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कांवड़ यात्रा में भी ग्लैमर का तड़का
अमर उजाला ब्यूरो,शाहजहांपुर
Updated Thu, 13 Jul 2017 09:11 PM IST
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Kanwariya
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पहले घर पर ही बनती थी बांस की कांवर, अब बाजार में मिलती हैं आकर्षक कांवड़
सावन में चारों ओर फैली हरियाली और ठंडी हवा के झोंके के साथ रिमझिम फुहारों के बीच हर-हर बम-बम का उद्घोष महादेव के भक्तों को शांति और प्रसन्नता प्रदान करता है। भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए सावन के प्रथम सोमवार से शुरू हो चुकी कांवड़ यात्रा अनेकता में एकता का संदेश देती हुई पूरे वातावरण को शिवमय कर रही है। बदलते परिवेश में कांवड़ यात्रा का स्वरूप भी बदल गया है। पहले कांवड यात्रा में अपने पापों की मुक्ति और स्वर्ग प्राप्त करने की लालसा लिए सिर्फ पारिवारिक जिम्मेदारियों को पूरा कर चुके लोग ही नियम-संयम से कांवड़ लेने जाते थे, लेकिन अब कांवड़ यात्रा में युवाओं की संख्या अधिक होती है। डीजे की तेज धुनों पर शिव-पार्वती, शुक्र और शनि के स्वरूपों के साथ नृत्य करते चलते हैं। अति उत्साहित युवक अज्ञानता के चलते नशा करने से भी बाज नहीं आते।
पहले ऐसा था कांवड़ यात्रा का स्वरूप
कई बार कांवड़ लाकर भगवान शिव का जलाभिषेक कर चुके वृद्ध इंद्रमोहन वाजपेयी बताते हैं कि उनके समय में लोग पापों से मुक्ति और मोक्ष के लिए महादेव का ध्यान करते हुए गंगाजी से जल लेकर छोटी काशी गोला गोकर्णनाथ जाते थे। खाने के लिए घर से सत्तू और चना-चबेना लेकर चलते थे। एक कांवड़ के साथ दो लोग होते थे। यात्रा के दौरान जहां भी रात्रि विश्राम होता था, वहां क्रम से सोते थे। एक सोता था तो दूसरा अपने कंधे पर कांवड़ रखकर भगवान शिव का मनन करते हुए खड़ा रहता था। डीजे और लाउडस्पीकर की तो कतई परंपरा नहीं थी। भक्त समूह में खुद ही साखियां, भजन और दोहे गाते हुए जलते थे। उस वक्त की एक बहुत प्रसिद्ध सखी- ‘बबा बुलाओ दूर से, हम जानी कछु देय, पोटि-पाटि के जल लियो बाद में धक्का देय.. कि बोलो बम बम’।
कांवड यात्रा का बदलता स्वरूप
गांव चिलौआ निवासी सामाजिक कार्यकर्ता गुलाब चंद्र त्रिपाठी बताते है कि कांवड़ यात्रा में युवाओं की भागीदारी लगातार बढ़ रही है। यात्रा का स्वरूप भी युवाओं की भागीदारी से ही बदला है। युवा हमेशा कुछ नया करना चाहते हैं। दूसरे जत्थों से उनका ग्रुप अलग दिखे, इसके लिए वाहनों पर भारी तामझाम लेकर चलते हैं। अब एक कांवड़ के साथ दस-दस युवाओं का जत्था बाइक और कारों से चलता है। ट्रकों, ट्रैक्टर-ट्रालियों, डीसीएम आदि वाहनों डीजे साउंड सिस्टम की तेज धुनों पर शिव-पार्वती और उनके गणों के स्वरूपों के साथ जमकर डांस करते हैं। अब तो कांवडियों का ड्रेस कोड भी बन गया है।
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कांवड़ और शिव भक्त हुए फैशनेबुल
फर्रुखाबाद स्थित गंगातट पांचालघाट पर रेडीमेड कांवड़ बेचने वाले दुकानदार 70 वर्षीय रामलला बताते हैं कि पहले कांवड़ यात्री बांस के डंडे में दो टोकरियां बांध कर उसमें गंगाजली रखकर शिवधाम में जल चढ़ाने जाते थे। तब कांवड़ियों के पैरों में घुंघरू और कांवड़ में घंटी बंधी होती थी, जो सुनसान रातों की नीरवता को भंग करती थी लेकिन अब युवा रेडीमेड कांवड़ जिसमें रंगबिरंगे चमकदार फैंसी कपड़े, झंडियां, प्लास्टिक की फूलपत्ती और झालरें लगी होती हैं, ले जाना पसंद करते हैं।
सावन में चारों ओर फैली हरियाली और ठंडी हवा के झोंके के साथ रिमझिम फुहारों के बीच हर-हर बम-बम का उद्घोष महादेव के भक्तों को शांति और प्रसन्नता प्रदान करता है। भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए सावन के प्रथम सोमवार से शुरू हो चुकी कांवड़ यात्रा अनेकता में एकता का संदेश देती हुई पूरे वातावरण को शिवमय कर रही है। बदलते परिवेश में कांवड़ यात्रा का स्वरूप भी बदल गया है। पहले कांवड यात्रा में अपने पापों की मुक्ति और स्वर्ग प्राप्त करने की लालसा लिए सिर्फ पारिवारिक जिम्मेदारियों को पूरा कर चुके लोग ही नियम-संयम से कांवड़ लेने जाते थे, लेकिन अब कांवड़ यात्रा में युवाओं की संख्या अधिक होती है। डीजे की तेज धुनों पर शिव-पार्वती, शुक्र और शनि के स्वरूपों के साथ नृत्य करते चलते हैं। अति उत्साहित युवक अज्ञानता के चलते नशा करने से भी बाज नहीं आते।
पहले ऐसा था कांवड़ यात्रा का स्वरूप
कई बार कांवड़ लाकर भगवान शिव का जलाभिषेक कर चुके वृद्ध इंद्रमोहन वाजपेयी बताते हैं कि उनके समय में लोग पापों से मुक्ति और मोक्ष के लिए महादेव का ध्यान करते हुए गंगाजी से जल लेकर छोटी काशी गोला गोकर्णनाथ जाते थे। खाने के लिए घर से सत्तू और चना-चबेना लेकर चलते थे। एक कांवड़ के साथ दो लोग होते थे। यात्रा के दौरान जहां भी रात्रि विश्राम होता था, वहां क्रम से सोते थे। एक सोता था तो दूसरा अपने कंधे पर कांवड़ रखकर भगवान शिव का मनन करते हुए खड़ा रहता था। डीजे और लाउडस्पीकर की तो कतई परंपरा नहीं थी। भक्त समूह में खुद ही साखियां, भजन और दोहे गाते हुए जलते थे। उस वक्त की एक बहुत प्रसिद्ध सखी- ‘बबा बुलाओ दूर से, हम जानी कछु देय, पोटि-पाटि के जल लियो बाद में धक्का देय.. कि बोलो बम बम’।
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कांवड यात्रा का बदलता स्वरूप
गांव चिलौआ निवासी सामाजिक कार्यकर्ता गुलाब चंद्र त्रिपाठी बताते है कि कांवड़ यात्रा में युवाओं की भागीदारी लगातार बढ़ रही है। यात्रा का स्वरूप भी युवाओं की भागीदारी से ही बदला है। युवा हमेशा कुछ नया करना चाहते हैं। दूसरे जत्थों से उनका ग्रुप अलग दिखे, इसके लिए वाहनों पर भारी तामझाम लेकर चलते हैं। अब एक कांवड़ के साथ दस-दस युवाओं का जत्था बाइक और कारों से चलता है। ट्रकों, ट्रैक्टर-ट्रालियों, डीसीएम आदि वाहनों डीजे साउंड सिस्टम की तेज धुनों पर शिव-पार्वती और उनके गणों के स्वरूपों के साथ जमकर डांस करते हैं। अब तो कांवडियों का ड्रेस कोड भी बन गया है।
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कांवड़ और शिव भक्त हुए फैशनेबुल
फर्रुखाबाद स्थित गंगातट पांचालघाट पर रेडीमेड कांवड़ बेचने वाले दुकानदार 70 वर्षीय रामलला बताते हैं कि पहले कांवड़ यात्री बांस के डंडे में दो टोकरियां बांध कर उसमें गंगाजली रखकर शिवधाम में जल चढ़ाने जाते थे। तब कांवड़ियों के पैरों में घुंघरू और कांवड़ में घंटी बंधी होती थी, जो सुनसान रातों की नीरवता को भंग करती थी लेकिन अब युवा रेडीमेड कांवड़ जिसमें रंगबिरंगे चमकदार फैंसी कपड़े, झंडियां, प्लास्टिक की फूलपत्ती और झालरें लगी होती हैं, ले जाना पसंद करते हैं।