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Shahjahanpur News: निराशा के पलों में संवाद ही जीवन बचाने का सरल उपाय
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मनोचिकित्सक डॉ. अभिनव रस्तोगी। स्रोत: स्वयं
शाहजहांपुर। रोजा की दुर्गा एन्कलेव कॉलोनी में मासूम बच्चे और दंपती की मौत की घटना ने लोगों को झकझोर कर रख दिया है। घटनास्थल से मिले सुसाइड नोट में आर्थिक तंगी का जिक्र किया गया है। मनोचिकित्सक के मुताबिक, यह साफ संकेत है कि लगातार बढ़ता बोझ, असहायता और भविष्य की अनिश्चितता इंसान को भीतर तक तोड़ देती है।
जिला मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम के मनोचिकित्सक डॉ. अभिनव रस्तोगी का कहना है कि मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी कठिनाइयों को नजरअंदाज न करें। निराशा के पलों में संवाद ही जीवन बचाने का सबसे सरल उपाय है। अगर किसी परिचित को मदद की जरूरत है तो तुरंत आगे आएं। हम सबकी जिम्मेदारी है कि एक-दूसरे का सहारा बनें।
उनका कहना है कि आत्महत्या का कदम अचानक लिया गया निर्णय नहीं होता, बल्कि यह धीरे-धीरे बढ़ती हुई बेबसी और अब कोई रास्ता नहीं बचा, जैसी सोच का नतीजा होता है। मनोचिकित्सक का कहना है कि यह समझना जरूरी है कि हर समस्या का समाधान है। मदद शायद तुरंत न मिले, लेकिन वह हमेशा मौजूद होती है।
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डॉ. अभिनव रस्तोगी का कहना है कि कभी–कभी गहरी निराशा और तनाव में व्यक्ति इतना टूट जाता है कि वह अपने ही परिवार को भी इस कदम में शामिल कर लेता है। माता–पिता को लगता है कि बच्चों को भविष्य में गरीबी, बदनामी या दुख से बचाने का एक ही रास्ता है, उन्हें अपने साथ ले जाना। उनका कहना है कि गंभीर अवसाद या भ्रम की स्थिति में सोचने-समझने की क्षमता खत्म हो जाती है।
समाज की जिम्मेदारी
डॉ. अभिनव रस्तोगी ने बताया कि इस घटना से हमें यह भी सीख लेनी चाहिए कि हमें अपने आसपास के लोगों की भावनाओं को नज़रअंदाज नहीं करना चाहिए। अगर कोई व्यक्ति अचानक चुप रहने लगे, अकेला महसूस करने लगे या निराशाजनक बातें करने लगे तो उसे हल्के में न लें। संवेदनशील बातचीत और समय रहते की गई मदद एक जीवन बचा सकती है।
इसलिए होता है ऐसा
डॉ. अभिनव रस्तोगी के मुताबिक, जब कोई व्यक्ति खुद को मुश्किल हालात से घिरा हुआ महसूस करता है- खासतौर पर आर्थिक परेशानियों या निजी संघर्षों के बीच, तो वह धीरे-धीरे अकेला पड़ने लगता है। वह परिवार और दोस्तों से दूरी बना लेता है। भविष्य को लेकर घोर निराशा महसूस करने लगता है। छोटी-छोटी बातों पर भावनात्मक रूप से टूट जाता है। ये सभी संकेत बताते हैं कि व्यक्ति गहरे मानसिक तनाव से गुजर रहा है।
ऐसे बचा सकते हैं जीवन
1. अपनी बात कहें- अपने परिवार या दोस्त से दिल की बात साझा करें। बोझ बांटने से हल्का हो जाता है।
2. पेशेवर मदद लें- अगर लगातार दो हफ्तों से उदासी, नींद की समस्या, आत्महत्या के विचार या निराशा है, तो तुरंत किसी मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से संपर्क करें।
3. हेल्पलाइन का सहारा लें- टेली-मानस हेल्पलाइन 14416 पर गुप्त और निशुल्क मदद ले सकते हैं।
4. दिनचर्या और सेहत का ध्यान रखें- नियमित व्यायाम, योग, ध्यान और संतुलित भोजन मानसिक स्थिरता देते हैं।
5. खुद को दोष न दें- मुश्किलें स्थायी नहीं होतीं। मदद मांगना कमजोरी नहीं, बल्कि जीने का हौसला है।
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जिला मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम के मनोचिकित्सक डॉ. अभिनव रस्तोगी का कहना है कि मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी कठिनाइयों को नजरअंदाज न करें। निराशा के पलों में संवाद ही जीवन बचाने का सबसे सरल उपाय है। अगर किसी परिचित को मदद की जरूरत है तो तुरंत आगे आएं। हम सबकी जिम्मेदारी है कि एक-दूसरे का सहारा बनें।
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उनका कहना है कि आत्महत्या का कदम अचानक लिया गया निर्णय नहीं होता, बल्कि यह धीरे-धीरे बढ़ती हुई बेबसी और अब कोई रास्ता नहीं बचा, जैसी सोच का नतीजा होता है। मनोचिकित्सक का कहना है कि यह समझना जरूरी है कि हर समस्या का समाधान है। मदद शायद तुरंत न मिले, लेकिन वह हमेशा मौजूद होती है।
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डॉ. अभिनव रस्तोगी का कहना है कि कभी–कभी गहरी निराशा और तनाव में व्यक्ति इतना टूट जाता है कि वह अपने ही परिवार को भी इस कदम में शामिल कर लेता है। माता–पिता को लगता है कि बच्चों को भविष्य में गरीबी, बदनामी या दुख से बचाने का एक ही रास्ता है, उन्हें अपने साथ ले जाना। उनका कहना है कि गंभीर अवसाद या भ्रम की स्थिति में सोचने-समझने की क्षमता खत्म हो जाती है।
समाज की जिम्मेदारी
डॉ. अभिनव रस्तोगी ने बताया कि इस घटना से हमें यह भी सीख लेनी चाहिए कि हमें अपने आसपास के लोगों की भावनाओं को नज़रअंदाज नहीं करना चाहिए। अगर कोई व्यक्ति अचानक चुप रहने लगे, अकेला महसूस करने लगे या निराशाजनक बातें करने लगे तो उसे हल्के में न लें। संवेदनशील बातचीत और समय रहते की गई मदद एक जीवन बचा सकती है।
इसलिए होता है ऐसा
डॉ. अभिनव रस्तोगी के मुताबिक, जब कोई व्यक्ति खुद को मुश्किल हालात से घिरा हुआ महसूस करता है- खासतौर पर आर्थिक परेशानियों या निजी संघर्षों के बीच, तो वह धीरे-धीरे अकेला पड़ने लगता है। वह परिवार और दोस्तों से दूरी बना लेता है। भविष्य को लेकर घोर निराशा महसूस करने लगता है। छोटी-छोटी बातों पर भावनात्मक रूप से टूट जाता है। ये सभी संकेत बताते हैं कि व्यक्ति गहरे मानसिक तनाव से गुजर रहा है।
ऐसे बचा सकते हैं जीवन
1. अपनी बात कहें- अपने परिवार या दोस्त से दिल की बात साझा करें। बोझ बांटने से हल्का हो जाता है।
2. पेशेवर मदद लें- अगर लगातार दो हफ्तों से उदासी, नींद की समस्या, आत्महत्या के विचार या निराशा है, तो तुरंत किसी मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से संपर्क करें।
3. हेल्पलाइन का सहारा लें- टेली-मानस हेल्पलाइन 14416 पर गुप्त और निशुल्क मदद ले सकते हैं।
4. दिनचर्या और सेहत का ध्यान रखें- नियमित व्यायाम, योग, ध्यान और संतुलित भोजन मानसिक स्थिरता देते हैं।
5. खुद को दोष न दें- मुश्किलें स्थायी नहीं होतीं। मदद मांगना कमजोरी नहीं, बल्कि जीने का हौसला है।