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उसर-बंजर जमीन में लगाई ‘घास’ से हो रहे मालामाल

Tue, 23 Oct 2018 11:01 PM IST
Santkabir Nagar
Santkabir Nagar Updated Tue, 23 Oct 2018 11:01 PM IST
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उसर-बंजर जमीन में लगाई ‘घास’ से हो रहे मालामाल
हैसर में लेमन ग्रास की खेती करते किसान। - फोटो : अमर उजाला
संतकबीरनगर। लेमनग्रास यानी नींबू जैसी महकने वाली घास। ऊसर-बंजर व कम सिंचाई सुविधा वाली जमीन पर बहुतायत में पाई जाने वाली यह घास कुछ समय तक किसानों के लिए परेशानी का सबब थी, लेकिन अब इससे तेल निकालकर लोग मालामाल रहे हैं। इसकी व्यवसायिक खेती शुरू हो गई है। जिले के हैंसर, पौली व नाथनगर ब्लॉक क्षेत्र के 100 किसान लेमनग्रास की खेती से जुड़े हैं।
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धनघटा तहसील क्षेत्र के गांव सिसवनिया, महुली, मुकुंदपुर, कोल्हूगाड़ा आदि गांवों में कुछ जमीन बेकार पड़ी थी। सिंचाई की कम सुविधा वाले इन खेतों में पिछले वर्ष ग्राम्य विकास अभिकरण के प्रोत्साहन से लोगों ने लेमनग्रास की खेती शुरू की। खेत में घास की बुआई का आइडिया किसानों को शुरू में पसंद नहीं आया, लेकिन अधिकारियों के समझाने पर कुछ लोग तैयार हो गए। धीरे-धीरे नाथनगर, हैंसर और पौली ब्लॉक के कुल मिलाकर 100 किसानों ने अपनी बेकार जमीन पर इसकी खेती की। अब उनके खेतों में घास कटने लायक हो गई है। इस घास की पेराई कर तेल निकाला जाएगा जिसकी कीमत करीब 1250 रुपये प्रति लीटर है।
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खर्च 40 हजार, आय पौने चार लाख
लेमनग्रास की खेती करने वाले किसानों के मुताबिक प्रति एकड़ बुआई पर 40 हजार रुपये खर्च होते हैं। इसमें से 25 हजार रुपये निराई-गुड़ाई व सिंचाई पर खर्च होना है, जिसका भुगतान किसान को मनरेगा मद से मिल रहा है। शेष 15 हजार रुपये बीज पर खर्च होते हैं, जिसे राज्य जैव ऊर्जा बोर्ड उपलब्ध कराता है। एक बार बोई गई फसल पांच वर्ष तक काटी जाएगी। हर दो महीने बाद घास की कटाई होगी। नींबू जैसी महक के चलते लेमनग्रास को जानवर इसे नहीं खाते हैं। इसलिए किसानों को इसकी रखवाली की चिंता नहीं करनी पड़ती। सिंचाई की बहुत कम आवश्यकता पड़ती है, लिहाजा किसान इसे ऐसे खेतों में लगा सकते हैं जिनमें वह अन्य फसलों की बुआई नहीं कर पा रहे हैं।
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नींबू युक्त साबुन बनाने में होता है उपयोग
लेमनग्रास से आसवन विधि से तेल निकाला जाता है। इसका उपयोग बर्तन धोने वाले साबुन व वॉशिंग पाउडर के निर्माण में होता है। अभी जिले में तेल निकालने की मशीन नहीं लगी है। किसानों का एक समूह पिछले महीने इसकी जानकारी लेने रायबरेली जिले के बछरांवा गया था। वहां के किसान लेमनग्रास की बड़े पैमाने पर खेती करते हैं।


प्रयोग सफल रहा तो बदलेगी तस्वीर : पीडी
डीआरडीए के परियोजना निदेशक प्रमोद कुमार यादव का कहना है कि प्रयोग के तौर पर पिछले वर्ष यह खेती शुरू कराई गई थी। अब 100 किसान इससे जुड़े हैं। बायोटेक पार्क की एक कंपनी ने किसानों से उपज खरीदने में रूचि दिखाई है। साथ ही कंपनी ने यह भी आश्वासन दिया है कि अगर खेती को विस्तार मिले तो वह संतकबीरनगर जिले में ही लेमनग्रास से तेल निकालने वाली मशीन भी लगवा देंगे।
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