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पवांसा की रानी ने भी 300 साल पहले किया था जौहर
संभ्ाल
Updated Fri, 17 Nov 2017 01:56 AM IST
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संभल में पद्मावती फिल्म के डायरेक्टर संजय लीला भंसाली का पुतला फूंकते हिंदू संगठन के लोग।
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अलाउद्दीन खिलजी के आतंक से पीड़ित रानी पद्मावती के सखियों समेत अग्निकुंड में कूदकर जौहर करने के आख्यान पर बनी संजय लीला भंसाली की फिल्म विवादों में है। लेकिन कम लोगों को ज्ञात है कि संभल जिले के पवांसा क्षेत्र की रानी पवांरनी ने भी 200 वीरांगनाओं के साथ जौहर कर लिया था। जौहर की यह कहानी दुखांत है। 300 साल पहले हुआ यह जौहर अपनी सेना के जीतने के बाद भी गलतफहमी में किया गया था। हर साल 17 नवंबर को रानी पवांरनी का जौहर दिवस संभल में मनाया जाता है।
दुश्मन की सेना का ध्वज बना गलतफहमी की वजहअरसे पहले लिखी पवांसा जौहर पुस्तक (रमेश राघव की ओर से पुनर्लेखन एवं संपादन) के मुताबिक संभल जिले के पवांसा कस्बे के स्थान पर पवांसा राज्य हुआ करता था। 17 नवंबर 1717 को पवांसा पर मेवातियों ने हमला बोल दिया। इस भीषण आक्रमण का सामना यहां के राजा पहुंप सिंह और उनके सिपहसालार केसरी सिंह ने डटकर किया था। अपने वीर साथियों के साथ मेवातियों से जमकर युद्ध किया और आक्रमण विफल कर दिया। जीत की खुशी में मेवातियों के झंडे को छीन कर ला रहे राजपूत वीरों को दूर से ही मेवाती समझ लिया गया। दुश्मन मेवातियों के झंडे के साथ आगे बढ़ रही फौज को देख कर पवांसा की गढी में एकत्र 200 से अधिक वीरांगनाओं ने केसरी सिंह की पत्नी रानी पवांरनी के साथ मिलकर जौहर कर लिया।
उस स्थान पर जौहर मंदिर बना है। मंदिर के अंदर सतियों के चार अस्थि कलश रखे हैं। पवांसा में सती हुईं वीरांगनाओं की याद में प्रतिवर्ष जौहर दिवस का आयोजन 17 नवंबर को किया जाता है। इस वर्ष जौहर दिवस के 300 वर्ष पूर्ण होने पर विशाल कार्यक्रम का आयोजन किया जाएगा। इसके तहत सुबह हवन किया जाएगा और दोपहर को श्रद्धांजलि सभा होगी।
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दुश्मन की सेना का ध्वज बना गलतफहमी की वजहअरसे पहले लिखी पवांसा जौहर पुस्तक (रमेश राघव की ओर से पुनर्लेखन एवं संपादन) के मुताबिक संभल जिले के पवांसा कस्बे के स्थान पर पवांसा राज्य हुआ करता था। 17 नवंबर 1717 को पवांसा पर मेवातियों ने हमला बोल दिया। इस भीषण आक्रमण का सामना यहां के राजा पहुंप सिंह और उनके सिपहसालार केसरी सिंह ने डटकर किया था। अपने वीर साथियों के साथ मेवातियों से जमकर युद्ध किया और आक्रमण विफल कर दिया। जीत की खुशी में मेवातियों के झंडे को छीन कर ला रहे राजपूत वीरों को दूर से ही मेवाती समझ लिया गया। दुश्मन मेवातियों के झंडे के साथ आगे बढ़ रही फौज को देख कर पवांसा की गढी में एकत्र 200 से अधिक वीरांगनाओं ने केसरी सिंह की पत्नी रानी पवांरनी के साथ मिलकर जौहर कर लिया।
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उस स्थान पर जौहर मंदिर बना है। मंदिर के अंदर सतियों के चार अस्थि कलश रखे हैं। पवांसा में सती हुईं वीरांगनाओं की याद में प्रतिवर्ष जौहर दिवस का आयोजन 17 नवंबर को किया जाता है। इस वर्ष जौहर दिवस के 300 वर्ष पूर्ण होने पर विशाल कार्यक्रम का आयोजन किया जाएगा। इसके तहत सुबह हवन किया जाएगा और दोपहर को श्रद्धांजलि सभा होगी।
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