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फीस जमा नहीं हुई तो स्कूल से निकाल दिए दोनों बच्चे

Mon, 17 Oct 2022 11:25 PM IST
Gorakhpur Bureau गोरखपुर ब्यूरो
Updated Mon, 17 Oct 2022 11:25 PM IST
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If the fees are not deposited, then both the children were expelled from the school.
फीस जमा नहीं हुई तो स्कूल से निकाल दिए दोनों बच्चे
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कोरोना से पति खो चुकीं महिलाओं ने सुनाई दुख भरी दास्तान
संतकबीरनगर। कोरोना काल में पति की मौत हुई तो घर की माली हालात खराब हो गई। जब तक पति जिंदा थे, मेहनत मजदूरी कर बच्चों का भरण-पोषण और उनकी पढ़ाई करा रहे थे, लेकिन उनकी मौत के बाद घर की आर्थिक स्थिति इस कदर बिगड़ी कि फीस न जमा कर पाने के चलते बच्चों को स्कूल से ही निकाल दिया गया। मुख्यमंत्री बाल सेवा योजना से मिलने वाली मदद जब बंद हो गई तब दो वक्त की रोटी भी मोहाल होने लगी। ऐसी दांस्ता बताते हुए महिला फफक कर रो पड़ी।
बेलहर क्षेत्र की रहने वाली पीड़िता ने बताया कि जब पति की मौत हुई तो बड़ी बेटी की उम्र 14 साल, बेटे की आयु 12 साल थी। दो छोटे बच्चे भी हैं। सीएम बाल सेवा योजना से उम्मीद बंधी कि स्थिति कुछ सुधर जाएगी। चार बच्चों में केवल एक बच्चे के नाम से एक किस्त की रकम खाते में आई थी। वह भी अप्रैल से बंद है। फीस न जमा कर पाने के चलते जिस स्कूल में बच्चे पढ़ाई कर रहे थे, उस स्कूल से उन्हें निकाल दिया गया।
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इंसेट
प्राइवेट स्कूल में पढ़ाकर कर रहीं जीवन यापन
दो साल पहले कोरोना से जब पति की मौत हुई तो बेटी चार साल की थी। एक ओर पति की मौत का गम तो दूसरी ओर बेटी की परवरिश की चिंता। जब बेटी की पढ़ाई और उसकी परवरिश का इंतजाम होना मुश्किल हो गया तो प्राइवेट स्कूल में पढ़ाकर दो वक्त की रोटी और बेटी के पढ़ाई की व्यवस्था की, लेकिन स्कूल से मिलने वाली रकम इतनी कम है कि उससे जीवन यापन कठिन हो गया।
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खलीलाबाद शहर की रहने वाली महिला ने कहा कि बुरे वक्त में अपनों ने भी किनारा कर लिया। अब बेटी की पढ़ाई और उसका पालन पोषण कठिन हो गया है। सीएम बाल सेवा योजना से मिलने वाली रकम भी मिलनी बंद हो गई है।
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इंसेट
मजदूरी कर जीवन गुजारने की मजबूरी
पति की कोरोना से हुई मौत के सदमे से निजात मिली नहीं कि बच्चों के परवरिश की चिंता ने पीड़ा को और बढ़ा दी। सीएम बाल सेवा योजना की उम्मीद भी जिम्मेदारों की चौखट पर दम तोड़ गई। मजबूरी में बच्चों के भरण पोषण के लिए मजदूरी करने लगी।

खलीलाबाद शहर की पीड़ित महिला ने बताया कि पति की मौत ते बाद सरकार की घोषणा ने बच्चों के परवरिश की उम्मीदें बढ़ा दी थीं। बार-बार योजना से जुड़े जिम्मेदारों के पास दौड़ लगाती रही, लेकिन योजना की रकम नसीब नहीं हुई। उसने बताया कि दो साल पहले पति की मौत हुई , तब बड़ा बेटा बारह साल और छोटा बेटा सात साल का था। घर में और कोई सहयोगी न होने से जीवन यापन करना बेहद कठिन हो गया था। थक हारकर बच्चों की पढ़ाई और दो वक्त की रोटी के इंतजाम के लिए बेकरी में काम करना शुरू किया। फिर भी मिलने वाली रकम से गुजारा होना मुश्किल हो रहा है।
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