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‘गीत नहीं लिखे, तपस्या की है मैंने’

Mon, 18 Jan 2016 07:53 PM IST
अमर उजाला, शाहजहांपुर
अमर उजाला, शाहजहांपुर Updated Mon, 18 Jan 2016 07:53 PM IST
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geet nhi likhe tapsya ki hai maine
संतोषानंद कृभको श्याम फर्टिलाइजर पिपरोला में कवि सम्मेलन में आमंत्रित किए गए थे। बरेली मोड़ स्थित होटल में प्रतिनिधि से बात की। हालांकि बेटे और बहू की आकस्मिक मौत की चिटकन उनके चेहरे से झलक रही थी लेकिन जब वह बोले तो अतीत के कई पन्ने पलटते चले गए। कहा, उन्होंने गीत नहीं लिखे, बल्कि तपस्या की है। उन्होंने अपने काम से इश्क किया है और भरपूर किया है। किसी से नफरत करने का मौका ही नहीं मिला। एक प्यार का नगमा है मौजों की रवानी है, जिंदगी और कुछ भी नहीं तेरी-मेरी कहानी है जैसा कालजयी गीत रचने वाले संतोषानंद कहते हैं कि इसके बाद तो लिखने के लिए कुछ बचा ही नहीं था, लेकिन समय की मांग को देखते हुए लिखना ही पड़ा।
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फिल्म पूरब-पश्चिम के गीत 'पुरबा सुहानी आई रे आई पुरबा' से बॉलीवुड में एंट्री करने वाले संतोषानंद बोले कि उन्हें याद नहीं कि अभी तक वह कितने गीत और कितनी फिल्मों के लिए लिख चुके हैं। जब सांसों का हिसाब नहीं रखा तो गीतों का कौन रखे। बोले: अब ये गीत उनके नहीं रहे, उनसे अधिक जब प्रशंसकों को याद हैं तो वह गीत मेरे कहां रह गए। एक सवाल के जवाब में उन्होंने बड़ी बेबाकी से कहा कि जब कोई गुनगुनाता या गाता हुआ मिलता ही नहीं तो वह गीत कैसे हो सकते हैं। गीत का मजा तो तभी है, जब गुनगुनाया जाए। बोले: हमारे यहां तो जन्म से लेकर मृत्यु तक गीत गाए जाते हैं।
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बेटे-बहू की मौत से जीवन की आस ही टूट गई। अब केवल चार साल की पोती रिद्धिमा आनंद के लिए ही जिंदा हैं। इसके अलावा और कोई सपना नहीं बचा, जब हकीकत ही टूट गई तो सपनों की बात कौन करे। गीतों के बारे में पूछने पर कहने लगे कि अभी तक वह ऐसा कोई गीत नहीं लिख सके, जो उन्हें पसंद हो। जो लिखे हैं वह भी बहुत अच्छे नहीं थे, लेकिन प्रशंसकों को अच्छे लगे, यह ईश्वर की कृपा है। जब उनसे पूछा कि एक प्यार का नगमा है...गीत किस उम्र में लिखा। इस पर हंसते हुए कहने लगे कि भरपूर इश्क की उम्र थी। किससे इश्क था के सवाल बोले कि कुछ राज राज ही रहने दो। गीत की पंक्तियां गुनगुनाते हुए कई बाद उनकी आंखें डबडबा आईं। बाद में कहने लगे कि एक ही इच्छा है जब संसार से रुखसती लूूं तो यह गीत गाते हुए ही उन्हें विदा किया जाए। फिर कहने लगे कि उन्होंने फिल्म प्यासा सावन के गीत मेघा रे मेघा रे, मत परदेस जा रहे में कालिदास के मेघदूत को ही उल्टा कर दिया था। इस बीच मौजूद वरिष्ठ रंगकर्मी प्रमोद प्रमिल की ओर इशारा करते हुए संतोषानंद कहने लगे कि गीत के बिना तो रंगकर्म भी कुछ नहीं है। जिस तरह रंगकर्म में लय होती है, उसी तरह गीतों में भी जीवन की लय होती है।
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