फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Shahjahanpur News ›   empty pocket people returning from other states

कुछ न बचा तो घर लौटना ही मुनासिब, वरना भूखे मर जाएंगे

Mon, 27 Apr 2020 11:58 PM IST
Bareily Bureau बरेली ब्यूरो
Updated Mon, 27 Apr 2020 11:58 PM IST
विज्ञापन
empty pocket people returning from other states
तिलहर। चंडीगढ़, हरियाणा, पंजाब, दिल्ली और गाजियाबाद से साइकिल और पैदल चलकर मोतिहारी, बरौनी, अंबेडकरनगर, गोरखपुर, पूर्वी चंपारण आदि स्थानों के लिए जाने-वाले मजदूरों का तांता लगा हुआ है। एक महीने तक लॉकडाउन में जेबें खाली होने और दो जून की रोटी नसीब न होने पर सैकड़ों की तादाद में उत्तर प्रदेश और बिहार के मजदूरों ने साइकिल और पैदल ही घरों के लिए पलायन कर दिया है। उनका कहना था कि वहां रुकने पर भूखे ही मर जाते। यह क्रम पिछले तीन दिनों से लगातार जारी है।
विज्ञापन

आठ से दस दिन से चंडीगढ़ पंजाब और हरियाणा से लगभग 550 किलोमीटर की दूरी तय करके सोमवार को तिलहर पहुंचे मजदूरों ने बताया कि उन्हें अभी 500 से 700 किलोमीटर की दूरी तय करनी है। साइकिल और पैदल लगातार चलते हुए उनके पैरों में सूजन आ गई है। भूख प्यास से भी बुरा हाल है, जेब में पैसे नहीं हैं। रास्ते में कहीं कुछ मिल जाता है तो खा लेते हैं। बताया कि चंडीगढ़, पंजाब और हरियाणा सरकार में कहीं भी कुछ खाने को नहीं मिला। यूपी में आने के बाद लोगों ने खाने-पीने में कुछ मदद की है।
विज्ञापन

चंडीगढ़ सेक्टर 45 में भवन निर्माण में मजदूरी का काम करने वाले लगभग एक दर्जन मजदूर आठ दिन पहले साइकिल से चंडीगढ़ से घर मोतिहारी बिहार के लिए चले। मोतिहारी के गुलाब शाह अजय, विजय, राकेश, संदन पासवान, छोटेलाल पासवान, जयप्रकाश, सत्यदेव, धर्मा, संजय कुमार ने सोमवार को तिलहर पहुंचने पर बताया कि वह मजदूरी करते हैं। लॉकडाउन में एक महीने तक किसी तरह गुजर बसर करते रहे जब खाने को कुछ नहीं बचा, पैसे भी समाप्त हो गए तो मजबूरी में घर जाने के लिए साइकिल से चल दिए। गुलाब शाह ने बताया कि रामपुर के नरैनी पुल के पास पुलिस ने उन्हें परेशान किया आगे नहीं जाने दिया। 12 घंटे तक हम लोग वहां सड़क पर पड़े रहे। अगले दिन गांव वालों की मदद से जंगल की रास्ते किसी तरह वहां से निकले हैं। रविवार को हम लोगों ने खाना खाया था तब से अभी तक खाना नहीं मिला है।
विज्ञापन
विज्ञापन

चार दिन पहले गाजियाबाद से बरौनी के लिए निकले
साइकिल से बरौनी जा रहे एनबी सोहराब, कमरेज, अनवर ने बताया कि वह चार दिन पहले गाजियाबाद से घर के लिए चले हैं। गाजियाबाद में ईंट मसाला बनाने का काम करते हैं। ढाई सौ से तीन सौ रुपये मजदूरी मिलती है। कमरे भी किराए पर लिया था। वह भी किराया मांगता है। पैसा पास नहीं बचा है। वहां खाने पीने को कुछ नहीं मिल रहा था इसलिए घर के लिए जाना ही मुनासिब समझा है। यदि खाने पीने की व्यवस्था वहां हो जाती तब वहां से नहीं चलते।
चंडीगढ़ में प्रशासन ने भोजन की नहीं की व्यवस्था
चंडीगढ़ से बिहार पूर्वी चंपारण साइकिल से जा रहे लगभग डेढ़ दर्जन मजदूरों ने बताया कि कि सात दिन से चंडीगढ़ से चले हुए हैं। लगभग 550 किलोमीटर की यात्रा कर चुके हैं अभी लगभग 650 किलोमीटर और जाना है। साइकिल टीम में शामिल मजदूर चंदू, तारकेश्वर प्रसाद, पिंटू महतो, उमेश महतो, बालेश्वर महतो ने बताया कि लॉकडाउन के बाद से चंडीगढ़ में ही गुजर-बसर कर रहे थे लेकिन पैसे समाप्त हो गए और वहां पर बिल्डिंग मालिक ने भी खाना-पीना देने से मना कर दिया तो क्या करते। बताया कि चंडीगढ़ में प्रशासन की ओर से खाने-पीने की कोई व्यवस्था नहीं की गई। पुलिस बाहर निकलने पर डंडे मारती है। इसलिए मजबूरी में घर के लिए पलायन कर दिया है।
पंजाब से गोरखपुर के लिए पैदल ही निकल पड़ा सचिन
पंजाब से पैदल गोरखपुर जा रहा 20 वर्षीय सचिन ने बताया कि वह सीमेंट की फैक्टरी में काम करता है। उसके साथ के और लोग अपने अपने घर चले गए। खाने पीने की कोई व्यवस्था नहीं थी। पास में पैसे भी नहीं है इसलिए वह पैदल ही वहां से निकल पड़ा। सोमवार को यहां पहुंचने पर उसे 12 दिन हो चुके हैं। कुछ लोग थोड़ी दूर उसे गाड़ियों में बिठा कर छोड़ देते हैं लेकिन अधिकतर पैदल ही चल रहा है। खाने पीने को भी कभी-कभी मिल जाता है। चंडीगढ़ से अंबेडकरनगर जा रहे इंद्रजीत, प्रेम और महेंद्र यादव ने बताया कि वह 21 अप्रैल को साइकिल से चंडीगढ़ से चले थे। वे मजदूरी करते हैँ। जो पैसा था वह खत्म हो गया। ठेकेदार के चले जाने पर खाने की व्यवस्था नहीं रही। पुलिस भी परेशान कर रही थी। यूपी में आने पर रास्ते में गांव के कुछ लोग खाने-पीने में मदद कर रहे हैं।
बिहार सरकार से नाखुश लोग कोसते नजर आए
बिहार के मजदूरों ने बताया कि उनकी प्रदेश सरकार ने उन्हें लाने के लिए कोई व्यवस्था नहीं की। यूपी सरकार ने मजदूरों के लाने के लिए बसें लगाई हैं। हमारी सरकार इस ओर ध्यान नहीं दे रही है। ऐसे में आने वाले चुनाव में वे भी सबक सिखाएंगे।
मजदूरों को खिलाने पिलाने वाले सामाजिक संगठन नदारद
मार्च में लॉकडाउन के दौरान पलायन करने वाले मजदूरों को कई सामाजिक संगठनों ने रास्ते में खिलाने पिलाने की व्यवस्था की थी। इधर, एक महीना बीत जाने के बाद दोबारा पलायन करने वाले मजदूरों को मदद करने वाले संगठन नदारद है। हालत यह है कि भूखे प्यासे मजदूर सैकड़ों किलोमीटर की यात्रा करके घर की ओर भागे चले जा रहे हैं उनका पुरसाहाल लेने वाला कोई नहीं है। कुछ ग्रामीण भूख से तड़पता देख उनकी मदद कर रहे हैं।

मदद के सरकारी दावे हवा हवाई
पलायन करते मजदूरों को मदद देने के लिए शासन प्रशासन स्तर से तमाम दावे किए जा रहे हैं लेकिन धरातल पर सभी दावे हवा-हवाई साबित हो रहे हैं। मजदूरों को प्रशासनिक स्तर पर कहीं भी मदद नहीं दी जा रही है सभी अपने भाग्य के भरोसे दौड़े चले जा रहे हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed