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सैलानी विदेशी पक्षियों की सुरक्षा के लिए बनाया गया ईको सेंसिटिव जोन
Sant kabir nagar
Updated Mon, 28 Oct 2013 05:39 AM IST
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गोरखपुर / संतकबीरनगर। सुप्रीम कोर्ट में दाखिल एक पीआईएल से संतकबीरनगर के बखिरा झील में विदेशी पक्षियों की सुरक्षा की उम्मीदें बढ़ गई हैं। मेहमान पक्षियों के शिकार पर रोक के लिए शासन ने इसे इको सेंसिटिव जोन बनाने पर अपनी मंजूरी दे दी है। मुख्य सचिव की अध्यक्षता में बीते दिनों इस प्रस्ताव पर मुहर भी लग गई। अब 29 वर्ग किलोमीटर की परिधि में आए इस झील की आबोहवा में खुल कर परिंदे परवाज कर सकेंगे।
अक्टूबर माह के पहले सप्ताह से ही झील में तिब्बती, चीनी, रूसी और साइबेरियन पक्षियों का आना शुरू हो गया है। अब तक करीब दो हजार विदेशी पक्षी दस्तक दे चुके हैं। इस साल भी दक्षिण-पश्चिम साइबेरिया से आने वाली क्रस्टड पोचर्ड आकर्षण का केंद्र है। झील में आने वाले प्रवासी पक्षियाें की प्रजातियों में ग्रे लैग, किंगफिशर, विजियन, पिनटेल, रेडक्रेस्टेड पोचर्ड, कामन पोचर्ड, कूट, सुर्खाब, मार्श हैरियर, गडवाल आदि प्रमुख हैं। इस झील में स्थानीय प्रजातियाें में सारस, परपल हेरान, ब्लैक आइरिस, इंडियन मूरहेन, परपल मूरहेन, कामन रिंगफिशर, कीजेंट टेल्ड जकना, पेंटेट स्टार्क आदि भी विदेशियों के साथ अठखेलियां करती नजर आतीं हैं। मेहमान पक्षी पूरे शरद काल में झील में अटखेलियां करते-करते मार्च में वापस अपने देश लौट जाते हैँ। लेकिन इसी दौरान कई शिकारमाही की जद में भी आ जाते हैं। विदेशी पक्षियों की पहचान के लिए उनके पैरों में हल्के रिंग डाले जाते हैं। जिस पर नंबरिंग की गई होती है। बीएनएचएस और आईबीसीएन में किसी भी पक्षी का नंबर बताकर पक्षियों से संबधित कोई भी जानकारी ली जा सकती है। प्रजनन काल आते ही प्रवासी पक्षी अपने मूल देश को लौट जाते हैं।
भारत सरकार ने 29 वर्ग किलोमीटर में फैली इस झील को 1990 में पक्षी विहार घोषित किया था। पक्षी विहार के रूप में चिह्नित भूमि में 1819.91 हेक्टेयर ग्रामसभा, 1059 हेक्टेयर कृषि और 15.16 हेक्टेयर भूमि वन महकमे की है। यहां कुमुदिनी, कमलिनी के साथ सफेद कमल भी मिलता है। प्रचुर जल और गोन व नरकट के कारण ही पक्षी आकर्षित होते हैं। झील में कछुआ, केकड़ा और सर्प आदि की भी विभिन्न प्रजातियां पाई जाती हैं।
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कोट -
खेतों में कीटनाशक का प्रयोग रोका जाएगा
इको सेंसिटिव जोन घोषित हो जाने के बाद कई चीजें वहां बिल्कुल प्रतिबंधित कर दी जायेंगी, जबकि कुछ पर नियंत्रण रखा जायेगा। इसी महीने वहां इको सेंसिटिव जोन की जानकारी देने वाले बोर्ड लगा दिये जायेंगे। इको सेंसिटिव जोन के मानकों के मुताबिक ईंट भट्ठा, खतरनाक उद्योग, बिजली उत्पादन इकाई, उच्च क्षमता वाले बिजली तार पर पूरी तरह प्रतिबंध रहेगा। अगर पहले से मौजूद हैं तो उन्हें चरणबद्ध ढंग से हटाया जायेगा। साथ ही खेतों में कीटनाशक दवाओं की जगह जैविक खाद के प्रयोग पर जोर दिया जाएगा।
- अमरेश चंद, प्रभागीय अधिकारी, सोहगीबरवा वन्य जीव प्रभाग, महराजगंज
जल्द दो फारेस्ट गार्ड चौकियां स्थापित होंगी
झील में पक्षियों के शिकार पर प्रतिबंध है। शिकार पर सख्ती से रोक लगाने के लिए दो फारेस्ट चौकी खोलने के लिए शासन से स्वीकृति मिल गई है। इसके निर्माण पर चार लाख रुपए खर्च हाेंगे। चौकी स्थापित करने के लिए जगह की तलाश हो रही है। जबकि पुराना प्रस्ताव जो शासन में गया है उसमें 20 किलोमीटर की त्रिज्या में चारों तरफ बांध का निर्माण, पौधरोपण व अप्रोच मार्ग, वाच टावर, चौकी के साथ झील की सफाई प्रस्तावित है। यह प्रस्ताव अभी शासन में लंबित है।
- गौरीनाथ, वन क्षेत्राधिकारी
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अक्टूबर माह के पहले सप्ताह से ही झील में तिब्बती, चीनी, रूसी और साइबेरियन पक्षियों का आना शुरू हो गया है। अब तक करीब दो हजार विदेशी पक्षी दस्तक दे चुके हैं। इस साल भी दक्षिण-पश्चिम साइबेरिया से आने वाली क्रस्टड पोचर्ड आकर्षण का केंद्र है। झील में आने वाले प्रवासी पक्षियाें की प्रजातियों में ग्रे लैग, किंगफिशर, विजियन, पिनटेल, रेडक्रेस्टेड पोचर्ड, कामन पोचर्ड, कूट, सुर्खाब, मार्श हैरियर, गडवाल आदि प्रमुख हैं। इस झील में स्थानीय प्रजातियाें में सारस, परपल हेरान, ब्लैक आइरिस, इंडियन मूरहेन, परपल मूरहेन, कामन रिंगफिशर, कीजेंट टेल्ड जकना, पेंटेट स्टार्क आदि भी विदेशियों के साथ अठखेलियां करती नजर आतीं हैं। मेहमान पक्षी पूरे शरद काल में झील में अटखेलियां करते-करते मार्च में वापस अपने देश लौट जाते हैँ। लेकिन इसी दौरान कई शिकारमाही की जद में भी आ जाते हैं। विदेशी पक्षियों की पहचान के लिए उनके पैरों में हल्के रिंग डाले जाते हैं। जिस पर नंबरिंग की गई होती है। बीएनएचएस और आईबीसीएन में किसी भी पक्षी का नंबर बताकर पक्षियों से संबधित कोई भी जानकारी ली जा सकती है। प्रजनन काल आते ही प्रवासी पक्षी अपने मूल देश को लौट जाते हैं।
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भारत सरकार ने 29 वर्ग किलोमीटर में फैली इस झील को 1990 में पक्षी विहार घोषित किया था। पक्षी विहार के रूप में चिह्नित भूमि में 1819.91 हेक्टेयर ग्रामसभा, 1059 हेक्टेयर कृषि और 15.16 हेक्टेयर भूमि वन महकमे की है। यहां कुमुदिनी, कमलिनी के साथ सफेद कमल भी मिलता है। प्रचुर जल और गोन व नरकट के कारण ही पक्षी आकर्षित होते हैं। झील में कछुआ, केकड़ा और सर्प आदि की भी विभिन्न प्रजातियां पाई जाती हैं।
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खेतों में कीटनाशक का प्रयोग रोका जाएगा
इको सेंसिटिव जोन घोषित हो जाने के बाद कई चीजें वहां बिल्कुल प्रतिबंधित कर दी जायेंगी, जबकि कुछ पर नियंत्रण रखा जायेगा। इसी महीने वहां इको सेंसिटिव जोन की जानकारी देने वाले बोर्ड लगा दिये जायेंगे। इको सेंसिटिव जोन के मानकों के मुताबिक ईंट भट्ठा, खतरनाक उद्योग, बिजली उत्पादन इकाई, उच्च क्षमता वाले बिजली तार पर पूरी तरह प्रतिबंध रहेगा। अगर पहले से मौजूद हैं तो उन्हें चरणबद्ध ढंग से हटाया जायेगा। साथ ही खेतों में कीटनाशक दवाओं की जगह जैविक खाद के प्रयोग पर जोर दिया जाएगा।
- अमरेश चंद, प्रभागीय अधिकारी, सोहगीबरवा वन्य जीव प्रभाग, महराजगंज
जल्द दो फारेस्ट गार्ड चौकियां स्थापित होंगी
झील में पक्षियों के शिकार पर प्रतिबंध है। शिकार पर सख्ती से रोक लगाने के लिए दो फारेस्ट चौकी खोलने के लिए शासन से स्वीकृति मिल गई है। इसके निर्माण पर चार लाख रुपए खर्च हाेंगे। चौकी स्थापित करने के लिए जगह की तलाश हो रही है। जबकि पुराना प्रस्ताव जो शासन में गया है उसमें 20 किलोमीटर की त्रिज्या में चारों तरफ बांध का निर्माण, पौधरोपण व अप्रोच मार्ग, वाच टावर, चौकी के साथ झील की सफाई प्रस्तावित है। यह प्रस्ताव अभी शासन में लंबित है।
- गौरीनाथ, वन क्षेत्राधिकारी