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हरिहरपुर में भू-कटान से रास्ता बंद, ग्रामीण परेशान
मिर्जापुर।
Updated Fri, 07 Aug 2015 12:06 AM IST
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बृहस्पतिवार सुबह से रामगंगा का जलस्तर घटने लगा है। जलस्तर के घटने से
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भू-कटाव भी रूक गया है। रामगंगा के तटवर्ती गांव हरिहरपुर में कल तक नदी के
किनारे आ गए मकान तोड़े जा रहे थे, कटाव रूकते ही मकानों का तोड़ना रोक
दिया गया है, लेकिन नदी के किनारे आ गये हरे भरे पेड़ों का कटान किया जा रहा है। नदी के कटान से गांव में पूर्व से आने वाला रास्ता बंद हो जाने से ग्रामीणों ने प्राथमिक स्कूल टेढ़ा की बाउंड्री वाल ढहा कर रास्ता बना लिया है। स्कूल में लगा लोहे का मुख्य द्वार भी निकाल लिया गया है।
बुधवार को रामगंगा के जलस्तर में वृद्धि होने से गांव कुनिया,हरिहरपुर व पहरूआ मे भू-कटाव शुरू हो गया था। पहरूआ गांव का आधा कटा शिवमंदिर नदी मे समा जाने के बाद लोगों में एकबार फिर बाढ़ का भय सताने लगा था। नदी के तटवर्ती मकानों पर एकबार फिर हथौड़ा और घन बजने लगे थे, किंतु बृहस्पतिवार सुबह से नदी के घटने से लोगों ने मकानों को तोड़ना बंद कर दिया है। एक रात के ही भू-कटाव से हरिहरपुर गांव में पूर्व की ओर से आने वाला आम रास्ता नदी में समा जाने से ग्रामीणों ने रास्ते में आ रहे प्राथमिक स्कूल टेढ़ा की बाउन्ड्री वाल को ढहा कर रास्ता बना लिया है। स्कूल में लगा लोहे का मुख्य द्वार निकाल कर सुरक्षित स्थान पर रख दिया गया है।
रामगंगा के तटवर्ती गांवों में भले ही भू-कटाव फिलहाल रूक गया है, किंतु लोगों में बाढ़ और भू-कटाव का भय कम नहीं हुआ है। लोग नदी के किनारे आ गये हरे भरे पेड़ो को काटकर लकड़ी सुरक्षित स्थान पर पहुंचा रहे हैं। अब तक रामगंगा दर्जनों हरे भरे पेड़ों के साथ ही सैकड़ों बीघा कृषि योग्य भूमि अपने मे समा चुकी है।
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उमड़ घुमड़ कर आते बदरा बिन बरसे चले गए
मिर्जापुर। ऐसा लग रहा है कि इसबार किसानों से इंद्रदेव रूठ गए हैं। लगभग एक पखवाड़े से बारिश नहीं होने तथा भीषण गर्मी पडने से त्राहि-त्राहि मची हुई है। बारिश की उम्मीद से पंपसेट से पानी भरकर धान लगा चुके किसान फसल सूखने से हलकान हैं, वहीं सैकड़ों बीघा जमीन बारिश के इंतजार में अभी तक बोई नहीं जा सकी है।
आषाढ़ के महीने में हुई बारिश में किसानों ने खेतों की जुताई करके बुवाई के लिए खेत तैयार किये थे। कुछ किसानों ने पंपसेट से पानी भरकर धान की फसल लगा भी दी थी। तमाम किसान आज भी बारिश का इंतजार कर रहे हैं। किसानों का कहना है कि सावन के महीने में खेतों में धूल उड़ रही है। ऐसे में ज्वार, बाजरा, मक्का, तिल आदि की फसल भी नहीं बोई जा सकती है। प्रकृति की इस मार से परेशान किसानों का कहना है कि रबी फसल वे मौसम बारिश में नष्ट हो गयी, जिसका आज तक मुआवजा नहीं मिल सका है। अब खरीफ फसल में भी सूखे से कुछ होने वाला नहीं है। ऐसी स्थिति में खेती छोड़कर परदेस में मजदूरी करके बच्चों का पेट भरने के अलावा कोई चारा नहीं रह गया है।
बुधवार को रामगंगा के जलस्तर में वृद्धि होने से गांव कुनिया,हरिहरपुर व पहरूआ मे भू-कटाव शुरू हो गया था। पहरूआ गांव का आधा कटा शिवमंदिर नदी मे समा जाने के बाद लोगों में एकबार फिर बाढ़ का भय सताने लगा था। नदी के तटवर्ती मकानों पर एकबार फिर हथौड़ा और घन बजने लगे थे, किंतु बृहस्पतिवार सुबह से नदी के घटने से लोगों ने मकानों को तोड़ना बंद कर दिया है। एक रात के ही भू-कटाव से हरिहरपुर गांव में पूर्व की ओर से आने वाला आम रास्ता नदी में समा जाने से ग्रामीणों ने रास्ते में आ रहे प्राथमिक स्कूल टेढ़ा की बाउन्ड्री वाल को ढहा कर रास्ता बना लिया है। स्कूल में लगा लोहे का मुख्य द्वार निकाल कर सुरक्षित स्थान पर रख दिया गया है।
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रामगंगा के तटवर्ती गांवों में भले ही भू-कटाव फिलहाल रूक गया है, किंतु लोगों में बाढ़ और भू-कटाव का भय कम नहीं हुआ है। लोग नदी के किनारे आ गये हरे भरे पेड़ो को काटकर लकड़ी सुरक्षित स्थान पर पहुंचा रहे हैं। अब तक रामगंगा दर्जनों हरे भरे पेड़ों के साथ ही सैकड़ों बीघा कृषि योग्य भूमि अपने मे समा चुकी है।
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उमड़ घुमड़ कर आते बदरा बिन बरसे चले गए
मिर्जापुर। ऐसा लग रहा है कि इसबार किसानों से इंद्रदेव रूठ गए हैं। लगभग एक पखवाड़े से बारिश नहीं होने तथा भीषण गर्मी पडने से त्राहि-त्राहि मची हुई है। बारिश की उम्मीद से पंपसेट से पानी भरकर धान लगा चुके किसान फसल सूखने से हलकान हैं, वहीं सैकड़ों बीघा जमीन बारिश के इंतजार में अभी तक बोई नहीं जा सकी है।
आषाढ़ के महीने में हुई बारिश में किसानों ने खेतों की जुताई करके बुवाई के लिए खेत तैयार किये थे। कुछ किसानों ने पंपसेट से पानी भरकर धान की फसल लगा भी दी थी। तमाम किसान आज भी बारिश का इंतजार कर रहे हैं। किसानों का कहना है कि सावन के महीने में खेतों में धूल उड़ रही है। ऐसे में ज्वार, बाजरा, मक्का, तिल आदि की फसल भी नहीं बोई जा सकती है। प्रकृति की इस मार से परेशान किसानों का कहना है कि रबी फसल वे मौसम बारिश में नष्ट हो गयी, जिसका आज तक मुआवजा नहीं मिल सका है। अब खरीफ फसल में भी सूखे से कुछ होने वाला नहीं है। ऐसी स्थिति में खेती छोड़कर परदेस में मजदूरी करके बच्चों का पेट भरने के अलावा कोई चारा नहीं रह गया है।