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रंजो गम के साथ अदा हुई मोहर्रम की रस्म, नहीं निकाले गए गम ए हुसैनी के जुलूस

Moradabad  Bureau मुरादाबाद ब्यूरो
Updated Sat, 21 Aug 2021 01:39 AM IST
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The ceremony of Muharram was performed with Ranjo Gum, the procession of Gum-e-Husseini was not taken out
संभल के कर्बला पर अलम को लेकर पहुंचे अलमदार। - फोटो : SAMBHAL
संभल। मोहर्रम की रस्म रंजो गम के साथ अदा की गई। या हुसैन- या हुसैन की सदाएं इमामबारगाहों और इमामबाड़ों में गूंजती रहीं। कोरोना से बचाव की गाइडलाइन के चलते जुलूस नहीं निकाले गए। कर्बला पर ताजिए दफन करने के लिए भी कुछ ही लोग पहुंचे। इस दौरान भी पुलिस और प्रशासन का पहरा रहा। पीएसी और पुलिस के जवान जगह जगह तैनात नजर आए। शुक्रवार को नवासा ए रसूल की याद में सदाएं गूंजी। इसी दिन यजीदी फौज ने हजरत हुसैन और उनके साथियों को शहीद कर दिया था। इसी याद में मोहर्रम मनाए जाते हैं। इस्लाम धर्म में सबसे गम का महीना ही मोहर्रम का माना जाता है। हक और इंसानियत के लिए हजरत हुसैन और उनके साथी शहीद हुए थे। संभल में सादगी के साथ ताजिए कर्बल में दफन किए गए। प्रशासन द्वारा तैनात मजिस्ट्रेट भ्रमणशील रहे। थाना प्रभारियों ने अपने अपने क्षेत्रों में पैदल गश्त कर शांति बनाए रखने की अपील की। इस मोहर्रम पर जुलूस कोरोना से बचाव की गाइडलाइन के चलते नहीं निकाले जा सके। इसके लिए प्रशासन और पुलिस की ओर से पहले से ही तैयारी कर ली थी। ताजिएदार और उलमा के साथ बैठक कर जुलूस नहीं निकालने का आग्रह किया गया था। इस पर पालन भी किया गया। शांतिपूर्ण तरीके से जिले में मोहर्रम संपन्न हुआ है।
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घरों में रहकर किया मातम, गम ए हुसैन में रोते नजर आए अजादार
संभल। सिरसी में गम ए हुसैन में मजलिसें हुईं और घरों में जोरदार मातम किया किया गया। शिया समुदाय के लोगों ने सुबह से ही मैदान में खुले आसमान के नीचे रोजे आशूर के अमाल अदा किए और ज्यारत ए आशूरा पढ़ी। उसके बाद हजरत इमाम हुसैन के कातिलों पर लानत भेजी। रात को अजाखानों में मजलिसें शामे गरीबा हुई।जिसमें मौलाना ने कर्बला के मसाइब बयान किए। सरकार की गाइड लाइन के अनुसार दस मोहर्रम का जुलूस नही निकला जा सका। इमाम बारगाह पर पुलिस बल तैनात रहा। एहसान है ये दीने खुदा पर हुसैन का सजदे में कोई सर न कटा कर्बला के बाद। दूसरी ओर चिश्ती मंजिल पर शहीदे कर्बला हजरत इमाम हुसैन की याद में ऑनलाइन मजलिस का आयोजन किया गया। मजलिस को मुफ़्ती आलम रजा नूरी ने खिताब करते हुए कहा कि हजरत इमाम हुसैन के यह फजाइल है कि उनके बारे में अल्लाह के रसूल ने फ़रमाया हुसैन मुझसे है और मैं हुसैन से। कहा कि हजरत इमाम हुसैन ने दीन की खातिर अपना जान माल वतन सब कुछ कुर्बान कर दिया। कहा कि हजरत हुसैन ने तीर तलवार की बारिश में भी नमाज अदा की। उस आखिरी नमाज का आलम न पूछिए। इस्लाम जिंदा कर गया सजदा हुसैन का। इस दौरान मोहम्मद सलिम, फैजान, मोहम्मद सिकंदर, रईस आलम आदि मौजूद रहे। वहीं दूसरी ओर ओबरी, मनौटा, गालिबपुर आदि गांवों में शांतिपूर्ण तरीके से ताजिए दफन किए गए। असमोली थाना प्रभारी फोर्स के साथ गश्त करते रहे और लोगों से नियमों का पालन करने की अपील की।
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