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सात सालों से क्षेत्र में व्याप्त था कमल का आतंक
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चंदौसी। संभल और अमरोहा पुलिस के साझा आपरेशन में शनिवार की रात फरार बंदी कमल की आखिरी रात साबित हुई। उसका आतंक क्षेत्र में पिछले सात सालों से था। कमल बहादुर की इनकाउंटर में मौत की खबर आते ही लोगों ने राहत की सांस ली। वह शकील गैंग का शातिर साथी था।
17 जुलाई की शाम को न्यायालय में पेशी के बाद पुलिस बैन में दो पुलिस कर्मियों ब्रजपाल सिंह व हरेंद्र सिंह की हत्या कर भागे तीनों बंदियों को पकड़ने के आदेश प्रदेश स्तर से दे दिए गए थे। डीजीपी ने भी बहत्तर घंटे के अंदर फरार बंदियों को जिंदा या मुर्दा पकड़ने का दावा किया था। उन्होंने तीनों फरार बंदियों की गिरफ्तारी पर ढाई-ढाई लाख रुपये का पुरस्कार भी घोषित किया था। अमरोहा पुलिस भी इस मिशन में लगातार लगी थी। यह अनुमान भी लगाया गया था कि फरार बंदी अमरोहा जिले की ओर ही गए होंगे। बताते हैं कि कमल पर पहला मुकदमा 2014 में अपहरण का ही दर्ज हुआ था, जबकि इससे पहले भी शकील व धर्मपाल की संगत में आकर छोटे मोटे अपराध करने लगा था। अपहरण के मामले में नाम आने के बाद 2014 में ही अपहरण के दो मामले समेत पांच मुकदमे दर्ज हो गए। इसके बाद वह शकील का दायां हाथ बन गया। जिससे क्षेत्र में उसका आतंक हो गया। उसके भय के कारण अधिकांश लोग तो ज्यादती होने के बावजूद भी रिपोर्ट लिखाने या उसके खिलाफ कुछ भी कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाते थे। अमरोहा में इनकाउंटर में कमल का अंत होने के बाद ग्रामीणों को राहत मिली है।
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17 जुलाई की शाम को न्यायालय में पेशी के बाद पुलिस बैन में दो पुलिस कर्मियों ब्रजपाल सिंह व हरेंद्र सिंह की हत्या कर भागे तीनों बंदियों को पकड़ने के आदेश प्रदेश स्तर से दे दिए गए थे। डीजीपी ने भी बहत्तर घंटे के अंदर फरार बंदियों को जिंदा या मुर्दा पकड़ने का दावा किया था। उन्होंने तीनों फरार बंदियों की गिरफ्तारी पर ढाई-ढाई लाख रुपये का पुरस्कार भी घोषित किया था। अमरोहा पुलिस भी इस मिशन में लगातार लगी थी। यह अनुमान भी लगाया गया था कि फरार बंदी अमरोहा जिले की ओर ही गए होंगे। बताते हैं कि कमल पर पहला मुकदमा 2014 में अपहरण का ही दर्ज हुआ था, जबकि इससे पहले भी शकील व धर्मपाल की संगत में आकर छोटे मोटे अपराध करने लगा था। अपहरण के मामले में नाम आने के बाद 2014 में ही अपहरण के दो मामले समेत पांच मुकदमे दर्ज हो गए। इसके बाद वह शकील का दायां हाथ बन गया। जिससे क्षेत्र में उसका आतंक हो गया। उसके भय के कारण अधिकांश लोग तो ज्यादती होने के बावजूद भी रिपोर्ट लिखाने या उसके खिलाफ कुछ भी कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाते थे। अमरोहा में इनकाउंटर में कमल का अंत होने के बाद ग्रामीणों को राहत मिली है।
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