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जिला अस्पताल में नहीं हैं वेंटिलेटर, नवजात तोड़ रहे दम
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शाहजहांपुर। राजस्थान और गुजरात में नवजात बच्चों की मौत का मामला सामने आने के बाद जिले में नवजात बच्चों के स्वास्थ्य सुधार को लेकर सवाल खड़े होने लगे हैं। नवजात बच्चों के लिए जिला महिला अस्पताल में वेंटीलेटर की सुविधा भी नहीं है। लिहाजा अति गंभीर नवजात दम तोड़ रहे हैं। वेंटीलेटर की कमी की वजह से प्रति माह करीब 10 से 12 बच्चों की मौत हो जाती है। हालांकि इसमें अस्पताल स्टाफ खुद को दोषी नहीं मानता है।
जिला महिला अस्पताल में शून्य से 28 दिन के नवजात बच्चों के इलाज के लिए नवजात शिशु सघन चिकित्सा इकाई के तहत व्यवस्था की गई है। यहां नवजात के लिए 16 बेड डाले गए हैं। एक माह में करीब 150 से लेकर 185 तक नवजात भर्ती होते हैं। नवंबर माह में 182 नवजात बच्चों का इलाज हुआ और दिसंबर में 160 नवजात बच्चों का इलाज किया गया। नवजात बच्चों की उचित देखभाल और इलाज के लिए रखा गया स्टाफ अनुपात के हिसाब से कम है। बच्चों को उचित तापमान पर रखने के लिए रेडिएंट वार्मर और पीलिया की सिकाई की मशीनें तो लगा दी गईं लेकिन अति गंभीर बीमार नवजात बच्चों के लिए वेंटीलेटर और केंद्रीय आक्सीजन सप्लाई की व्यवस्था नहीं हैं। हालांकि आक्सीजन की आपूर्ति के लिए सिलिंडर से काम चलाया जा रहा है लेकिन वेंटीलेटर नहीं होने से सांस लेने में तकलीफ लेने वाले बच्चों को लखनऊ रेफर करना पड़ता है।
नवजात सघन चिकित्सा इकाई में सुविधाएं
16 बेड
16 रेडियंट वार्मर
6 पीलिया की सिकाई की मशीन
कैसे हो देखभाल, जब स्टाफ की कमी
नवजात सघन चिकित्सा इकाई में नवजातों की देखभाल व इलाज के लिए पांच डॉक्टरों के सापेक्ष मात्र तीन डॉक्टर हैं। इनमें डॉक्टर अशोक रस्तोगी, डॉ. केके वर्मा, डॉ. रंजीत दीक्षित की तैनाती है। डॉक्टर के दो पद रिक्त हैं। वहीं स्टाफ नर्स सोलह के सापेक्ष मात्र आठ कार्यरत हैं।
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अति गंभीर नवजात शिशु जो खुद से सांस नहीं ले पाते हैं, उनके लिए जरूरी वेंटीलेटर की व्यवस्था नहीं है। वेंटीलेटर चलाने के लिए प्रशिक्षित स्टाफ भी नहीं है। नवजात शिशु सघन चिकित्सा इकाई में केंद्रीय आक्सीजन सप्लाई की भी व्यवस्था अभी शुरू नहीं हो पाई है। इस कारण गंभीर बच्चों को लखनऊ रेफर किया जाता है। संसाधनों की कमी के लिए शासन से पत्राचार किया जा रहा है। - केके वर्मा, बाल रोग विशेषज्ञ
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जिला महिला अस्पताल में शून्य से 28 दिन के नवजात बच्चों के इलाज के लिए नवजात शिशु सघन चिकित्सा इकाई के तहत व्यवस्था की गई है। यहां नवजात के लिए 16 बेड डाले गए हैं। एक माह में करीब 150 से लेकर 185 तक नवजात भर्ती होते हैं। नवंबर माह में 182 नवजात बच्चों का इलाज हुआ और दिसंबर में 160 नवजात बच्चों का इलाज किया गया। नवजात बच्चों की उचित देखभाल और इलाज के लिए रखा गया स्टाफ अनुपात के हिसाब से कम है। बच्चों को उचित तापमान पर रखने के लिए रेडिएंट वार्मर और पीलिया की सिकाई की मशीनें तो लगा दी गईं लेकिन अति गंभीर बीमार नवजात बच्चों के लिए वेंटीलेटर और केंद्रीय आक्सीजन सप्लाई की व्यवस्था नहीं हैं। हालांकि आक्सीजन की आपूर्ति के लिए सिलिंडर से काम चलाया जा रहा है लेकिन वेंटीलेटर नहीं होने से सांस लेने में तकलीफ लेने वाले बच्चों को लखनऊ रेफर करना पड़ता है।
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नवजात सघन चिकित्सा इकाई में सुविधाएं
16 बेड
16 रेडियंट वार्मर
6 पीलिया की सिकाई की मशीन
कैसे हो देखभाल, जब स्टाफ की कमी
नवजात सघन चिकित्सा इकाई में नवजातों की देखभाल व इलाज के लिए पांच डॉक्टरों के सापेक्ष मात्र तीन डॉक्टर हैं। इनमें डॉक्टर अशोक रस्तोगी, डॉ. केके वर्मा, डॉ. रंजीत दीक्षित की तैनाती है। डॉक्टर के दो पद रिक्त हैं। वहीं स्टाफ नर्स सोलह के सापेक्ष मात्र आठ कार्यरत हैं।
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अति गंभीर नवजात शिशु जो खुद से सांस नहीं ले पाते हैं, उनके लिए जरूरी वेंटीलेटर की व्यवस्था नहीं है। वेंटीलेटर चलाने के लिए प्रशिक्षित स्टाफ भी नहीं है। नवजात शिशु सघन चिकित्सा इकाई में केंद्रीय आक्सीजन सप्लाई की भी व्यवस्था अभी शुरू नहीं हो पाई है। इस कारण गंभीर बच्चों को लखनऊ रेफर किया जाता है। संसाधनों की कमी के लिए शासन से पत्राचार किया जा रहा है। - केके वर्मा, बाल रोग विशेषज्ञ