बस में कोई कमी होती भी है, तो उसे वर्कशॉप में भेजकर ठीक कराया जाता है।
- सुनील कुमार नागर, एआरएम

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