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ड्रम सीडर तकनीक से कम लागत में उपजाएं ज्यादा धान : डॉ. अरविंद

Wed, 26 Apr 2023 11:26 PM IST
गोरखपुर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, संत कबीर नगर
संवाद न्यूज एजेंसी, संत कबीर नगर Updated Wed, 26 Apr 2023 11:26 PM IST
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Produce more paddy in less cost with drum seeder technique
धनघटा। कृषि विज्ञान केंद्र बगही पर बुधवार को ड्रम सीडर मशीन से धान की सीधी बुवाई की तकनीकी की जानकारी देने के लिए दो दिवसीय रोजगार परक प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस दौरान कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों को खेती के टिप्स दिए। बताया गया कि ड्रम सीडर तकनीक से कम लागत में ज्यादा धान की उपज पा सकते हैं।
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कृषि विज्ञान केंद्र वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं अध्यक्ष डॉ. अरविंद कुमार सिंह ने बताया कि ड्रम सीडर तकनीक से धान की बोवाई के समय खेत में कीचड़ जैसी भूमि होनी चाहिए। अधिक जलस्तर नहीं होना चाहिए। इतना जल हो, जिससे ड्रम सीडर आसानी से खेत में चल सके। लेव लगाने के 5-6 घंटे के अंदर ही ड्रम सीडर के जरिए धान की सीधी बुवाई कर देनी चाहिए। उन्होंने कहा कि परंपरागत तरीके से धान की रोपाई करने में रोपाई के लिए श्रमिकों की समुचित उपलब्धता एक बड़ी समस्या बनती जा रही है। इसके साथ ही श्रमिकों के बढ़े मेहनताने के चलते धान की खेती की लागत बढ़ जाती है।
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किसान धान की छिटकवा विधि से सीधी बुवाई करने लगे हैं, लेकिन छिटकवा विधि से धान की बुवाई करने पर खेत में जमे हुए धान के पौधों में समानता नहीं होती। साथ ही पौधों की कम संख्या जमती है। इन सब समस्याओं को ध्यान में रखते हुए कृषि वैज्ञानिकों ने ड्रम सीडर तकनीक ईजाद की। जनपद के विकास खंड हैसर बाजार गांव के प्रगतिशील कृषक राघवेंद्र प्रताप सिंह ने बताया कि धान की बीपीटी-5204 प्रजाति की बुवाई एक बीघा में ड्रम सीडर खेती से की थी। ड्रम सीडर तकनीक से धान के एक हेक्टेयर खेत की बुवाई एक श्रमिक मात्र दो दिनों में कर लेता है। इस हिसाब से धान की एक हेक्टेयर की बुवाई दो श्रमिकों की मजदूरी की लागत में हो जाती है। वहीं, परंपरागत विधि से धान के एक हेक्टेयर खेत की रोपाई में लगभग पचास श्रमिकों की मजदूरी की लागत आती है।
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वैज्ञानिक कृषि अभियांत्रिकी अनुभाग के वैज्ञानिक डॉ. देवेश कुमार ने ड्रम सीडर मशीन की विस्तार से जानकारी दी तथा ड्रम सीडर मशीन में बीज भरने के लिए चार प्लास्टिक के खोखले ड्रम सरीके बने होते हैं, जो कि एक बेलन पर बंधे रहते हैं। बेलन के दोनों किनारे पर पहिए लगे हुए हैं, जिनका व्यास लगभग 60 सेंटीमीटर का होता है। ड्रम में दो पंक्तियों पर लगभग 8-9 मिलीमीटर व्यास के छिद्र बने हुए हैं, जिससे बीज गिरते हैं। इस मशीन के प्रयोग से मजदूरी की काफी बचत हो जाती है। इस दौरान वैज्ञानिक डॉ. राघवेंद्र सिंह, डॉ. तरुन कुमार, प्रगतिशील कृषक चंद्रकांत पांडेय, चंद्र प्रकाश शुक्ला, मो. फारुख खान, राम रतन भास्कर आदि उपस्थित रहे।
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