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हादसे से टूट गए दो परिवारों के ‘सपने’

Sun, 23 Apr 2017 11:41 PM IST
Sant Kabir Nagar
Sant Kabir Nagar Updated Sun, 23 Apr 2017 11:41 PM IST
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Two 'families of dreams' broken by accident
बेटेे अर्जुन की मौत पर विलाप करते घ्‍ारवालेे। - फोटो : अमर उजाला
सड़क हादसे में दो मित्रों की मौत से दो परिवारों पर गम का पहाड़ टूट पड़ा। पान विक्रेता संजय दो साल पहले पत्नी की मौत के बाद जिस बेटे के सहारे सपनों का संसार संजो रहे थे, वह भी खत्म हो गया। वहीं आठ साल पहले पति की मौत के बाद कुसुमावती ने भी बड़े बेटे के सहारे सपने संजोए थे। हादसे ने उनका जख्म दोगुना कर दिया। पोस्टमार्टम हाउस पर पहुंचे दोनों के घरवालों का विलाप सुनकर वहां मौजूद लोगों की आंखों से भी आंसू छलक उठे।
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शहर के बरईटोला के रहने वाले 55 वर्षीय संजय चौरसिया इकलौते बेटे सतपाल चौरसिया की मौत की खबर पर बेसुध हो गए। किसी तरह वार्ड सभासद अवधेश चौरसिया के साथ पोस्टमार्टम हाउस पहुंचे। यहां बेटे का शव देख कर सिर पकड़ लिया। फफक कर रोते हुए संजय ने बताया कि दो साल पहले पत्नी सुभद्रा की बीमारी से मौत हो गई थी। उनके पास इकलौता बेटा सतपाल था। जबकि तीन बेटियाें में दो बेटियों की शादी कर चुके हैं। अब वे इकलौते बेटे, छोटी बेटी रुबी और बुजुर्ग पिता परमेश्वर प्रसाद के साथ जीवन गुजार रहे थे।
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मुखलिसपुर रोड पर छोटी सी पान की गुमटी में पान बेच कर पत्नी के खोने का जख्म भुलाने की कोशिश कर रहे थे। बेटे का भविष्य संभारने के लिए पान बेच कर ब्लूमिंग बर्ड्स एकेडमी में 12 वीं में पढ़ा रहे थे। उम्मीद थी कि बेटा पढ़ लिखकर नाम करेगा और उसकी शादी कर देंगे तो बुढ़ापे में बेटे-बहू के सहारे जीवन गुजर जाएगा। हादसे ने तो उनके घर का चिराग ही बुझा दिया। अब जीवन का मकसद ही समाप्त हो गया। इतना बताते ही संजय सिर पकड़ गुमसुम हो गए। संजय के बुजुर्ग पिता परमेश्वर भी पोते की मौत से गमगीन थे। 
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इधर, बगहिया की रहने वाली बेवा कुसमावती और उनकी बड़ी 22 वर्षीय बेटी गुड़िया और 12 वर्षीय छोटी बेटी आराधना और नौ वर्षीय छोटा बेटा करन विलाप कर रहे थे। कुरेदने पर कुसमावती ने सिर्फ इतना बताया कि उसके बड़े होनहार बेटे अर्जुन की हादसे में हुई मौत ने परिवार पर कहर बरपा दिया। शोकाकुल परिवार वाले आगे कुछ भी बता पाने की स्थिति में नहीं थे। पूर्व सभासद धर्मेंद्र कुमार ने बताया कि इस परिवार के मुखिया स्वर्गीय मोहन राजगीर मिस्त्री थे और उनका छोटा नौ वर्षीय बेटा करन जब मां की गर्भ में था, तभी पिता मोहन की मौत हो गई थी। बेवा कुसमावती मेहनत मजदूरी करके बड़े बेटे अर्जुन को शहर के ब्लूूमिग बर्ड्स एकेडमी में पढ़ा रही थीं।


बेटा 12 वीं में पढ़ रहा था। पूरे परिवार को उम्मीद थी कि होनहार बेटा पढ़ कर अफसर बनेगा तो उनके घर की माली हालत सुधर जाएगी, लेकिन कुदरत को यह मंजूर नहीं था। बड़ी बेटी के हाथ भी कुसमावती अभी पीला नहीं कर पाई हैं। बड़े बेटे की मौत से यह परिवार पूरी तरह बिखर गया। पोस्टमार्टम हाउस पर जुटी भीड़ मां-बेटियों की स्थिति को देख कर गमगीन हो गईं। यहां तक की वहां मौजूद लोगों और पुलिस वालों की आंखें भी भर आईं।
 
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