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पांच साल से मुक्ति को तरस रहा मुक्ति धाम
Sant kabir nagar
Updated Mon, 20 Oct 2014 05:30 AM IST
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अंबरीष मिश्र
संतकबीरनगर। बेलहर विकास खंड के आमी नदी के तट पर राजघाट पुल के पास अर्धनिर्मित मुक्तिधाम पांच सालों से मुक्ति के लिए तरस रहा है। दरअसल, बगैर अनुमति वन विभाग की जमीन में मुक्तिधाम का निर्माण कराया जा रहा था। वन विभाग के हस्तक्षेप के बाद ठेकेदार निर्माण कार्य छोड़कर फरार हो गया।
वर्ष 2008 में आमी नदी पर राजघाट पुल के पास एक जनप्रतिनिधि की निधि से मुक्तिधाम का निर्माण प्रारंभ हुआ था। कार्यदायी संस्था आरईएस ने एक ठेकेदार को निर्माण का जिम्मा सौंपा था। इसके लिए प्लेटफार्म और खंभे बना दिए गए। इसी दौरान वन विभाग ने इसे अपनी भूमि बताते हुए निर्माण कार्य बंद करा दिया। इसके बाद ठेकेदार लापता हो गया। इसके बाद वन विभाग ने अवैध तरीके से मुक्ति धाम का निर्माण कराए जाने के आरोप में वन अधिनियम के तहत विभाग में आरईएस के एक जेई और ठेकेदार के खिलाफ मुकदमा भी दर्ज किया था। ऐसे में यदि भूमि वन विभाग की थी तो बिना अनुमति निर्माण की स्वीकृति कैसे मिली। वहीं क्षेत्र के रहने वाले अजय राय, गुड्डू, वृजलाल चौरसिया, गया प्रसाद, टुनटुन राय,सत्यपाल मिश्र,दिवाकर राय, ओंकार चौधरी ने बताया कि मुक्तिधाम का निर्माण आधा -अधूरा छोड़ कर ठेकेदार फरार हो गया। यदि निर्माण कार्य पूरा नही कराना था तो सरकारी धन का अपव्यय आखिर क्यों किया, इसके लिए जिम्मेदारों पर कार्रवाई होनी चाहिए। क्षेत्रीय लोगों का कहना था कि यदि मुक्तिधाम का निर्माण कार्य हो गया होता तो शवों को जलाने में काफी सहूलियत होती। वन क्षेत्राधिकारी के एम पांडेय का कहना था कि वन विभाग की जमीन में बिना हस्तांतरित कराए ही बस्ती का एक ठेकेदार अवैध तरीके से मुक्तिधाम का निर्माण कार्य करवा रहा था। आरएईएस को कार्यदाई संस्था बनाया गया था। अवैध निर्माण कार्य को रोकवा दिया गया था और आरईएस के एक जेई और संबंधित ठेकेदार के खिलाफ वन अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज किया गया था।
मुक्तिधाम का निर्माण कार्य क्यों रुक गया और किस मद से इसका निर्माण कार्य हो रहा था। वन विभाग की जमीन में बगैर स्वीकृति के कैसे निर्माण शुरू हुआ था। इसकी जानकारी हासिल करने के बाद ही आगे कुछ बता पाएंगे। वैसे प्रकरण की पूरी जानकारी कराएंगे और फिर उसमें आगे की कार्रवाई होगी।
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- प्रकाश बिंदु, डीएम
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संतकबीरनगर। बेलहर विकास खंड के आमी नदी के तट पर राजघाट पुल के पास अर्धनिर्मित मुक्तिधाम पांच सालों से मुक्ति के लिए तरस रहा है। दरअसल, बगैर अनुमति वन विभाग की जमीन में मुक्तिधाम का निर्माण कराया जा रहा था। वन विभाग के हस्तक्षेप के बाद ठेकेदार निर्माण कार्य छोड़कर फरार हो गया।
वर्ष 2008 में आमी नदी पर राजघाट पुल के पास एक जनप्रतिनिधि की निधि से मुक्तिधाम का निर्माण प्रारंभ हुआ था। कार्यदायी संस्था आरईएस ने एक ठेकेदार को निर्माण का जिम्मा सौंपा था। इसके लिए प्लेटफार्म और खंभे बना दिए गए। इसी दौरान वन विभाग ने इसे अपनी भूमि बताते हुए निर्माण कार्य बंद करा दिया। इसके बाद ठेकेदार लापता हो गया। इसके बाद वन विभाग ने अवैध तरीके से मुक्ति धाम का निर्माण कराए जाने के आरोप में वन अधिनियम के तहत विभाग में आरईएस के एक जेई और ठेकेदार के खिलाफ मुकदमा भी दर्ज किया था। ऐसे में यदि भूमि वन विभाग की थी तो बिना अनुमति निर्माण की स्वीकृति कैसे मिली। वहीं क्षेत्र के रहने वाले अजय राय, गुड्डू, वृजलाल चौरसिया, गया प्रसाद, टुनटुन राय,सत्यपाल मिश्र,दिवाकर राय, ओंकार चौधरी ने बताया कि मुक्तिधाम का निर्माण आधा -अधूरा छोड़ कर ठेकेदार फरार हो गया। यदि निर्माण कार्य पूरा नही कराना था तो सरकारी धन का अपव्यय आखिर क्यों किया, इसके लिए जिम्मेदारों पर कार्रवाई होनी चाहिए। क्षेत्रीय लोगों का कहना था कि यदि मुक्तिधाम का निर्माण कार्य हो गया होता तो शवों को जलाने में काफी सहूलियत होती। वन क्षेत्राधिकारी के एम पांडेय का कहना था कि वन विभाग की जमीन में बिना हस्तांतरित कराए ही बस्ती का एक ठेकेदार अवैध तरीके से मुक्तिधाम का निर्माण कार्य करवा रहा था। आरएईएस को कार्यदाई संस्था बनाया गया था। अवैध निर्माण कार्य को रोकवा दिया गया था और आरईएस के एक जेई और संबंधित ठेकेदार के खिलाफ वन अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज किया गया था।
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मुक्तिधाम का निर्माण कार्य क्यों रुक गया और किस मद से इसका निर्माण कार्य हो रहा था। वन विभाग की जमीन में बगैर स्वीकृति के कैसे निर्माण शुरू हुआ था। इसकी जानकारी हासिल करने के बाद ही आगे कुछ बता पाएंगे। वैसे प्रकरण की पूरी जानकारी कराएंगे और फिर उसमें आगे की कार्रवाई होगी।
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- प्रकाश बिंदु, डीएम