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Sant Kabir Nagar News: कोर्ट की कसौटी पर खरी नहीं उतरी पुलिस की विवेचना, विवेचकों पर हो सकती है कार्रवाई

Tue, 21 Jul 2026 11:32 PM IST
Gorakhpur Bureau गोरखपुर ब्यूरो
Updated Tue, 21 Jul 2026 11:32 PM IST
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Police investigation fails to stand up to judicial scrutiny; action may be taken against the investigating officers.
संतकबीरनगर। अरुण उर्फ डग्गू हत्याकांड में आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी करने के साथ ही अदालत ने पुलिस विवेचना की कार्यशैली पर भी कड़ी टिप्पणी की है। अपर सत्र न्यायाधीश/ विशेष न्यायाधीश (एससी-एसटी एक्ट) चंद्रमोहन श्रीवास्तव की अदालत ने फैसले में कहा कि विवेचना में ऐसी गंभीर कमियां रहीं, जिनसे परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की शृंखला पूरी नहीं हो सकी और अभियोजन आरोप साबित करने में विफल रहा। इसके साथ ही कोर्ट ने विवेचकों पर कार्रवाई के भी आदेश दिए हैं।
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फैसले में प्रथम विवेचक उपनिरीक्षक प्रतिभा सिंह और बाद में विवेचना संभालने वाले कोतवाल निरीक्षक विजय नारायण प्रसाद की कार्रवाई पर सवाल उठाए गए हैं। अदालत ने कहा कि शव बरामद होने के बाद तत्काल घटनास्थल और शव मिलने के स्थान का समुचित निरीक्षण नहीं किया गया न ही वादी की निशानदेही पर घटनास्थल का नक्शा तैयार किया गया।
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इसके विपरीत, अभियुक्तों की गिरफ्तारी के बाद उनकी निशानदेही पर नक्शा तैयार किया गया, जिससे विवेचना की निष्पक्षता पर संदेह उत्पन्न होता है।
अदालत ने यह भी पाया कि मामले के कुछ महत्वपूर्ण गवाहों के बयान घटना के लगभग 19 दिन बाद दर्ज किए गए। इन्हीं बयानों के आधार पर अभियोजन ने अंतिम बार साथ देखे जाने (लास्ट सीन) की कहानी प्रस्तुत की लेकिन इतनी देरी का संतोषजनक कारण विवेचना के दौरान सामने नहीं आ सका।
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न्यायालय ने इसे अभियोजन की कहानी की विश्वसनीयता पर असर डालने वाला महत्वपूर्ण पहलू माना। निर्णय में कहा गया है कि विवेचना के दौरान घटनास्थल से ऐसा कोई स्वतंत्र भौतिक साक्ष्य एकत्र नहीं किया गया, जो अभियुक्तों को सीधे अपराध से जोड़ता हो।
अभियुक्तों की निशानदेही पर की गई बरामदगी और अन्य कार्रवाई में भी स्वतंत्र गवाहों की मौजूदगी नहीं रही, जिससे इन साक्ष्यों की प्रमाणिकता कमजोर हुई।
मामले में पंचायतनामा करने वाले उपनिरीक्षक मनोज कुमार पटेल ने भी न्यायालय में बयान दिया कि शव का पंचायतनामा तैयार करते समय मृतक के परिजन ने किसी भी व्यक्ति पर हत्या का आरोप नहीं लगाया और न ही किसी अभियुक्त का नाम बताया था।
अदालत ने इस तथ्य को भी महत्वपूर्ण माना कि बाद में सामने आई अभियोजन की कहानी शुरुआती परिस्थितियों से मेल नहीं खाती।
अदालत ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया कि केवल संदेह या अधूरी परिस्थितियों के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की प्रत्येक कड़ी संदेह से परे स्थापित होना आवश्यक है, चूंकि इस मामले में विवेचना कई महत्वपूर्ण बिंदुओं पर कमजोर रही, इसलिए अभियोजन आरोप सिद्ध करने में असफल रहा और आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया गया। संवाद

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यह था मामला
चार मार्च 2022 को सात वर्षीय अरुण उर्फ डग्गू, पुत्र स्वर्गीय अमरनाथ, निवासी मटिहना घर से लापता हो गया। उसकी मां प्रमिला देवी ने पांच मार्च को कोतवाली खलीलाबाद में गुमशुदगी दर्ज कराई। अगले दिन छह मार्च को थाना महुली क्षेत्र के राजघाट पुल के पास कठिनइया नाले के किनारे झाड़ियों से बालक का शव बरामद हुआ। इसके बाद प्राथमिकी में हत्या और साक्ष्य मिटाने की धाराएं बढ़ाई गईं। मां प्रमिला देवी ने पुलिस को दी तहरीर में गांव के रविचंद्र उर्फ मंटू पर आरोप लगाया कि वह हमें प्रताड़ित करता था। विरोध करने पर बेटे को जान से मारने की धमकी दी थी। इसी रंजिश में अपने साथी धनेश्वर उर्फ झिंगेलाल के साथ मिलकर अरुण की हत्या कर शव झाड़ियों में फेंक दिया गया।
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कोर्ट के आदेश का परिशीलन किया जाएगा। साथ ही विधि विशेषज्ञाें से राय लेकर मामले में आगे की रणनीति तय की जाएगी।
-संदीप कुमार मीना, एसपी
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