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‘यदि आजाद नहीं होते तो हम आजाद नहीं होते’
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शाहजहांपुर। महान क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद की याद में प्रवाह साहित्यिक संस्था की ओर से खिरनी बाग में कवि गोष्ठी आयोजित की गई। इसका शुभारंभ कवि कुलदीप दीपक और कवयित्री सुमन पाठक ने सरस्वती वंदना से किया।
चंद्रशेखर आजाद का स्मरण करते हुए गीतकार कमल मानव ने कुछ यूं कहा, स्वाभिमान पानी वाले स्वर जिंदाबाद नहीं होते। मिल जाती पावन परंपरा सपने शाद नहीं होते। अपना सिर अपनी ही गोली स्वतंत्रता का यह जज्बा, यदि आजाद नहीं होते तो हम आजाद नहीं होते। कवि ज्ञानेंद्र मोहन ज्ञान ने सावन पर अपनी बात इस तरह कही, आज शाम जब बरसा सावन, भीगा अपना तन मन सारा। भ्रांति लिए बैठा हूं अब तक, सावन था या प्यार तुम्हारा। लोकगीतों के रचयिता विजय ठाकुर ने सामाजिक परिवेश में कहा, जाने कैसा स्वभाव है घर का। मेरे घर में अभाव है घर का। मेरे हिस्से में हार आई है, लड़ के देखा चुनाव है घर का।
अध्यक्षता करते हुए चंद्रशेखर दीक्षित ने सुनाया, बीज वीरों के जमीनों में उगाया चाहता हूं। मैं तुम्हारे स्वप्न को साकार करना चाहता हूं। कुलदीप दीपक ने अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति कुछ इस तरह की, जिंदगी अब नाम कर दी है तुम्हारे। प्राण भी अब सिर्फ तेरे ही सहारे। चाहते हो हम भरें ऊंची उड़ाने, छांटना मत हौसलों के पर हमारे। आक्रोश के कवि सुशील विचित्र ने अपने चिरपरिचित लहजे में कहा, कौन कहता है कमाल होता है। वहीं बेहूदा सवाल होना है। गर्दनों आरियों में भारी कर, गर्दनों को हलाल होना है।
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युवा कवि लालित्य पल्लव भारती, व्यंग्यकार उमेशचंद्र सिंह, डॉ. राजीव सिंह भारत, सुमन पाठक, संचालक डॉ. प्रशांत अग्निहोत्री आदि ने भी कविता पाठ किया। पूर्व में भाजपा नेता नवनीत पाठक, सुमन पाठक और चंद्रशेखर दीक्षित ने मां सरस्वती के चित्र के समक्ष दीप प्रज्ज्वलित किया। आयोजन में अमित गुप्ता, ताराचंद्र, सर्वेश कनौजिया बृजेश श्रीवास्तव का सहयोग रहा। पत्रकार अशोक गुप्ता ने सभी का आभार प्रकट किया।
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चंद्रशेखर आजाद का स्मरण करते हुए गीतकार कमल मानव ने कुछ यूं कहा, स्वाभिमान पानी वाले स्वर जिंदाबाद नहीं होते। मिल जाती पावन परंपरा सपने शाद नहीं होते। अपना सिर अपनी ही गोली स्वतंत्रता का यह जज्बा, यदि आजाद नहीं होते तो हम आजाद नहीं होते। कवि ज्ञानेंद्र मोहन ज्ञान ने सावन पर अपनी बात इस तरह कही, आज शाम जब बरसा सावन, भीगा अपना तन मन सारा। भ्रांति लिए बैठा हूं अब तक, सावन था या प्यार तुम्हारा। लोकगीतों के रचयिता विजय ठाकुर ने सामाजिक परिवेश में कहा, जाने कैसा स्वभाव है घर का। मेरे घर में अभाव है घर का। मेरे हिस्से में हार आई है, लड़ के देखा चुनाव है घर का।
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अध्यक्षता करते हुए चंद्रशेखर दीक्षित ने सुनाया, बीज वीरों के जमीनों में उगाया चाहता हूं। मैं तुम्हारे स्वप्न को साकार करना चाहता हूं। कुलदीप दीपक ने अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति कुछ इस तरह की, जिंदगी अब नाम कर दी है तुम्हारे। प्राण भी अब सिर्फ तेरे ही सहारे। चाहते हो हम भरें ऊंची उड़ाने, छांटना मत हौसलों के पर हमारे। आक्रोश के कवि सुशील विचित्र ने अपने चिरपरिचित लहजे में कहा, कौन कहता है कमाल होता है। वहीं बेहूदा सवाल होना है। गर्दनों आरियों में भारी कर, गर्दनों को हलाल होना है।
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युवा कवि लालित्य पल्लव भारती, व्यंग्यकार उमेशचंद्र सिंह, डॉ. राजीव सिंह भारत, सुमन पाठक, संचालक डॉ. प्रशांत अग्निहोत्री आदि ने भी कविता पाठ किया। पूर्व में भाजपा नेता नवनीत पाठक, सुमन पाठक और चंद्रशेखर दीक्षित ने मां सरस्वती के चित्र के समक्ष दीप प्रज्ज्वलित किया। आयोजन में अमित गुप्ता, ताराचंद्र, सर्वेश कनौजिया बृजेश श्रीवास्तव का सहयोग रहा। पत्रकार अशोक गुप्ता ने सभी का आभार प्रकट किया।