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36 हजार प्रवासी सर्वहारा, सिर्फ आठ हजार को मनरेगा का सहारा
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शाहजहांपुर। लॉकडाउन में फैक्ट्रियां बंद होने पर काम छिनने के बाद देश-प्रदेश के विभिन्न हिस्सों से जिले मेें 36,413 प्रवासी मजदूर घर वापसी कर चुके हैं। इनमें मामूली काम-धंधे कर दिहाड़ी कमाने वाले अकुशल श्रेणी के लगभग आठ हजार प्रवासी मजदूरों को मनरेगा के कामों से रोजी-रोटी का सहारा मिल चुका है, लेकिन कुशल श्रेणी के तमाम हुनरमंद फैक्ट्रियां चालू होने पर उनमें नौकरी मिलने की आस लगाए घरों पर बैठे हैं। आर्थिक संकट के कारण परिवार के भरण-पोषण में कठिनाई होने पर ऐसे प्रवासी कामगारों का घरों से काम पर लौटने का सिलसिला शुरू हो गया है क्योंकि उन्हें यहां रोजगार के अवसर नहीं मिल रहे। स्किल मैपिंग में हजारों ऐसे कुशल कामगार चिह्नित किए गए हैं, जिन्हें उनके हुनर के मुताबिक कारखानों में काम मिल सकता है, लेकिन उन्हें काम मिलने तक यहां रोके रखने को प्रशासन ने कोई कार्य योजना नहीं बनाई। घर वापसी करने वालों में बड़ी संख्या ऐसे प्रवासी कामगारों की है, जो अभी तक अन्य शहरों में कपड़ों की कटाई-सिलाई, इलेक्ट्रीशियन, कंप्यूटर ऑपरेटर, फिजियोथेरेपी, डायटीशियन, नर्सिंग, प्लंबर, मोटर मैकेनिक, राजमिस्त्री, मशीनिस्ट, फिटर, वेल्डर, हेयर कटिंग आदि काम करके न केवल साथ रह रहे बीवी-बच्चों का पेट पाल रहे थे, परिवार की आर्थिक मदद का सहारा भी बने थे। लॉकडाउन के कारण परदेस में रोटी के लाले पड़े तो रूखी-सूखी खाकर गुजारा करने की नीयत से घर लौटे। जिन कामगारों को फैक्ट्ररी मालिकों से बुलावा मिला, वह घरों से फिर पलायन करने लगे हैं, लेकिन सैकड़ों किमी की दूरी पैदल नापकर लौटे अधिकांश कामगार अब घर छोड़कर बाहर जाने के मूड में नहीं हैं।
मजदूरी नहीं करना चाहते कुशल कामगार
मनरेगा के अंतर्गत जिले के 919 गांवों में खड़ंजा, नाली, चक रोड निर्माण, तालाबों की खोदाई, नलकूपों की गूलों की मरम्मत, पौधरोपण, मिट्टी भराव आदि मजदूरी के 1560 कामों से 63134 श्रमिक जुड़े हैं। सिंधौली और बंडा ब्लॉक में मनरेगा के काम की मजदूरों में ज्यादा मांग है। इन कामों से शुरू मेें घर-परिवार की जरूरतें पूरी करने के लिए कुशल कामगार भी जुड़े, लेकिन जिन्होंने कभी फावड़ा-कुदाल नहीं चलाया, उनका मनरेगा से मोहभंग होने लगा है। मनरेगा उपायुक्त हसीब अंसारी केे अनुसार गत सप्ताह भावलखेड़ा ब्लॉक में कपड़ों की सिलाई-कटाई में माहिर एक प्रवासी कामगार को उसकी मांग पर मनरेगा में काम दिया गया, लेकिन तीन दिन बाद उसने स्वेच्छा से मजदूरी का काम छोड़ दिया। उनका कहना है कि मनरेगा में काम के लिए जॉब कार्ड की कोई बाध्यता नहीं है, लेकिन मस्टर रोल पर वही नाम चढ़ाए जाते हैं जो रोजगार सेवक या फिर ग्राम प्रधान से काम मांगते हैं।
रोजगार के अवसर पैदा करना बड़ी चुनौती
अधिकारी भी मानते हैं कि स्किल मैपिंग में जितने कुशल कामगार मिले हैं, उन सभी के लिए तत्काल रोजगार के अवसर पैदा करना बड़ी चुनौती है क्योंकि तमाम कारखाने बंद हैं और जो चल रहे हैं, उनमें कर्मचारी सीमित संख्या में काम कर रहे हैं। यही नहीं, जो लोग स्वरोजगार अपनाना चाहते हैं, उन्हें विभिन्न ऋण योजनाओं का लाभ देने में थोड़ा वक्त लग सकता है। प्रवासी मजदूरों के सत्यापन से पता चला है कि इनमें 3540 कारखाना कामगार, 8095 कृषि मजदूर, 2118 निर्माण श्रमिक, 1950 सिलाई कारीगर, 510 वाहन चालक शामिल हैं। शैक्षिक एवं तकनीकी योग्यता धारक प्रवासियों को देर-सवेर कम वेतन ही सही नौकरी मिल जाएगी, लेकिन अन्य तकनीकी कार्यों से जुड़े कामगारों को कहां खपाया जाए, इसे लेकर जिला स्तरीय रोजगार सेवा समिति माथापच्ची कर रही है।
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कानपुर में फर्नीचर फैक्ट्ररी में काम कर रहा था, लेकिन घर लौटने के बाद अभी यहां कोई काम नहीं मिला। सरकारी सहायता मिल जाए तो अपना काम शुरू कर देंगे, लेकिन बाहर जाने का मन नहीं है।
- अमित कुमार, गढ़िया रंगीन
दिल्ली में रसोई गैस सिलिंडर की मरम्मत करता था। लॉकडाउन में घर आने पर कोई काम नहीं मिल रहा। लोन मिले तो अपना काम शुरू करेंगे, नहीं तो मजबूरन जाना पड़ेगा। - राजेश कुमार, गढ़िया रंगीन
नोएडा में सिलाई कंपनी में कारीगर था, लेकिन घर लौटने के बाद काम तलाश रहे हैं। अब घर से वापस जाने के बजाय यहीं कोई काम करना चाहता हूं।
- विवेक पाल गढ़िया रंगीन
दिल्ली में सिलाई का काम करता था। घर लौटकर बड़े परिवार को चलाने में दिक्कत होती है। चाहता हूं कि यही काम मिल जाए क्योंकि अब बाहर नहीं जाना चाहता।
- मुनेंद्र पाल, बझेड़ा भगवानपुर (जैतीपुर)
प्रवासियों को रोजगार से जोड़ने के लिए उनकी स्किल मैपिंग कराने के बाद अब दूसरे चरण में ऐसे स्रोत तलाशे जा रहे हैं। उनकी आमदनी का जरिया बन सके। इसके लिए उन्हें विभिन्न विभागों की वित्तीय योजनाओं से भी लाभान्वित किया जाएगा। यदि किसी को बाहर जाकर काम करने का अच्छा अवसर मिल रहा है तो उसे रोकना संभव नहीं है क्योंकि बेहतर स्थितियों में काम करना हर किसी का मौलिक अधिकार है।
- महेंद्र सिंह तंवर, मुख्य विकास अधिकारी
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मजदूरी नहीं करना चाहते कुशल कामगार
मनरेगा के अंतर्गत जिले के 919 गांवों में खड़ंजा, नाली, चक रोड निर्माण, तालाबों की खोदाई, नलकूपों की गूलों की मरम्मत, पौधरोपण, मिट्टी भराव आदि मजदूरी के 1560 कामों से 63134 श्रमिक जुड़े हैं। सिंधौली और बंडा ब्लॉक में मनरेगा के काम की मजदूरों में ज्यादा मांग है। इन कामों से शुरू मेें घर-परिवार की जरूरतें पूरी करने के लिए कुशल कामगार भी जुड़े, लेकिन जिन्होंने कभी फावड़ा-कुदाल नहीं चलाया, उनका मनरेगा से मोहभंग होने लगा है। मनरेगा उपायुक्त हसीब अंसारी केे अनुसार गत सप्ताह भावलखेड़ा ब्लॉक में कपड़ों की सिलाई-कटाई में माहिर एक प्रवासी कामगार को उसकी मांग पर मनरेगा में काम दिया गया, लेकिन तीन दिन बाद उसने स्वेच्छा से मजदूरी का काम छोड़ दिया। उनका कहना है कि मनरेगा में काम के लिए जॉब कार्ड की कोई बाध्यता नहीं है, लेकिन मस्टर रोल पर वही नाम चढ़ाए जाते हैं जो रोजगार सेवक या फिर ग्राम प्रधान से काम मांगते हैं।
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रोजगार के अवसर पैदा करना बड़ी चुनौती
अधिकारी भी मानते हैं कि स्किल मैपिंग में जितने कुशल कामगार मिले हैं, उन सभी के लिए तत्काल रोजगार के अवसर पैदा करना बड़ी चुनौती है क्योंकि तमाम कारखाने बंद हैं और जो चल रहे हैं, उनमें कर्मचारी सीमित संख्या में काम कर रहे हैं। यही नहीं, जो लोग स्वरोजगार अपनाना चाहते हैं, उन्हें विभिन्न ऋण योजनाओं का लाभ देने में थोड़ा वक्त लग सकता है। प्रवासी मजदूरों के सत्यापन से पता चला है कि इनमें 3540 कारखाना कामगार, 8095 कृषि मजदूर, 2118 निर्माण श्रमिक, 1950 सिलाई कारीगर, 510 वाहन चालक शामिल हैं। शैक्षिक एवं तकनीकी योग्यता धारक प्रवासियों को देर-सवेर कम वेतन ही सही नौकरी मिल जाएगी, लेकिन अन्य तकनीकी कार्यों से जुड़े कामगारों को कहां खपाया जाए, इसे लेकर जिला स्तरीय रोजगार सेवा समिति माथापच्ची कर रही है।
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कानपुर में फर्नीचर फैक्ट्ररी में काम कर रहा था, लेकिन घर लौटने के बाद अभी यहां कोई काम नहीं मिला। सरकारी सहायता मिल जाए तो अपना काम शुरू कर देंगे, लेकिन बाहर जाने का मन नहीं है।
- अमित कुमार, गढ़िया रंगीन
दिल्ली में रसोई गैस सिलिंडर की मरम्मत करता था। लॉकडाउन में घर आने पर कोई काम नहीं मिल रहा। लोन मिले तो अपना काम शुरू करेंगे, नहीं तो मजबूरन जाना पड़ेगा। - राजेश कुमार, गढ़िया रंगीन
नोएडा में सिलाई कंपनी में कारीगर था, लेकिन घर लौटने के बाद काम तलाश रहे हैं। अब घर से वापस जाने के बजाय यहीं कोई काम करना चाहता हूं।
- विवेक पाल गढ़िया रंगीन
दिल्ली में सिलाई का काम करता था। घर लौटकर बड़े परिवार को चलाने में दिक्कत होती है। चाहता हूं कि यही काम मिल जाए क्योंकि अब बाहर नहीं जाना चाहता।
- मुनेंद्र पाल, बझेड़ा भगवानपुर (जैतीपुर)
प्रवासियों को रोजगार से जोड़ने के लिए उनकी स्किल मैपिंग कराने के बाद अब दूसरे चरण में ऐसे स्रोत तलाशे जा रहे हैं। उनकी आमदनी का जरिया बन सके। इसके लिए उन्हें विभिन्न विभागों की वित्तीय योजनाओं से भी लाभान्वित किया जाएगा। यदि किसी को बाहर जाकर काम करने का अच्छा अवसर मिल रहा है तो उसे रोकना संभव नहीं है क्योंकि बेहतर स्थितियों में काम करना हर किसी का मौलिक अधिकार है।
- महेंद्र सिंह तंवर, मुख्य विकास अधिकारी