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रंगपाल की समाधि का होगा जीर्णोद्धार
अमर उजाला ब्यूरो/ संतकबीरनगर
Updated Sat, 20 Feb 2016 11:39 PM IST
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नगर पंचायत हरिहरपुर स्थित रंगपाल सत्याचरण मालती देवी बालिका विद्यालय के प्रांगण में आयोजित कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि प्रदेश राज्य मंत्री रामकरन आर्य ने कहा कि साहित्य की भाषा मुख्य रुप से अवधी और ब्रज भाषा ही रही है।
इसी लिए हिंदी भाषी कवियों एवं लेखकों ने प्राय: इसी भाषा का प्रयोग अपनी रचनाओं में किया है। महान विभूतियों की जयंती मनाने का अभिप्राय: है कि हम अपनी सांस्कृतिक मर्यादाओं को न भूले और अपने गौरवपूर्ण अतीत को याद रखे।
आगे कहा कि ऋतुरात बंसत पर फाग विधा जैसा कोई साहित्य नहीं है। लोक भाष का हमारी संस्कृति में विशेष स्थान है। रंगपाल की रचनाओं का प्रकाशन भी होना जाना चाहिए।
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कठिनईया नदी के किनारे राजघाट पर स्थित रंगपाल की समाधि जीर्णशीर्ण हाल में पड़ा है। ऐसी स्थिति उपेक्षा को प्रदर्शित करती है। जिसका जीणोद्धार कराने का उनके स्तर से प्रयास होगा।
रंगपाल के वाचनालय में पुस्तकें भी उपलब्ध करवाएंगे। उन्होंने कहा कि हमें अपनी संस्कृति और सभ्यता को मंच के माध्यम से प्रचारित करना चाहिए। नई पीढ़ी सांस्कृतिक विविधता एवं कवि लेखकों के बारे में जाने ऐसा प्रयास होना चाहिए। साम्प्रदायिक सौहार्द को बढ़ावा देने के लिए ऐसे कार्यक्रम आयोजित होने चाहिए। क्षेत्रीय विधायक अलगू चौहान ने कहा कि कवि रंगपाल का जन्म ही फागुनी बहार में हुआ था। इसी लिए इनके फाग गीत लोगों के बीच काफी लोक प्रिय है। कवि ने अपनी रचनाओं में प्रकृति की सुंदरता का जो वर्णन किया है, बहुत ही मनोहारी है।
उन्होंने इस कार्यक्रम में आयोजित कराने के लिए पाल सेवा संस्थान को बधाई दी।
पूर्व चेयरमैन वृजेश पाल ने कहा कि आज लोग अपनी संस्कृति भूलते जा रहे है। इसी लिए इस प्रकार के आयोजनों की प्रासंगिकता और अधिक बढ़ गई है। कवि रंगपाल के गाए गीत आज भी कई देशों में गाए जाते है।
होली में रंगपाल के गीत का गायन करके लोग आनंदित होते है।
कार्यक्रम का शुभारंभ राज्य मंत्री ने कवि रंगपाल की प्रतिमा पर माल्यार्पण व द्वीप प्रज्वलित कर किया इस दौरान देवेश पाल, यशवंत सिंह, राममिलन चतुर्वेदी आदि उपस्थित रहे।
इंसर्ट
फाग गीतों पर झूमे लोग
हरिहरपुर। कवि रंग पाल की जयंती पर आयोजित कार्यक्रम में अजय श्रीवास्तव और कलाम के जरिए गाए गए फाग गीतों पर वहां मौजूद लोग झूम उठे।
कलाम के गाए गीत के बोल थे, कन्हैया संग चलो, गोईया आज खेली होरी के अलावा औरन संग रैना, बिताते हो बालम, भोर भए घर आते--। इन गीतों पर मौजूद लोग झूम उठे।
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इसी लिए हिंदी भाषी कवियों एवं लेखकों ने प्राय: इसी भाषा का प्रयोग अपनी रचनाओं में किया है। महान विभूतियों की जयंती मनाने का अभिप्राय: है कि हम अपनी सांस्कृतिक मर्यादाओं को न भूले और अपने गौरवपूर्ण अतीत को याद रखे।
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आगे कहा कि ऋतुरात बंसत पर फाग विधा जैसा कोई साहित्य नहीं है। लोक भाष का हमारी संस्कृति में विशेष स्थान है। रंगपाल की रचनाओं का प्रकाशन भी होना जाना चाहिए।
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कठिनईया नदी के किनारे राजघाट पर स्थित रंगपाल की समाधि जीर्णशीर्ण हाल में पड़ा है। ऐसी स्थिति उपेक्षा को प्रदर्शित करती है। जिसका जीणोद्धार कराने का उनके स्तर से प्रयास होगा।
रंगपाल के वाचनालय में पुस्तकें भी उपलब्ध करवाएंगे। उन्होंने कहा कि हमें अपनी संस्कृति और सभ्यता को मंच के माध्यम से प्रचारित करना चाहिए। नई पीढ़ी सांस्कृतिक विविधता एवं कवि लेखकों के बारे में जाने ऐसा प्रयास होना चाहिए। साम्प्रदायिक सौहार्द को बढ़ावा देने के लिए ऐसे कार्यक्रम आयोजित होने चाहिए। क्षेत्रीय विधायक अलगू चौहान ने कहा कि कवि रंगपाल का जन्म ही फागुनी बहार में हुआ था। इसी लिए इनके फाग गीत लोगों के बीच काफी लोक प्रिय है। कवि ने अपनी रचनाओं में प्रकृति की सुंदरता का जो वर्णन किया है, बहुत ही मनोहारी है।
उन्होंने इस कार्यक्रम में आयोजित कराने के लिए पाल सेवा संस्थान को बधाई दी।
पूर्व चेयरमैन वृजेश पाल ने कहा कि आज लोग अपनी संस्कृति भूलते जा रहे है। इसी लिए इस प्रकार के आयोजनों की प्रासंगिकता और अधिक बढ़ गई है। कवि रंगपाल के गाए गीत आज भी कई देशों में गाए जाते है।
होली में रंगपाल के गीत का गायन करके लोग आनंदित होते है।
कार्यक्रम का शुभारंभ राज्य मंत्री ने कवि रंगपाल की प्रतिमा पर माल्यार्पण व द्वीप प्रज्वलित कर किया इस दौरान देवेश पाल, यशवंत सिंह, राममिलन चतुर्वेदी आदि उपस्थित रहे।
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फाग गीतों पर झूमे लोग
हरिहरपुर। कवि रंग पाल की जयंती पर आयोजित कार्यक्रम में अजय श्रीवास्तव और कलाम के जरिए गाए गए फाग गीतों पर वहां मौजूद लोग झूम उठे।
कलाम के गाए गीत के बोल थे, कन्हैया संग चलो, गोईया आज खेली होरी के अलावा औरन संग रैना, बिताते हो बालम, भोर भए घर आते--। इन गीतों पर मौजूद लोग झूम उठे।