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एग्रो पार्क और मार्केटिंग हब से होगा कृषि का विकास

Sun, 07 Feb 2016 11:42 PM IST
शाहजहांपुर
शाहजहांपुर Updated Sun, 07 Feb 2016 11:42 PM IST
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करीब साढ़े चार लाख किसानों वाले जिले में गेहूं, गन्ना और धान की बंपर पैदावार के मद्देनजर यहां एग्रो पार्क और मार्केटिंग हब विकसित किए जाने की मांग लंबे समय से हो रही है। फसली उत्पादन को देखते यहां कृषि विकास योजनाओं को क्रियान्वित करने और कृषि आधारित उद्योगों के विकास की काफी संभावनाएं हैं लेकिन प्रशासन अथवा कृषि विभाग की ओर से ऐसा कोई प्रस्ताव शासन को नहीं भेजा गया। ऐसे में किसानों और कृषि आधारित उद्योगों की सारी उम्मीदें प्रदेश सरकार के बजट पर टिकी हैं।
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फसल कोई भी हो, कभी मौसम की मार तो कभी जरूरत से ज्यादा पैदावार कम जोत वाले संसाधन हीन किसानों के लिए मुसीबत बन जाती है। बीते रबी सीजन में अतिवृष्टि व ओलावृष्टि से गेहूं और खरीफ सीजन मेें अपर्याप्त बारिश से धान के कम उत्पादन को अपवाद मानें तो फसलों का बंपर उत्पादन किसानों की दशा सुधारने के बजाय उन्हें मुसीबत रहा है। एक दशक पीछे गन्ना की बंपर पैदावार होने पर चीनी मिलों-क्रशर्स ने किसानों से मुंह मोड़ा तो सैकड़ों एकड़ गन्ना घरों में ईंधन के तौर पर जला दिया गया।
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गेहूं और धान की बेहतर पैदावार होने पर क्रय केंद्रों के दलाल किसानों से कहीं ज्यादा मुनाफा कमाने को सक्रिय हो जाते हैं। केंद्र और राज्य सरकार के गोदामों पर राजनीतिक संरक्षण में डाला वसूली होने पर केंद्र प्रभारी फसल तुलवाने वालों से भुगतान में कटौती शुरू कर देते हैं। दरअसल, जिले के करीब 3.50 लाख हेक्टेयर कृषि क्षेत्रफल में 3.00 लाख हेक्टेयर क्षेत्रफल सिंचाई सुविधा से लैस होने के कारण जिस अनुपात में फसलों की पैदावार होती है, उसकी तुलना में बिक्री के संसाधन न के बराबर हैं।
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कृषि विभाग के अधिकारी भी मानते हैं कि यदि यहां एग्रो पार्क के रूप में मार्केटिंग हब विकसित कर दिया जाए तो किसानों को एक ही स्थान पर सारी फसलों को उचित मूल्य पर बिक्री करने की सुविधा मिल जाएगी। उप निदेशक डॉ. राधाकृष्ण यादव का कहना है कि हालांकि शासन स्तर से ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं मांगा गया। लेकिन मार्केटिंग हब के तौर पर एग्रो शेड और गोदाम बना दिए जाएं तो उचित मूल्य मिलने तक फसलों को भंडारित करना आसान हो जाएगा।

रियायतें की आशा
जिले में करीब पांच सौ से अधिक छोटी-बड़ी औद्योगिक इकाइयों के बावजूद एग्रो बेस्ड इंडस्ट्री का दायरा लगातार कम हो रहा है। चार दशक पहले तक यहां पालिश की हुई अरहर दाल कई राज्यों में जाती थी। सूरज ब्रांड मस्टर्ड ऑयल की पश्चिम बंगाल तक मांग थी। मूंगफली दाना और तेल समेत यहां का बना चूड़ा भी कई राज्यों में सप्लाई होता था लेकिन अन्य राज्यों में दलहन-तिलहन का रकबा बढने और ऐसी इकाइयां यहां न स्थापित होने से कृषि आधारित उद्योग कम हो गए। वर्तमान में जी सर्जीवियर कंपनी रेडी टु ईट खाने के पैकेट आसपास के जिलों में सप्लाई कर रही है। रोजा और जमौर औद्योगिक आस्थान में नमकीन, रस्क निर्माता फैक्ट्रियां हैं, लेकिन उनके ब्रांड नेम की कोई पहचान नहीं हैं। यह उद्योग केवल स्थानीय जरूरतें पूरी कर रहे हैं। ऐसे में कृषि आधारित उद्योगों को यूपी के बजट में रियायतें मिलने की उम्मीद की जा रही है।


फूड प्रोसेसिंग को लेकर सरकार की पॉलिसी स्पष्ट नहीं होने और उसकी राह में कई रुकावटों के चलते यह उद्योग खत्म होने की स्थिति में पहुंच गए हैं। कृषि आधारित उद्योगों की स्थापना में रियायत देेकर उनके पनपने का माहौल बनाया जा सकता है।
- अशोक अग्रवाल, राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष, इंडियन इंडस्ट्रीज एसोसिएशन


प्रदेश सरकार के बजट से किसानों को कोई उम्मीद नहीं है। कृषि यंत्रों पर अनुदान काफी समय से बंद है। गन्ने का भुगतान और फसलों का सही मूल्य नहीं मिल रहा है। सरकार किसानों के लिए कुछ नहीं कर रही है। बजट में भी कुछ नहीं किया जाएगा।

- प्रभजोत सिंह, जिला उपाध्यक्ष, भाकियू

सरकार को बजट में किसानों के लिए कल्याणकारी योजनाओं की घोषणा करनी चाहिए। वृद्ध किसानों को पेंशन दी जानी चाहिए और किसान की फसल का मूल्य तय करने के लिए स्पष्ट नीति बनाई जानी चाहिए। प्रदेश सरकार किसानों के लिए ऐसी कोई योजना नहीं बना रही है।
- महेंद्र पाल सिंह यादव, जिलाध्यक्ष, भाकियू
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