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Sant Kabir Nagar News: रिटायर्ड जज बनते थे रामलीला के पात्र.. अब खुद करा रहे हैं रामलीला

Wed, 09 Oct 2024 12:02 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, संत कबीर नगर
संवाद न्यूज एजेंसी, संत कबीर नगर Updated Wed, 09 Oct 2024 12:02 AM IST
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Retired judges used to become the characters of Ramlila... now they are making Ramlila themselves.
- सेवानिवृत्त जज गंवई संस्कृत को दे रहे बढ़ावा
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संवाद न्यूज एजेंसी
धर्मसिंहवा। मेंहदूपार गांव की शख्सियत राघवेंद्र प्रसाद पांडेय वर्ष 1966 के दौरान गांव में रामलीला का पात्र बनते थे। उससे जो धन अर्जित होता था वे अपनी पढ़ाई लिखाई और पहनावे के लिए इस्तेमाल करते थे। बाद में जज बने और अब सेवानिवृत्त होकर खुद रामलीला करवा रहें हैं।
महत्वाकांक्षी विचारधारा रखने वाले राघवेंद्र पांडेय बताते हैं कि शिक्षा को लेकर हमेशा अग्रसर रहे पिता पढ़ाई कराने में असमर्थता जाहिर करने के बाद भी हिम्मत नहीं हारे और हाईस्कूल व इंटर में जिला टॉप किए। स्नातक में भी गोरखपुर विश्वविद्यालय के टॉपर रहे। टॉपर रहने के कारण उन्हें राष्ट्रीय छात्रवृत्ति भी मिलती रही। बाद में विधि की पढ़ाई किए बीच-बीच में इस दौरान गांव में पारंपरिक होने वाले रामलीला का पात्र भी निभाते रहे।
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बताया कि कभी लक्ष्मण बनते थे और कभी श्रीराम। मंचीय प्रतिभा देख-देख कर मेरे अंदर जज्बा उत्पन्न हो रहा था। राघवेंद्र ने बताया कि अपने गांव मेंहदूपार रामलीला कार्यक्रम में उनकी सहभागिता महत्वपूर्ण मानी जाती थी। आयोजक समिति के लोग उनकी महत्वाकांक्षा को ध्यान में रखते हुए कि सहयोग के रूप में कुछ धन और पहनावे में वस्त्र दे दिया करते थे। उसे जो मिलता था खुश मन से स्वीकार करते हुए अपनी पढ़ाई को आगे बढ़ाते रहे।
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इसी बीच कुछ लोगों के सहयोग से कानपुर चला गए और वहां पर विधि की पढ़ाई की और पीसीएस-जे की तैयारी करने लगा। पहले ही बार में वर्ष 1986 में पीसीएस-जे क्वालिफाइड कर लिए और न्यायिक अधिकारी बन गए। मेंहदूपार में शतचंडी महायज्ञ का यह तीसरा वर्ष है। जब उन्हें जानकारी हुआ तो सहयोग के लिए कुछ न कुछ भेजते रहे। राघवेंद्र पांडेय इस वर्ष यज्ञ व रामलीला कार्यक्रम में पूरा समय दे रहे हैं और मंच के माध्यम से अपनी संस्कृति के प्रति प्रेरित करते हुए दिख रहे हैं।




इस घटना से न्यायिक सेवा में आने की मिली प्रेरणा

सेवानिवृत हो चुके न्यायिक अधिकारी राघवेंद्र प्रसाद पांडेय ने बताया कि वर्ष 1974 में छात्रवृत्ति के आवेदन के लिए अपने शैक्षणिक प्रमाणपत्र अटेस्ट कराने के लिए बांसी सिद्धार्थनगर गए हुए थे। कोई गजेटेड अधिकारी नहीं मिला तो बांसी मुंसफ के यहां ऑफिस में ‘आई कम इन’ कर कह कर चले गए। मुंसफ ने डाटा ही नहीं बल्कि कोर्ट मोहर्रिर को गिरफ्तार कर जेल भेज देने का आदेश दिया। बताया कि मुंसफ का पैर पड़कर रोने लगे, बाद में उन्हें छोड़ दिया गया। लेकिन इस ऑफिस में तैनात एक चपरासी जो मेरा परिचित था मेरे डाक्यूमेंट ले जाकर उसी जज साहब से टेस्ट करवा कर लाकर दिया। उस दिन वह ठान लिए कि अब जज बनकर दिखाऊंगा। लखनऊ में पहली पोस्टिंग के दौरान वही जज साहब जब जूनियर डिवीजन के पद पर पोस्ट हुए थे तब मैंने उन्हें पुरानी घटना को याद दिलाया हालांकि वह कुछ कह नहीं पर शर्मिंदा हुए। बताया कि कानपुर पोस्टिंग के दौरान कानपुर से लखनऊ आते वक्त वही जज छह दिसंबर 1994 को मेरे साथ आ रहे थे और ट्रेन में ही हृदय गति रुक जाने से उनकी मौत मेरे गोद में हुई। बताया कि मैं उस समय भी काफी रोया और महसूस किया कि पद एवं संपन्नता पर अहंकार नहीं करना चाहिए।
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