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बासमती धान में कीटनाशक के इस्तेमाल से बचें, वरना बिक्री में होगी दिक्कत
सार
जिले में उत्पादित बासमती धान में कीटनाशकों का अंधाधुंध इस्तेमाल हो रहा है।शासन ने संभल व अन्य जनपदों में कुछ कीटनाशकों के इस्तेमाल पर रोक लगा दी है।किसान शुरू में बीज को शोधित कर बुआई करें, तो कीटनाशकों व अन्य रोगों का असर बहुत कम हो जाता है।
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विस्तार
जिले में उत्पादित बासमती धान में कीटनाशकों का अंधाधुंध इस्तेमाल हो रहा है। शासन की ओर से मानक से अधिक कीटनाशक के इस्तेमाल करने वाले 30 जिलों में संभल भी शामिल हैं। आखिरी समय में किसान बासमती धान में रसायनिक कीटनाशकों के स्थान पर जैविक व प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल करें, वरना धान बिक्री में समस्या आ सकती है। किसान उनके विकल्प के रूप में नीम का तेल, दसपर्णी अर्क और फफूंदी के सड़ा हुआ मट्ठा तैयार कर इस्तेेमाल कर सकते हैं।
संभल जिले में करीब 40 हजार हेक्टेयर भूमि में धान की फसल की रोपाई हुई है। इसमें से 28 हजार हेक्टेयर में किसानों ने बासमती धान की रोपाई की है। संभल बासमती उत्पादन प्रधान जिलों में से एक है। जिले की औसत पैदावार करीब 40 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। यानी संभल में करीब 1.10 लाख मीट्रिक टन बासमती धान का उत्पादन होता है। फसल के आखिरी समय यानी दो माह में जो कीटनाशकों का इस्तेमाल किया जाता है, उसके अवशेष धान पर रह जाते हैं। जो कई हानिकारक व जानलेवा बीमारियों का कारण बनते हैं। कृषि विभाग के अधिकारियों ने बताया कि दूसरे देशों में निर्यात के कड़े मानकों के चलते निर्यात में दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। शासन ने संभल व अन्य जनपदों में कुछ कीटनाशकों के इस्तेमाल पर रोक लगा दी है।
कीट व अन्य रोगों की रोकथाम को किसान करें दसपर्णी अर्क का इस्तेमाल
जिला कृषि विज्ञान केंद्र के प्रभारी वैज्ञानिक डॉ. महावीर सिंह ने बताया कि कीटों की रोकथाम के लिए किसान रसायनिक कीटनाशकों की जगह दसपर्णी अर्क का इस्तेमाल कर सकते है। इसके तैयार करने के लिए किसान नीम, धतूरा, भांग, गिलोय, लहसुन व पांच अन्य वृक्ष, पौधों की 10 से 15 किलो पत्तियां एकत्र कर लें। इसके अलावा दस लीटर गोमूत्र, दस किलो गोबर लें। पत्ती, गोमूत्र, गोबर को 200 लीटर के एक ड्रम में भर लें। शेष खाली ड्रम को पानी से भर दें। इसके बाद इसे ढककर 20 दिन रखें। ताकि पत्तियां उसमें पूरी तरह से सड़ जाए। 20 दिन के बाद ड्रम में बने मिक्चर को छान लें। कीट व रोगों से बचाव के लिए धान व अन्य फसलों में इसका स्प्रे करें।
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फफूंदी के लिए मट्ठे को सड़ाकर करें इस्तेमाल
कृषि वैज्ञानिक डॉ. अरविंद सिंह ने बताया कि धान व अन्य फसलों में फफूंदी रोग से बचाव के लिए रसायनिकों की जगह ट्राइकोडर्मा का इस्तेमाल कर सकते हैं। अथवा किसान मट्ठा लेकर किसी बर्तन में भर लें। उसमें एक तांबे का टुकड़ा भी डाल दें। इससे आठ से दस दिन तक बंद रखें, ताकि यह पूरी तरह से सड़ जाए। इससे भी छान लें और नीला थोथा मिलकर उसका छिड़काव कर दें।
शासन ने 30 सितंबर से दो माह के लिए कुछ रसायनिक कीटनाशकों के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाया है। किसान शुरू में बीज को शोधित कर बुआई करें, तो कीटनाशकों व अन्य रोगों का असर बहुत कम हो जाता है।
ओंकार सिंह, जिला कृषि अधिकारी, संभल
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संभल जिले में करीब 40 हजार हेक्टेयर भूमि में धान की फसल की रोपाई हुई है। इसमें से 28 हजार हेक्टेयर में किसानों ने बासमती धान की रोपाई की है। संभल बासमती उत्पादन प्रधान जिलों में से एक है। जिले की औसत पैदावार करीब 40 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। यानी संभल में करीब 1.10 लाख मीट्रिक टन बासमती धान का उत्पादन होता है। फसल के आखिरी समय यानी दो माह में जो कीटनाशकों का इस्तेमाल किया जाता है, उसके अवशेष धान पर रह जाते हैं। जो कई हानिकारक व जानलेवा बीमारियों का कारण बनते हैं। कृषि विभाग के अधिकारियों ने बताया कि दूसरे देशों में निर्यात के कड़े मानकों के चलते निर्यात में दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। शासन ने संभल व अन्य जनपदों में कुछ कीटनाशकों के इस्तेमाल पर रोक लगा दी है।
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कीट व अन्य रोगों की रोकथाम को किसान करें दसपर्णी अर्क का इस्तेमाल
जिला कृषि विज्ञान केंद्र के प्रभारी वैज्ञानिक डॉ. महावीर सिंह ने बताया कि कीटों की रोकथाम के लिए किसान रसायनिक कीटनाशकों की जगह दसपर्णी अर्क का इस्तेमाल कर सकते है। इसके तैयार करने के लिए किसान नीम, धतूरा, भांग, गिलोय, लहसुन व पांच अन्य वृक्ष, पौधों की 10 से 15 किलो पत्तियां एकत्र कर लें। इसके अलावा दस लीटर गोमूत्र, दस किलो गोबर लें। पत्ती, गोमूत्र, गोबर को 200 लीटर के एक ड्रम में भर लें। शेष खाली ड्रम को पानी से भर दें। इसके बाद इसे ढककर 20 दिन रखें। ताकि पत्तियां उसमें पूरी तरह से सड़ जाए। 20 दिन के बाद ड्रम में बने मिक्चर को छान लें। कीट व रोगों से बचाव के लिए धान व अन्य फसलों में इसका स्प्रे करें।
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फफूंदी के लिए मट्ठे को सड़ाकर करें इस्तेमाल
कृषि वैज्ञानिक डॉ. अरविंद सिंह ने बताया कि धान व अन्य फसलों में फफूंदी रोग से बचाव के लिए रसायनिकों की जगह ट्राइकोडर्मा का इस्तेमाल कर सकते हैं। अथवा किसान मट्ठा लेकर किसी बर्तन में भर लें। उसमें एक तांबे का टुकड़ा भी डाल दें। इससे आठ से दस दिन तक बंद रखें, ताकि यह पूरी तरह से सड़ जाए। इससे भी छान लें और नीला थोथा मिलकर उसका छिड़काव कर दें।
शासन ने 30 सितंबर से दो माह के लिए कुछ रसायनिक कीटनाशकों के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाया है। किसान शुरू में बीज को शोधित कर बुआई करें, तो कीटनाशकों व अन्य रोगों का असर बहुत कम हो जाता है।
ओंकार सिंह, जिला कृषि अधिकारी, संभल