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खुदा की इबादत में बीता रमजान माह का पहला रोजा, बाजार में नहीं दिखी रौनक
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शाहजहांपुर। माहे रमजान का पहला रोजा शनिवार को मुकम्मल हुआ और लोगों ने घरों में रहकर इबादत की। लॉकडाउन की वजह से बाजारों में भी रौनक नहीं दिखाई दी। सामान्य दिनों में इफ्तार के बाद सड़कों पर होने वाली चहल-पहल भी लॉकडाउन के चलते गायब रही।
खुदा की इबादत का पवित्र माह रमजान का चांद शुक्रवार को दिखाई दे गया था, जिसके बाद तरावीह की नमाज अदा की गई। मस्जिदों में 2-3 लोगों को ही जाने की इजाजत दी गई है, अन्य लोगों ने अपने घरों में ही रहकर नमाज अदा की। शनिवार को सुबह सहरी के साथ ही दिन की शुरुआत की गई। पहले रोजे की नियत कर रोजेदार नमाज और कुरान की तिलावत में मशगूल हो गए।दिन भर अपने काम में मसरूफ रहते हुए रोजेदारों ने नमाज के साथ रोजा पूरा किया। इस बार रोजा इफ्तार के लिए कहीं कोई आयोजन नहीं हो सका, घरों पर ही रोजेदारों ने खजूर, फल और शिकंजी से इफ्तार किया। इफ्तार के बाद मगरिब की नमाज अदा की गई।
रोजी में होती है बरकत
शहर पेश इमाम मौलाना हुजूर अहमद मंजरी कहते हैं कि रमजान के महीने में अल्लाह अपने बंदों पर खास करम फरमाता है। इस महीने में जहन्नुम के दरवाजे बंद कर दिए जाते हैं और जन्नत के दरवाजे खोल दिए जाते हैं। साथ ही रोजी में बेपनाह बरकत अता की जाती है।
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रमजान में रोजे का खास हुक्म
रमजान के महीने में रोजा रखने का खासतौर पर हुक्म है। हर मुसलमान आकिल, बालिग का सुबह सादिक से लेकर शाम को सूरज डूबने तक खाने-पीने और सभी तरह की बुराइयों से रुकने का नाम रोजा है।
रोजे से पैदा होता है मदद का जज्बा
रोजे का फलसफा यह है कि इंसान के अंदर अल्लाह के बंदों के साथ जो बेकसी और भूख प्यास की हालत में जिन्दगी गुजारते हैं, उनकी भरपूर मदद का जज्बा पैदा हो। साथ ही रोजेदारों में तकवा व परहेजगारी की सिफत पैदा होती है।
इबादतों का बढ़ जाता है सबाब
इस महीने में अल्लाह तआला इबादतों का सबाब बहुत ज्यादा बढ़ा देता है। एक वक्त की नमाज पढ़ने पर अल्लाह तआला 70 नमाजों का सबाब अता फरमाता है। रोजेदार की इफ्तार के वक्त की हुई दुआ अल्लाह तआला रद्द नहीं फरमाता।
सुन्नी इफ्तार व सहरी दूसरा रोजा
इफ्तार रविवार- शाम 06 बजकर 47 मिनट
सहरी सोमवार- सुबह 04 बजकर 04 मिनट
शिया इफ्तार व सहरी
इफ्तार रविवार- शाम 06 बजकर 48 मिनटसहरी सोमवार- सुबह 03 बजकर 56 मिनट
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खुदा की इबादत का पवित्र माह रमजान का चांद शुक्रवार को दिखाई दे गया था, जिसके बाद तरावीह की नमाज अदा की गई। मस्जिदों में 2-3 लोगों को ही जाने की इजाजत दी गई है, अन्य लोगों ने अपने घरों में ही रहकर नमाज अदा की। शनिवार को सुबह सहरी के साथ ही दिन की शुरुआत की गई। पहले रोजे की नियत कर रोजेदार नमाज और कुरान की तिलावत में मशगूल हो गए।दिन भर अपने काम में मसरूफ रहते हुए रोजेदारों ने नमाज के साथ रोजा पूरा किया। इस बार रोजा इफ्तार के लिए कहीं कोई आयोजन नहीं हो सका, घरों पर ही रोजेदारों ने खजूर, फल और शिकंजी से इफ्तार किया। इफ्तार के बाद मगरिब की नमाज अदा की गई।
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रोजी में होती है बरकत
शहर पेश इमाम मौलाना हुजूर अहमद मंजरी कहते हैं कि रमजान के महीने में अल्लाह अपने बंदों पर खास करम फरमाता है। इस महीने में जहन्नुम के दरवाजे बंद कर दिए जाते हैं और जन्नत के दरवाजे खोल दिए जाते हैं। साथ ही रोजी में बेपनाह बरकत अता की जाती है।
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रमजान में रोजे का खास हुक्म
रमजान के महीने में रोजा रखने का खासतौर पर हुक्म है। हर मुसलमान आकिल, बालिग का सुबह सादिक से लेकर शाम को सूरज डूबने तक खाने-पीने और सभी तरह की बुराइयों से रुकने का नाम रोजा है।
रोजे से पैदा होता है मदद का जज्बा
रोजे का फलसफा यह है कि इंसान के अंदर अल्लाह के बंदों के साथ जो बेकसी और भूख प्यास की हालत में जिन्दगी गुजारते हैं, उनकी भरपूर मदद का जज्बा पैदा हो। साथ ही रोजेदारों में तकवा व परहेजगारी की सिफत पैदा होती है।
इबादतों का बढ़ जाता है सबाब
इस महीने में अल्लाह तआला इबादतों का सबाब बहुत ज्यादा बढ़ा देता है। एक वक्त की नमाज पढ़ने पर अल्लाह तआला 70 नमाजों का सबाब अता फरमाता है। रोजेदार की इफ्तार के वक्त की हुई दुआ अल्लाह तआला रद्द नहीं फरमाता।
सुन्नी इफ्तार व सहरी दूसरा रोजा
इफ्तार रविवार- शाम 06 बजकर 47 मिनट
सहरी सोमवार- सुबह 04 बजकर 04 मिनट
शिया इफ्तार व सहरी
इफ्तार रविवार- शाम 06 बजकर 48 मिनटसहरी सोमवार- सुबह 03 बजकर 56 मिनट