{"_id":"12785224c36431209514ac051c059399","slug":"culturalal-hindi-news-7","type":"story","status":"publish","title_hn":"मंच पर अंधों ने तलाशा भ्रष्टाचार रूपी हाथी","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
मंच पर अंधों ने तलाशा भ्रष्टाचार रूपी हाथी
शाहजहांपुर
Updated Thu, 18 Dec 2014 12:18 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
गांधी भवन में काकोरी कांड के महानायकों की स्मृति में चल रहे अखिल भारतीय नाट्य महोत्सव में दूसरे दिन दो नाटकों का मंचन किया गया। पहला नाटक रंगयात्रा नाट्यम् सहारनपुर ने व्यंग्यकार शरद जोशी के हास्य व्यंग्य पर आधारित नाटक अंधों का हाथी और युवा नाट्य संगीत अकादमी रांची के कलाकारों ने अब तो घबराके कहते हैं कि मर जाएंगे का मंचन किया।
रविंद्र तेजान के निर्देशन में जुटीले व्यंगों से सजे नाटक अंधों का हाथी दर्शकों को हंसाने-गुदगुदाने में पूरी तरह कामयाब रहा। वर्तमान राजनीति और व्यवस्था पर करारे प्रहार करता नाटक दर्शकों को खूब भाया। इसमें सूत्रधार को जनता, पांच अंधों को नेता तथा हाथी को मंहगाई और भ्रष्टाचार का प्रतीक बनाया गया है। हमारे नेता जानबूझ कर समस्याओं को पूरी तरह समझना नहीं चाहते और वे अंधों की तरह कभी हाथी की पूंछ, तो कभी कान, कभी सूंड़ तो कभी पैर पकड़कर जनता को मूर्ख बनाते रहते हैं। आखिर सूत्रधार रूपी जनता ही मर जाती है।
दूसरा नाटक रांची (झारखंड) की टीम ने अब तो घबराके कहते हैं कि मर जाना चाहिए का मंचन कर आत्महत्या की सोचने वालों को संदेश दिया। इस कहानी में उन आत्माओं को दिखाया गया, जिन व्यक्तियों ने आत्महत्या कर मौत को गले लगाया था। संदेश था कि जो मजा जीवन में संघर्ष करने का है, वह उससे घबराकर भागने या आत्महत्या करने में नहीं है। कुमार संजय द्वारा लिखित इस नाटक का निर्देशन ऋषिकेश लाल ने किया था। कड़ाके की सर्दी के बावजूद देर रात तक दर्शक नाटकों का आनंद लेते रहे।
विज्ञापन
विज्ञापन
रविंद्र तेजान के निर्देशन में जुटीले व्यंगों से सजे नाटक अंधों का हाथी दर्शकों को हंसाने-गुदगुदाने में पूरी तरह कामयाब रहा। वर्तमान राजनीति और व्यवस्था पर करारे प्रहार करता नाटक दर्शकों को खूब भाया। इसमें सूत्रधार को जनता, पांच अंधों को नेता तथा हाथी को मंहगाई और भ्रष्टाचार का प्रतीक बनाया गया है। हमारे नेता जानबूझ कर समस्याओं को पूरी तरह समझना नहीं चाहते और वे अंधों की तरह कभी हाथी की पूंछ, तो कभी कान, कभी सूंड़ तो कभी पैर पकड़कर जनता को मूर्ख बनाते रहते हैं। आखिर सूत्रधार रूपी जनता ही मर जाती है।
विज्ञापन
दूसरा नाटक रांची (झारखंड) की टीम ने अब तो घबराके कहते हैं कि मर जाना चाहिए का मंचन कर आत्महत्या की सोचने वालों को संदेश दिया। इस कहानी में उन आत्माओं को दिखाया गया, जिन व्यक्तियों ने आत्महत्या कर मौत को गले लगाया था। संदेश था कि जो मजा जीवन में संघर्ष करने का है, वह उससे घबराकर भागने या आत्महत्या करने में नहीं है। कुमार संजय द्वारा लिखित इस नाटक का निर्देशन ऋषिकेश लाल ने किया था। कड़ाके की सर्दी के बावजूद देर रात तक दर्शक नाटकों का आनंद लेते रहे।
विज्ञापन