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भूसा संकट से निपटने को बढ़ेगा हरा चारा रकबा
शाहजहांपुर।
Updated Tue, 28 Apr 2015 11:03 PM IST
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बेमौसम बारिश से गेहूं की आधी से ज्यादा फसल नष्ट होने से गहराई भूसा संकट की आशंका मिटाने के लिए कृषि और पशुधन विभाग ने संयुक्त रूप से हरा चारा का रकबा बढ़ाने की ठानी है। इसके लिए पशुधन विभाग ने शासन को 99 क्विंटल चारा बीज की डिमांड भेजी है। साथ ही भूसा की सहज उपलब्धता के लिए ठेकेदारों को निविदाएं जारी हैं।
जिले में अधिसंख्य किसानों ने खेती के कामों और घर में दूध की जरूरतें पूरी करने के लिए पशु भी पाल रखे हैं। गौवंशीय और महिषवंशीय प्रजातियों के करीब छह लाख पशुओं को हर साल गर्मियों के सीजन में भूसा और हरे चारे की कमी का सामना करना पड़ता है। पिछले सालों में हुई गेहूं की बंपर पैदावार के बावजूद नरई से तैयार होने वाले भूसा की अन्य राज्यों में सप्लाई होने पर जिले में इसका संकट बढ़ जाता है।
इस वर्ष बेमौसम की बरसात से भूसा का संकट बढ़ना तय माना जा रहा है। इसलिए पशुधन एवं पशु चिकित्सा विभाग अभी से सक्रिय हो गया है। इसके लिए अधिकारियों ने विभिन्न प्रजातियों के चारा के लिए 99 क्विंटल बीज की मांग निदेशालय भेजकर शासन से किसानों में नि:शुल्क वितरण की अनुमति मांगी है। अधिकारियों के अनुसार किसानों को फसली हानि के अनुपात में चारा बीज उपलब्ध कराए जाने का निर्णय किया गया है।
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चारा बीज की भेजी गई डिमांड
-------------------
चारा प्रजाति मात्रा
0 ज्वार 30 क्विंटल
0 मीठी ज्वार 30 क्विंटल
0 बाजरा 5 क्विंटल
0 मक्का 20 क्विंटल
0 ग्वार 2 क्विंटल
0 लोबिया 5 क्विंटल
0 फील्ड बीज 2 क्विंटल
0 मूंग 5 क्विंटल
250 रुपये क्विंटल के भाव मिलेगा भूसा
गेहूं कटने के तुरंत बाद भूसा बहुतायत में होने के कारण 150 से 200 रुपये क्विंटल के भाव बिकता है, लेकिन समय बीतने के साथ उसके दाम बढ़ते जाते हैं। जनवरी के बाद फरवरी-मार्च आने तक भूसा के दाम 800 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच जाते हैं। इसलिए पशुधन विभाग ने अधिकतम 250 रुपये प्रति क्विंटल भाव वाले टेंडरों को मंजूरी देने का निर्णय किया है।
इसलिए बढ़ रहा भूसा का संकट
हर साल गेहूं कटने के बाद भूसा की सप्लाई अन्य राज्यों को प्रतिबंधित किए जाने के बावजूद उसकी खपत ईंट-भट्ठोें और कागज के कारखानों में बढ़ रही है। भट्ठों में ईंट को पकाने के लिए ईंधन के तौर पर भूसा इस्तेमाल हो रहा है। भूसा में सेलुलोज की मात्रा अधिक होने से कागज बनाने वाली फैक्ट्रियां भूसा से लुगदी तैयार करती हैं। यही वजह है कि पशुपालकों को भूसा की जरूरत पूरी करने के लिए उसकी भारी कीमत चुकानी पड़ती है।
हरा चारा बीज से होगा दोहरा फायदा
हरा चारा बीज के लिए दलहनी फसलों को इसलिए प्राथमिकता दी गई है, जिससे कि पशुओं का पेट भरने के साथ किसानों को भी आर्थिक लाभ हो सके। ज्वार-बाजरा जैसे मोटे अनाज की शहरी क्षेत्रों में भी डिमांड बढ़ रही है। इसी रह मूंग और लोबिया की फलियां तोड़ने के बाद उनके पौधे पशुओं में पोषक जरूरतें आसानी से पूरी करते हैं।
-डॉ. इंद्रमनि, मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी
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जिले में अधिसंख्य किसानों ने खेती के कामों और घर में दूध की जरूरतें पूरी करने के लिए पशु भी पाल रखे हैं। गौवंशीय और महिषवंशीय प्रजातियों के करीब छह लाख पशुओं को हर साल गर्मियों के सीजन में भूसा और हरे चारे की कमी का सामना करना पड़ता है। पिछले सालों में हुई गेहूं की बंपर पैदावार के बावजूद नरई से तैयार होने वाले भूसा की अन्य राज्यों में सप्लाई होने पर जिले में इसका संकट बढ़ जाता है।
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इस वर्ष बेमौसम की बरसात से भूसा का संकट बढ़ना तय माना जा रहा है। इसलिए पशुधन एवं पशु चिकित्सा विभाग अभी से सक्रिय हो गया है। इसके लिए अधिकारियों ने विभिन्न प्रजातियों के चारा के लिए 99 क्विंटल बीज की मांग निदेशालय भेजकर शासन से किसानों में नि:शुल्क वितरण की अनुमति मांगी है। अधिकारियों के अनुसार किसानों को फसली हानि के अनुपात में चारा बीज उपलब्ध कराए जाने का निर्णय किया गया है।
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चारा बीज की भेजी गई डिमांड
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चारा प्रजाति मात्रा
0 ज्वार 30 क्विंटल
0 मीठी ज्वार 30 क्विंटल
0 बाजरा 5 क्विंटल
0 मक्का 20 क्विंटल
0 ग्वार 2 क्विंटल
0 लोबिया 5 क्विंटल
0 फील्ड बीज 2 क्विंटल
0 मूंग 5 क्विंटल
250 रुपये क्विंटल के भाव मिलेगा भूसा
गेहूं कटने के तुरंत बाद भूसा बहुतायत में होने के कारण 150 से 200 रुपये क्विंटल के भाव बिकता है, लेकिन समय बीतने के साथ उसके दाम बढ़ते जाते हैं। जनवरी के बाद फरवरी-मार्च आने तक भूसा के दाम 800 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच जाते हैं। इसलिए पशुधन विभाग ने अधिकतम 250 रुपये प्रति क्विंटल भाव वाले टेंडरों को मंजूरी देने का निर्णय किया है।
इसलिए बढ़ रहा भूसा का संकट
हर साल गेहूं कटने के बाद भूसा की सप्लाई अन्य राज्यों को प्रतिबंधित किए जाने के बावजूद उसकी खपत ईंट-भट्ठोें और कागज के कारखानों में बढ़ रही है। भट्ठों में ईंट को पकाने के लिए ईंधन के तौर पर भूसा इस्तेमाल हो रहा है। भूसा में सेलुलोज की मात्रा अधिक होने से कागज बनाने वाली फैक्ट्रियां भूसा से लुगदी तैयार करती हैं। यही वजह है कि पशुपालकों को भूसा की जरूरत पूरी करने के लिए उसकी भारी कीमत चुकानी पड़ती है।
हरा चारा बीज से होगा दोहरा फायदा
हरा चारा बीज के लिए दलहनी फसलों को इसलिए प्राथमिकता दी गई है, जिससे कि पशुओं का पेट भरने के साथ किसानों को भी आर्थिक लाभ हो सके। ज्वार-बाजरा जैसे मोटे अनाज की शहरी क्षेत्रों में भी डिमांड बढ़ रही है। इसी रह मूंग और लोबिया की फलियां तोड़ने के बाद उनके पौधे पशुओं में पोषक जरूरतें आसानी से पूरी करते हैं।
-डॉ. इंद्रमनि, मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी