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Sant Kabir Nagar News: प्रभुनाथ की मौत पर उठे सवाल
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संवाद न्यूज एजेंसी
धनघटा। क्षेत्र के संठी गांव में किसान प्रभुनाथ प्रजापति की आत्महत्या के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या तहसील प्रशासन और चकबंदी विभाग किसान की मौत का इंतजार कर रहा था। यदि समय रहते उसकी शिकायतों पर सुनवाई होती, तो शायद यह त्रासदी नहीं होती।
गांव में दबी जुबान से यह चर्चा तेज है कि चकबंदी प्रक्रिया के दौरान पैसे के दम पर खेतों की हेरफेर की गई। आरोप है कि जिनके पास धन है, उनके खेत अच्छी जगह कर दिए गए हैं, और जिनके पास देने को कुछ नहीं, उनकी उपजाऊ जमीन ताल और कम उपजाऊ क्षेत्रों में डाल दी जा रही है। प्रभुनाथ प्रजापति भी इसी स्थिति का शिकार बने।
ग्रामीणों का कहना है कि मृतक को चकबंदी कार्यालय के लगातार चक्कर लगाने पड़े, लेकिन उसकी आपत्तियों को गंभीरता से नहीं लिया गया। अब उसकी मौत के बाद सहायता और जांच की बातें हो रही हैं। लोगों के बीच यह सवाल गूंज रहा है कि क्या किसान की जान जाने के बाद ही प्रशासन को पीड़ा दिखाई देती है।
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गांव में यह भी चर्चा है कि सरकार से मिलने वाली आर्थिक सहायता (धनराशि) से परिवार की तात्कालिक मदद तो हो सकती है, लेकिन क्या इससे किसान की जान लौटाई जा सकती है या चकबंदी से हुई कथित लूट की भरपाई संभव है। ग्रामीणों और पीड़ित परिवार की मांग है कि लेखपाल, सहायक चकबंदी अधिकारी चकबंदी और कथित दलालों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की जाए, लेकिन भय के कारण कोई भी किसान खुलकर सामने आने को तैयार नहीं है।
किसानों का कहना है कि यदि उन्होंने खुलकर विरोध किया तो हमारा खेत भी इधर-उधर कर दिया जाएगा।
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धनघटा। क्षेत्र के संठी गांव में किसान प्रभुनाथ प्रजापति की आत्महत्या के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या तहसील प्रशासन और चकबंदी विभाग किसान की मौत का इंतजार कर रहा था। यदि समय रहते उसकी शिकायतों पर सुनवाई होती, तो शायद यह त्रासदी नहीं होती।
गांव में दबी जुबान से यह चर्चा तेज है कि चकबंदी प्रक्रिया के दौरान पैसे के दम पर खेतों की हेरफेर की गई। आरोप है कि जिनके पास धन है, उनके खेत अच्छी जगह कर दिए गए हैं, और जिनके पास देने को कुछ नहीं, उनकी उपजाऊ जमीन ताल और कम उपजाऊ क्षेत्रों में डाल दी जा रही है। प्रभुनाथ प्रजापति भी इसी स्थिति का शिकार बने।
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ग्रामीणों का कहना है कि मृतक को चकबंदी कार्यालय के लगातार चक्कर लगाने पड़े, लेकिन उसकी आपत्तियों को गंभीरता से नहीं लिया गया। अब उसकी मौत के बाद सहायता और जांच की बातें हो रही हैं। लोगों के बीच यह सवाल गूंज रहा है कि क्या किसान की जान जाने के बाद ही प्रशासन को पीड़ा दिखाई देती है।
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गांव में यह भी चर्चा है कि सरकार से मिलने वाली आर्थिक सहायता (धनराशि) से परिवार की तात्कालिक मदद तो हो सकती है, लेकिन क्या इससे किसान की जान लौटाई जा सकती है या चकबंदी से हुई कथित लूट की भरपाई संभव है। ग्रामीणों और पीड़ित परिवार की मांग है कि लेखपाल, सहायक चकबंदी अधिकारी चकबंदी और कथित दलालों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की जाए, लेकिन भय के कारण कोई भी किसान खुलकर सामने आने को तैयार नहीं है।
किसानों का कहना है कि यदि उन्होंने खुलकर विरोध किया तो हमारा खेत भी इधर-उधर कर दिया जाएगा।