{"_id":"62e96f0201176a50b853c83b","slug":"appearance-of-school-with-own-money-khalilabad-news-gkp4458358155","type":"story","status":"publish","title_hn":"खुद की रकम से संवारी विद्यालय की सूरत","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
खुद की रकम से संवारी विद्यालय की सूरत
विज्ञापन
प्राथमिक विद्यालय डिहुलिया में बच्चों को पढ़ाते प्रधानाध्यापक।
- फोटो : KHALILABAD
खुद की रकम से संवारी विद्यालय की सूरत
परिषदीय विद्यालय डिहुलिया में नामांकित हैं 97 विद्यार्थी
बिना प्रार्थनापत्र के किसी भी बच्चे को नहीं मिलती छुट्टी
बखिरा(संतकबीरनगर)। हौसले बुलंद हों तो किसी भी काम को आसानी से किया जा सकता है। कुछ ऐसा ही उदाहरण प्राथमिक विद्यालय डिहुलिया के प्रधानाध्यापक जयप्रकाश ने पेश की है। उन्होंने क्षेत्र में शिक्षा की अलख जगाई है। खुद की रकम खर्च कर विद्यालय की सूरत बदली। यही वजह है कि विद्यालय में 97 बच्चे पढ़ाई कर रहे हैं।
डिहुलिया गांव में कुछ वर्ष पहले तक अवैध शराब की बिक्री होती थी। अशिक्षा यहां की पहचान थी। बच्चे भी घर वालों का हाथ बंटाते थे। डिहुलिया प्राथमिक विद्यालय पांच वर्ष पहले तक बदहाल था। नाम मात्र के बच्चे ही यहां शिक्षा के लिए आते थे। प्रधानाध्यापक जयप्रकाश ने पांच साल पहले कार्यभार संभालने के बाद विद्यालय का कायाकल्प करने का संकल्प लिया।
प्रधानाध्यापक ने बताया कि स्वयं के प्रयास से विद्यालय की मरम्मत कराई। फर्श में टाइल्स लगवाया। विद्यालय में पेंटिंग का कार्य कराते हुए अभिभावकों से मिलकर बच्चों को स्कूल भेजने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने बताया कि कक्षा एक से पांचवीं तक के सभी 97 बच्चे यूनिफार्म में स्कूल आते हैं। उनकी उपस्थिति प्रतिदिन अमूमन सौ प्रतिशत रहती है।
विज्ञापन
प्रार्थनापत्र मिलने के बाद ही बच्चों की छुट्टी मंजूद की जाती है। बच्चों की सरल विधा से पढ़ाई के लिए बड़े-बड़े चार्ट के इंतजाम किए गए हैं। खेलकूद की गतिविधियों में शामिल करने के लिए कैरम, चैस, फुटबॉल, रस्सी व खिलौने की व्यवस्था है।
विज्ञापन
परिषदीय विद्यालय डिहुलिया में नामांकित हैं 97 विद्यार्थी
बिना प्रार्थनापत्र के किसी भी बच्चे को नहीं मिलती छुट्टी
बखिरा(संतकबीरनगर)। हौसले बुलंद हों तो किसी भी काम को आसानी से किया जा सकता है। कुछ ऐसा ही उदाहरण प्राथमिक विद्यालय डिहुलिया के प्रधानाध्यापक जयप्रकाश ने पेश की है। उन्होंने क्षेत्र में शिक्षा की अलख जगाई है। खुद की रकम खर्च कर विद्यालय की सूरत बदली। यही वजह है कि विद्यालय में 97 बच्चे पढ़ाई कर रहे हैं।
डिहुलिया गांव में कुछ वर्ष पहले तक अवैध शराब की बिक्री होती थी। अशिक्षा यहां की पहचान थी। बच्चे भी घर वालों का हाथ बंटाते थे। डिहुलिया प्राथमिक विद्यालय पांच वर्ष पहले तक बदहाल था। नाम मात्र के बच्चे ही यहां शिक्षा के लिए आते थे। प्रधानाध्यापक जयप्रकाश ने पांच साल पहले कार्यभार संभालने के बाद विद्यालय का कायाकल्प करने का संकल्प लिया।
विज्ञापन
प्रधानाध्यापक ने बताया कि स्वयं के प्रयास से विद्यालय की मरम्मत कराई। फर्श में टाइल्स लगवाया। विद्यालय में पेंटिंग का कार्य कराते हुए अभिभावकों से मिलकर बच्चों को स्कूल भेजने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने बताया कि कक्षा एक से पांचवीं तक के सभी 97 बच्चे यूनिफार्म में स्कूल आते हैं। उनकी उपस्थिति प्रतिदिन अमूमन सौ प्रतिशत रहती है।
विज्ञापन
प्रार्थनापत्र मिलने के बाद ही बच्चों की छुट्टी मंजूद की जाती है। बच्चों की सरल विधा से पढ़ाई के लिए बड़े-बड़े चार्ट के इंतजाम किए गए हैं। खेलकूद की गतिविधियों में शामिल करने के लिए कैरम, चैस, फुटबॉल, रस्सी व खिलौने की व्यवस्था है।