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प्रोत्साहन न मिलने से हार रहा हाथों का हुनर
अमर उजाला/ ब्यूरोसंभल
Updated Fri, 15 Jul 2016 12:59 AM IST
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संभल के सिरसी में कढ़ाई करतीं महिलाएं।
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मरहम लगाना तो दूर, सिरसी के दस्तकारों का दर्द भी किसी को सुनाई नहीं देता। यहां कभी घर-घर कढ़ाई का काम हुआ करता था। लेकिन सरकारी-गैरसरकारी किसी भी तरह का प्रोत्साहन न मिलने से मशीन से हाथों का हुनर हार रहा है।
आलम यह है कि अब दिनभर की हाड़तोड़ मेहनत के बाद भी दस्तकार दिहाड़ी मजदूरों के बराबर भी पैसे नहीं कमा पाते। घर चलाने में दुश्वारी होती है। लिहाजा पारंपरिक काम छोड़कर दस्तकार पलायन कर रहा है।
बड़े शहरों और विदेश में दस्तकारी की खासी मांग है। दस्तकारी बाजार पर नजर रखने वाले कहते हैं कि सरकार क्लस्टर बनाकर इनके उत्पादों की मार्केटिंग कर सकती है। देश विदेश में यहां की कढ़ाई से तैयार कपड़ों की बिक्री हो सकती है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि सिरसी में कढ़ाई के साथ- साथ ही शीशे की सजावट का काम होता है। यह सामान मुरादाबाद के निर्यातकों के माध्यम से विदेशों में जाता है। लेकिन यहां के कारीगरों को न्यूनतम मजदूरी भी बमुश्किल नसीब होती है जबकि निर्यात फर्में कमाकर अघा जा रही हैं। कारीगरों का कहना है कि अगर सरकार उनके बारे में सोचे और समस्याओं के समाधान की ओर बढ़े तो चुनौतियां कम जाएंगी।
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आलम यह है कि अब दिनभर की हाड़तोड़ मेहनत के बाद भी दस्तकार दिहाड़ी मजदूरों के बराबर भी पैसे नहीं कमा पाते। घर चलाने में दुश्वारी होती है। लिहाजा पारंपरिक काम छोड़कर दस्तकार पलायन कर रहा है।
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बड़े शहरों और विदेश में दस्तकारी की खासी मांग है। दस्तकारी बाजार पर नजर रखने वाले कहते हैं कि सरकार क्लस्टर बनाकर इनके उत्पादों की मार्केटिंग कर सकती है। देश विदेश में यहां की कढ़ाई से तैयार कपड़ों की बिक्री हो सकती है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि सिरसी में कढ़ाई के साथ- साथ ही शीशे की सजावट का काम होता है। यह सामान मुरादाबाद के निर्यातकों के माध्यम से विदेशों में जाता है। लेकिन यहां के कारीगरों को न्यूनतम मजदूरी भी बमुश्किल नसीब होती है जबकि निर्यात फर्में कमाकर अघा जा रही हैं। कारीगरों का कहना है कि अगर सरकार उनके बारे में सोचे और समस्याओं के समाधान की ओर बढ़े तो चुनौतियां कम जाएंगी।
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