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फसली नुकसान का आकलन करने लखनऊ से आई सर्वेंयर टीम
Updated Tue, 18 Sep 2018 12:09 AM IST
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फोटो 30, जैतीपुर क्षेत्र में नदी मेें कट गईं फसलें
फसली नुकसान का आकलन को लखनऊ से पहुंची सर्वेयर टीम
0 जलालाबाद, कलान और मिर्जापुर ब्लॉक के गांवों पर फोकस
0 बाढ़ प्रभावित गांवों में भूमि कटान के सर्वे को जुटे लेखपाल
अमर उजाला ब्यूरो
शाहजहांपुर। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के लिए शासन से नामित कार्यदायी संस्था टाटा एग्रीकल्चर इंश्योरेंस ग्रुप के अधिकारियों की सात सदस्यीय टीम सोमवार को लखनऊ से बाढ़ और अतिवृष्टि से जिले में खरीफ फसलों को हुई क्षति का आकलन करने को यहां पहुंच गई है। सर्वेयर टीम के सदस्यों ने प्रशासन समेत कृषि और राजस्व विभाग के अधिकारियों से अनुमानित फसली नुकसान का फीड बैक लेने के साथ जलालाबाद, मिर्जापुर और कलान विकास खंड के गांवों पर फोकस किया है। गंगा-रामगंगा और बहगुल के तटवर्ती गांवों में बाढ़ से हुए भूमि कटान का आकलन करने के लिए राजस्व विभाग के लेखपालों और भूलेख निरीक्षकों को भी जुटाया गया है।
खरीफ सीजन 2018-19 में 2.43 लाख हेक्टेयर मेें फसलों की बुवाई का लक्ष्य तय किया गया था। इनमें धान की विभिन्न किस्मों के लिए 207332 हेक्टेयर, मक्का, ज्वार, बाजरा आदि शस्य फसलों के लिए 6848 हेक्टेयर, दलहन के लिए 8877 हेक्टेयर और तिलहनी फसलों के लिए 13244 हेक्टेयर रकबा सुरक्षित किया गया। जून माह में मानसून की लेट लतीफी से बमुश्किल 73 हजार हेक्टेयर मेें धान की रोपाई हो सकी। कृषि वैज्ञानिकों के सुझाव पर किसानों ने धान के रकबा की भरपाई के लिए विकल्प के तौर पर करीब 25 हजार हेक्टेयर से अधिक क्षेत्रफल में मूंगफली, मक्का, ज्वार, बाजरा, उड़द, तिल, सोयाबीन आदि की बुवाई की, लेकिन बाढ़ और भूमि कटान से धान की वैकल्पिक फसलों को ही भारी क्षति पहुंची।
स्वैच्छिक फसली बीमा को प्रीमियम जमा करने से किसान उदासीन
किसानों में योजना के प्रति जागरूकता की कमी कहें या फिर सरकारी तंत्र की ढिलाई कि गत वर्ष प्राकृतिक आपदाओं से फसली क्षति की भरपाई करने वाली प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना का लाभ सिर्फ 163 किसानों को मिल सका। चालू खरीफ सीजन में योजना के प्रचार प्रसार को कृषि विभाग के अथक प्रयास के बावजूद लगभग 80000 गैर ऋणी किसानों में केवल 6000 ने प्रीमियम जमा करके फसलों का बीमा कराया। हालांकि अधिकारियों का कहना है कि जिन किसानों की उपजाऊ जमीनें बाढ़ में कटी हैं, उन्हेें अलग से मुआवजा दिए जाने की व्यवस्था की जाएगी।
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कई गांवों में बहगुल की बाढ़ से फसलें तबाह
जैतीपुर क्षेत्र के गांवों में बहगुल की बाढ़ से फसलों की अधिक तबाही हुई है। भूमि कटान से गांव बमिहाना, पलिहुरा, जगत, धीमरपुरा, कुलुआ बोझ, शंकरपुर सुरजूपुर, गोविंदपुर, मगनपुर, गौहावर, भुड़िया, अवा, कटहा, बकैनिया आदि में नदी के किनारे खड़ी फसलें पूरी तरह नष्ट हो गई हैं। सबसे ज्यादा तिल और उड़द को नुकसान हुआ है। मजरा धिमरपुरा में भी फसलों से लहलहाते खेत नदी में समा चुके हैं। गांव के श्रीपाल, दाताराम, महेंद्र राठौर, वीर सहाय, धर्मेंद्र, नरेश सक्सेना आदि ने बताया कि उनकी लगभग तीन एकड़ जमीन फसलों समेत नदी में समा चुकी है।
खरीफ फसलों का बुवाई क्षेत्रफल (हेक्टेयर मेें)
फसल क्षेत्रफल
0 धान (सभी किस्में) 73807
0 मक्का 3391
0 ज्वार 1127
0 बाजरा 2333
0 उड़द 8467
0 मूंग 39
0 अरहर 371
0 मूंगफली 4206
0 तिल 5476
0 सोयाबीन 25
फोटो 11 में।
ऋणी किसानों को फसली बीमा लाभ स्वत: दिए जाने का प्रावधान है। गैर ऋणी किसानों को बीमा योजना से जोड़ने के लिए खरीफ सीजन में लगभग 60000 किसानों का सर्वे कराकर उनसेे संपर्क किया गया, लेकिन बमुश्किल दस फीसदी किसानों ने प्रीमियम जमा किया। कृषि भूमि का रिकार्ड राजस्व विभाग के पास रहता है इसलिए भूमि कटान का आकलन करने को टाटा एआईजी की सर्वेयर टीम के साथ क्षेत्र के लेखपालों को भी लगाया गया है। तीनों विकास खंडों मेें सर्वेक्षण पूरा होने के बाद ही वास्तविक फसली नुकसान तय हो सकेगा।
-डॉ. सतीश चंद्र पाठक, जिला कृषि अधिकारी
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फसली नुकसान का आकलन को लखनऊ से पहुंची सर्वेयर टीम
0 जलालाबाद, कलान और मिर्जापुर ब्लॉक के गांवों पर फोकस
0 बाढ़ प्रभावित गांवों में भूमि कटान के सर्वे को जुटे लेखपाल
अमर उजाला ब्यूरो
शाहजहांपुर। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के लिए शासन से नामित कार्यदायी संस्था टाटा एग्रीकल्चर इंश्योरेंस ग्रुप के अधिकारियों की सात सदस्यीय टीम सोमवार को लखनऊ से बाढ़ और अतिवृष्टि से जिले में खरीफ फसलों को हुई क्षति का आकलन करने को यहां पहुंच गई है। सर्वेयर टीम के सदस्यों ने प्रशासन समेत कृषि और राजस्व विभाग के अधिकारियों से अनुमानित फसली नुकसान का फीड बैक लेने के साथ जलालाबाद, मिर्जापुर और कलान विकास खंड के गांवों पर फोकस किया है। गंगा-रामगंगा और बहगुल के तटवर्ती गांवों में बाढ़ से हुए भूमि कटान का आकलन करने के लिए राजस्व विभाग के लेखपालों और भूलेख निरीक्षकों को भी जुटाया गया है।
खरीफ सीजन 2018-19 में 2.43 लाख हेक्टेयर मेें फसलों की बुवाई का लक्ष्य तय किया गया था। इनमें धान की विभिन्न किस्मों के लिए 207332 हेक्टेयर, मक्का, ज्वार, बाजरा आदि शस्य फसलों के लिए 6848 हेक्टेयर, दलहन के लिए 8877 हेक्टेयर और तिलहनी फसलों के लिए 13244 हेक्टेयर रकबा सुरक्षित किया गया। जून माह में मानसून की लेट लतीफी से बमुश्किल 73 हजार हेक्टेयर मेें धान की रोपाई हो सकी। कृषि वैज्ञानिकों के सुझाव पर किसानों ने धान के रकबा की भरपाई के लिए विकल्प के तौर पर करीब 25 हजार हेक्टेयर से अधिक क्षेत्रफल में मूंगफली, मक्का, ज्वार, बाजरा, उड़द, तिल, सोयाबीन आदि की बुवाई की, लेकिन बाढ़ और भूमि कटान से धान की वैकल्पिक फसलों को ही भारी क्षति पहुंची।
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स्वैच्छिक फसली बीमा को प्रीमियम जमा करने से किसान उदासीन
किसानों में योजना के प्रति जागरूकता की कमी कहें या फिर सरकारी तंत्र की ढिलाई कि गत वर्ष प्राकृतिक आपदाओं से फसली क्षति की भरपाई करने वाली प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना का लाभ सिर्फ 163 किसानों को मिल सका। चालू खरीफ सीजन में योजना के प्रचार प्रसार को कृषि विभाग के अथक प्रयास के बावजूद लगभग 80000 गैर ऋणी किसानों में केवल 6000 ने प्रीमियम जमा करके फसलों का बीमा कराया। हालांकि अधिकारियों का कहना है कि जिन किसानों की उपजाऊ जमीनें बाढ़ में कटी हैं, उन्हेें अलग से मुआवजा दिए जाने की व्यवस्था की जाएगी।
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कई गांवों में बहगुल की बाढ़ से फसलें तबाह
जैतीपुर क्षेत्र के गांवों में बहगुल की बाढ़ से फसलों की अधिक तबाही हुई है। भूमि कटान से गांव बमिहाना, पलिहुरा, जगत, धीमरपुरा, कुलुआ बोझ, शंकरपुर सुरजूपुर, गोविंदपुर, मगनपुर, गौहावर, भुड़िया, अवा, कटहा, बकैनिया आदि में नदी के किनारे खड़ी फसलें पूरी तरह नष्ट हो गई हैं। सबसे ज्यादा तिल और उड़द को नुकसान हुआ है। मजरा धिमरपुरा में भी फसलों से लहलहाते खेत नदी में समा चुके हैं। गांव के श्रीपाल, दाताराम, महेंद्र राठौर, वीर सहाय, धर्मेंद्र, नरेश सक्सेना आदि ने बताया कि उनकी लगभग तीन एकड़ जमीन फसलों समेत नदी में समा चुकी है।
खरीफ फसलों का बुवाई क्षेत्रफल (हेक्टेयर मेें)
फसल क्षेत्रफल
0 धान (सभी किस्में) 73807
0 मक्का 3391
0 ज्वार 1127
0 बाजरा 2333
0 उड़द 8467
0 मूंग 39
0 अरहर 371
0 मूंगफली 4206
0 तिल 5476
0 सोयाबीन 25
फोटो 11 में।
ऋणी किसानों को फसली बीमा लाभ स्वत: दिए जाने का प्रावधान है। गैर ऋणी किसानों को बीमा योजना से जोड़ने के लिए खरीफ सीजन में लगभग 60000 किसानों का सर्वे कराकर उनसेे संपर्क किया गया, लेकिन बमुश्किल दस फीसदी किसानों ने प्रीमियम जमा किया। कृषि भूमि का रिकार्ड राजस्व विभाग के पास रहता है इसलिए भूमि कटान का आकलन करने को टाटा एआईजी की सर्वेयर टीम के साथ क्षेत्र के लेखपालों को भी लगाया गया है। तीनों विकास खंडों मेें सर्वेक्षण पूरा होने के बाद ही वास्तविक फसली नुकसान तय हो सकेगा।
-डॉ. सतीश चंद्र पाठक, जिला कृषि अधिकारी