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स्वतंत्रता संग्राम सेनानी श्याम बिहारी नहीं रहे
ब्यूरो/अमर उजाला, शाहजहांपुर
Updated Wed, 27 Jul 2016 11:13 PM IST
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श्याम बिहारी
- फोटो : शाहजहांपुर, उत्तर प्रदेश
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जिले के एकमात्र जीवित स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पंडित श्याम बिहारी लाल मिश्र का बुधवार को देहावसान हो गया। उन्होंने शाहजहांपुर के एक निजी अस्पताल में अंतिम सांस ली। वह कुछ समय से बीमार चल रहे थे।
वर्ष 1919 शाहजहांपुर की पुवायां तहसील के गांव बनिगवां में जन्में श्याम बिहारी लाल मिश्रा युवा हुए तो उनके मन में देश को आजाद करने के लिए अपना योगदान देने की इच्छा जाग्रत हो उठी। आठ अगस्त 1942 को अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के मुंबई सत्र में अंग्रेजों भारत छोड़ो का नारा दिया गया। इसके फार्म देश भर में भेजे गए। गांव बनिगवां में भी फार्म पहुंचा तो श्याम बिहारी लाल ने भी फार्म भर दिया। इसके कुछ दिन बाद ही उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और 50 रुपये जुर्माने के साथ ही छह माह कारावास की सजा सुनाई गई। बाद में वह जेल से रिहा हुए। आजादी के बाद प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उन्हें ताम्रपत्र देकर सम्मानित किया था।
वर्ष 1968 में उनकी धर्मपत्नी भगवती देवी का स्वर्गवास हो गया। एकमात्र संतान पुत्री वेदकांती की शादी उन्होंने पुवायां के गांव सतवां में की थी। वेदकांती का निधन वर्ष 1965 में हो गया था। पुत्री के निधन के समय वेदकांती के पुुत्र ओमकार की आयु पांच वर्ष थी। पुत्री की मोत के बाद श्याम बिहारी लाल नाती ओमकार को अपने पास ले आए। ओमकार ही वृद्धावस्था में उनकी सेवा करते थे। उनका भरा पूरा परिवार अपने बनिगवां में ही रह रहा है।
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बुधवार को स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के निधन की सूचना मिलते ही तमाम लोगों में शोक की लहर दौड़ गई। एसडीएम रामशंकर, तहसीलदार सुशीलचंद्र गुप्ता, कांग्रेस के नगर अध्यक्ष सतीशचंद्र गुप्ता, स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी उत्तराधिकारी संगठन के जिलाध्यक्ष राजीव कुमार राजे, श्याम मनोहर द्विवेदी, विजय तन्हा सहित तमाम लोगों ने गांव बनिगवां पहुंचकर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी को पुष्प अर्पित किए।
आज होगा अंतिम संस्कार
पुवायां। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पंडित श्यामबिहारी लाल मिश्रा का अंतिम संस्कार बृहस्पतिवार को गांव बनिगवां के पास किया जाएगा। यह जानकारी उनके नाती ओमकार ने दी है।
बड़बोले नेताओं के मन में भरी है गंदगी
पुवायां। शाहजहांपुर के अंतिम जीवित स्वतंत्रता संग्राम सेनानी 97 वर्षीय पंडित श्याम बिहारी लाल मिश्रा स्वतंत्रता दिवस को सबसे बड़ा पर्व मानते थे। कुछ समय पूर्व अमर उजाला से हुई बातचीत में उन्होंने अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए कहा था कि आज के बड़बोले नेताओं के मन मेें भरी गंदगी ने आजादी के मायने बदल दिए हैं। हम आजाद होकर भी गुलामों जैसा जीवन जी रहे हैं अंग्रेजी शासन और वर्तमान में कुछ खास बदलाव नहीं आया है, तब जमीदार जनता का शोषण करते थे और अब नेता और अधिकारी शोषण कर रहे हैं।
पंडित जी ने बताया था कि वह 22 साल की उम्र में पहली बार जेल गए थे। गांव में एक छपा हुआ फार्म आया था जिसमें लिखा था ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’। एक फार्म भरा तो कुछ ही दिन बाद गिरफ्तारी हो गई। वर्ष 1941 में उन्हें 50 रुपये जुर्माना और छह माह कारावास की सजा सुनाई गई।
पंडित जी के अनुसार देश को आजाद कराने के पीछे नेताओं की मंशा थी कि इससे गरीब जनता को अंग्रेजों और उनके एजेंट जमीदारों से मुक्ति मिलेगी। आजादी के बाद रुपये की कमी थी, सो भ्रष्टाचार भी कम था। अब नेता ही नहीं चाहते कि भय, भूख और भ्रष्टाचार से लोगों को निजात मिले और लोग जाति, संप्रदाय से ऊपर उठकर विकास के बारे में सोचें। ऊपर से सभी नेता बड़ी बातें करते हैं, लेकिन उनके मन में गंदगी भरी है।
उनका मानना था कि आजादी का पूर्ण रूप से दुरूपयोग किया जा रहा है। नेताशाही और नौकरशाही जनता पर हावी है। देश के लिए कुर्बानी देने वाले स्वतन्त्रता संग्राम सेनानियों का कोई भी पुरसाहाल नहीं है। अधिकारी और नेता, किसी के पास सेनानियों के लिए समय नहीं है। देश के आजद होने के बाद कांग्रेस से जुडे़ श्याम बिहारी लाल के अनुसार देश की आजादी के बाद से ही नेतागण धन दौलत की चकाचौंध में ही डूबते चले गए। अमीर और भी अमीर होते गए और गरीब को रोटी तक मिलना मुश्किल हो गया।
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वर्ष 1919 शाहजहांपुर की पुवायां तहसील के गांव बनिगवां में जन्में श्याम बिहारी लाल मिश्रा युवा हुए तो उनके मन में देश को आजाद करने के लिए अपना योगदान देने की इच्छा जाग्रत हो उठी। आठ अगस्त 1942 को अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के मुंबई सत्र में अंग्रेजों भारत छोड़ो का नारा दिया गया। इसके फार्म देश भर में भेजे गए। गांव बनिगवां में भी फार्म पहुंचा तो श्याम बिहारी लाल ने भी फार्म भर दिया। इसके कुछ दिन बाद ही उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और 50 रुपये जुर्माने के साथ ही छह माह कारावास की सजा सुनाई गई। बाद में वह जेल से रिहा हुए। आजादी के बाद प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उन्हें ताम्रपत्र देकर सम्मानित किया था।
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वर्ष 1968 में उनकी धर्मपत्नी भगवती देवी का स्वर्गवास हो गया। एकमात्र संतान पुत्री वेदकांती की शादी उन्होंने पुवायां के गांव सतवां में की थी। वेदकांती का निधन वर्ष 1965 में हो गया था। पुत्री के निधन के समय वेदकांती के पुुत्र ओमकार की आयु पांच वर्ष थी। पुत्री की मोत के बाद श्याम बिहारी लाल नाती ओमकार को अपने पास ले आए। ओमकार ही वृद्धावस्था में उनकी सेवा करते थे। उनका भरा पूरा परिवार अपने बनिगवां में ही रह रहा है।
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बुधवार को स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के निधन की सूचना मिलते ही तमाम लोगों में शोक की लहर दौड़ गई। एसडीएम रामशंकर, तहसीलदार सुशीलचंद्र गुप्ता, कांग्रेस के नगर अध्यक्ष सतीशचंद्र गुप्ता, स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी उत्तराधिकारी संगठन के जिलाध्यक्ष राजीव कुमार राजे, श्याम मनोहर द्विवेदी, विजय तन्हा सहित तमाम लोगों ने गांव बनिगवां पहुंचकर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी को पुष्प अर्पित किए।
आज होगा अंतिम संस्कार
पुवायां। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पंडित श्यामबिहारी लाल मिश्रा का अंतिम संस्कार बृहस्पतिवार को गांव बनिगवां के पास किया जाएगा। यह जानकारी उनके नाती ओमकार ने दी है।
बड़बोले नेताओं के मन में भरी है गंदगी
पुवायां। शाहजहांपुर के अंतिम जीवित स्वतंत्रता संग्राम सेनानी 97 वर्षीय पंडित श्याम बिहारी लाल मिश्रा स्वतंत्रता दिवस को सबसे बड़ा पर्व मानते थे। कुछ समय पूर्व अमर उजाला से हुई बातचीत में उन्होंने अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए कहा था कि आज के बड़बोले नेताओं के मन मेें भरी गंदगी ने आजादी के मायने बदल दिए हैं। हम आजाद होकर भी गुलामों जैसा जीवन जी रहे हैं अंग्रेजी शासन और वर्तमान में कुछ खास बदलाव नहीं आया है, तब जमीदार जनता का शोषण करते थे और अब नेता और अधिकारी शोषण कर रहे हैं।
पंडित जी ने बताया था कि वह 22 साल की उम्र में पहली बार जेल गए थे। गांव में एक छपा हुआ फार्म आया था जिसमें लिखा था ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’। एक फार्म भरा तो कुछ ही दिन बाद गिरफ्तारी हो गई। वर्ष 1941 में उन्हें 50 रुपये जुर्माना और छह माह कारावास की सजा सुनाई गई।
पंडित जी के अनुसार देश को आजाद कराने के पीछे नेताओं की मंशा थी कि इससे गरीब जनता को अंग्रेजों और उनके एजेंट जमीदारों से मुक्ति मिलेगी। आजादी के बाद रुपये की कमी थी, सो भ्रष्टाचार भी कम था। अब नेता ही नहीं चाहते कि भय, भूख और भ्रष्टाचार से लोगों को निजात मिले और लोग जाति, संप्रदाय से ऊपर उठकर विकास के बारे में सोचें। ऊपर से सभी नेता बड़ी बातें करते हैं, लेकिन उनके मन में गंदगी भरी है।
उनका मानना था कि आजादी का पूर्ण रूप से दुरूपयोग किया जा रहा है। नेताशाही और नौकरशाही जनता पर हावी है। देश के लिए कुर्बानी देने वाले स्वतन्त्रता संग्राम सेनानियों का कोई भी पुरसाहाल नहीं है। अधिकारी और नेता, किसी के पास सेनानियों के लिए समय नहीं है। देश के आजद होने के बाद कांग्रेस से जुडे़ श्याम बिहारी लाल के अनुसार देश की आजादी के बाद से ही नेतागण धन दौलत की चकाचौंध में ही डूबते चले गए। अमीर और भी अमीर होते गए और गरीब को रोटी तक मिलना मुश्किल हो गया।