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Sant Kabir Nagar News: इस्लामिक साल शुरू होते ही बजने लगे मातमी ढोल
Sat, 22 Jul 2023 01:43 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, संत कबीर नगर
संवाद न्यूज एजेंसी, संत कबीर नगर
Updated Sat, 22 Jul 2023 01:43 AM IST
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सेमरियावां क्षेत्र में मोहर्रम को लेकर ताजिया बनना शुरू हुआ।
सेमरियावां। जिले में मोहर्रम के जुलूस की तैनारियां पूरी हो चुकी हैं। इस्लामिक नया साल शुरू होते ही मुस्लिम बाहुल्य मुहल्लों में मातमी धुनों पर ढोल की सुनाई देने लगी है। पैगंबर हजरत मोहम्मद के नवासे इमाम हुसैन की याद में मस्जिद और मुहल्लों में जंगनामा पढ़ा जा रहा है। इसमें इमाम हुसैन की बहादुरी, हक, डटे रहना और मरसिया पढ़कर फातिहा दिलाया जा रहा है।
सन 61 हिजरी (680वीं) में इराक के कर्बला में पैगंबर हजरत मोहम्मद साहब के नवासे इमाम हुसैन समेत उनके 72 साथी शहीद हो गए थे। यह जंग इराक के कर्बला में यजीद की सेना और हजरत इमाम हुसैन के बीच हुई थी। इस जंग में इमाम हुसैन ने इस्लाम की रक्षा के लिए अपने 72 साथियों के साथ शहादत दी थी। इमाम हुसैन और उनके साथियों की शहादत के गम में मोहर्रम मनाया जाता है। इसलिए मुस्लिम समुदाय के लोगों के लिए मोहर्रम का महीना गम का महीना होता है।
मौलाना कुमैल अशरफ कहते हैं कि मोहर्रम के महीने में इस्लाम की वका के लिए 10वीं तारीख को हजरत इमाम हुसैन भूखे प्यासे कर्बला के रेतीले मैदान में शहीद हो गए थे। उन्होंने शहीद होना मुनासिब समझा, लेकिन यजीद की खिलाफत को मंजूर नहीं किया। कर्बला की जंग हक और बातिल के दरम्यान थी। हुसैन हक पर थे। दीन-ए-इस्लाम को बचाना चाहते थे लेकिन यजीदी लश्कर ने इमाम हुसैन को कर्बला के मैदान में 14 सौ साल पहले शहीद कर दिया था। इमाम हुसैन ने अपनी शहादत से पूरी दुनिया को यह पैगाम दिए थे कि जुल्म के सामने कभी सिर झुकाने की जरूरत नहीं है।
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सन 61 हिजरी (680वीं) में इराक के कर्बला में पैगंबर हजरत मोहम्मद साहब के नवासे इमाम हुसैन समेत उनके 72 साथी शहीद हो गए थे। यह जंग इराक के कर्बला में यजीद की सेना और हजरत इमाम हुसैन के बीच हुई थी। इस जंग में इमाम हुसैन ने इस्लाम की रक्षा के लिए अपने 72 साथियों के साथ शहादत दी थी। इमाम हुसैन और उनके साथियों की शहादत के गम में मोहर्रम मनाया जाता है। इसलिए मुस्लिम समुदाय के लोगों के लिए मोहर्रम का महीना गम का महीना होता है।
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मौलाना कुमैल अशरफ कहते हैं कि मोहर्रम के महीने में इस्लाम की वका के लिए 10वीं तारीख को हजरत इमाम हुसैन भूखे प्यासे कर्बला के रेतीले मैदान में शहीद हो गए थे। उन्होंने शहीद होना मुनासिब समझा, लेकिन यजीद की खिलाफत को मंजूर नहीं किया। कर्बला की जंग हक और बातिल के दरम्यान थी। हुसैन हक पर थे। दीन-ए-इस्लाम को बचाना चाहते थे लेकिन यजीदी लश्कर ने इमाम हुसैन को कर्बला के मैदान में 14 सौ साल पहले शहीद कर दिया था। इमाम हुसैन ने अपनी शहादत से पूरी दुनिया को यह पैगाम दिए थे कि जुल्म के सामने कभी सिर झुकाने की जरूरत नहीं है।
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