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Sambhal News: एक तरफ बाउंड्री...दूसरी तरफ रेलवे ट्रैक, किसान भी मांग रहे पांच मीटर रास्ता
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संभल। जिला स्टेडियम का निर्माण कार्य नए-नए विवादों में घिर रहा है। अब इस निर्माण परियोजना के कारण स्थानीय किसानों और कार्यदायी संस्था के बीच गहरा मतभेद भी हो गया है। इस स्थिति ने क्षेत्र के युवाओं की खेल की प्रतिभा को भी बड़ा झटका दिया है। साथ ही शासन के धन का दुरुपयोग का भी अंदेशा बढ़ने लगा है। गांव भरतरा में 4.318 हेक्टेयर भूमि में निर्माण कर रही कार्यदायी संस्था उत्तर प्रदेश प्रोजेक्ट कॉरपोरेशन लिमिटेड (यूपीपीसीएल) की डीपीआर में काफी अनदेखी की गई है। इसके चलते ही यह स्थिति बनी है।
स्टेडियम के बिल्कुल नजदीक खेती करने वाले किसान लगातार अपनी मांग को लेकर अड़े हुए हैं। वे चाहते हैं कि उनके आवागमन के लिए पांच मीटर चौड़ी जमीन को खाली छोड़ा जाए। जबकि कार्यदायी संस्था बाउंड्री का निर्माण कर चुकी है। किसानों का कहना है कि यदि यह जमीन खाली नहीं रखी गई, तो उनके पास अपने खेतों तक पहुंचने का कोई वैकल्पिक रास्ता नहीं बचेगा। यह गंभीर विवाद अब खुलकर सामने आया है, जिससे निर्माण कार्य में बाधा आ रही है।
कार्यदायी संस्था ने निर्माण परियोजना शुरू करने से पहले किसानों की इस महत्वपूर्ण मांग को समझने का कोई प्रयास नहीं किया। उन्होंने किसानों के लिए किसी वैकल्पिक रास्ते की व्यवस्था पर भी विचार नहीं किया। रेलवे लाइन पार कर किसान पैदल तो जा सकते हैं लेकिन बैलगाड़ी या ट्रैक्टर-ट्रॉली लेकर जाना संभव नहीं है। ऐसे 50 से ज्यादा किसान हैं जो लगातार रास्ते की मांग कर रहे हैं।
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किसानों की प्रमुख मांग
किसानों का मुख्य मुद्दा अपनी जमीन तक पहुंचने का मामला है। वे निर्माण स्थल के पास से गुजरने के लिए पांच मीटर का मार्ग चाहते हैं। यह मार्ग उनकी दैनिक गतिविधियों और कृषि कार्यों के लिए जरूरी है। किसानों ने अपनी इस मांग को लेकर कार्यदायी संस्था के समक्ष कई बार अपनी बात रखी है। उनका कहना है कि टाला जा रहा है। जबकि उनकी जमीन तक रास्ता मिलना जरूरी है।
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कार्यदायी संस्था की अनदेखी
कार्यदायी संस्था ने निर्माण शुरू करने से पहले जमीनी हकीकत को नहीं परखा। उन्होंने किसानों की जरूरतों और उनके आवागमन के मार्ग की अनदेखी की। रेलवे द्वारा भी रास्ता न दिए जाने से स्थिति और जटिल हो गई है। इस अनदेखी के कारण परियोजना में अनावश्यक देरी हो रही है। जबकि शासन से जारी किए गए पांच करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं।
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मुख्य मार्ग से कनेक्टिविटी का नहीं रखा ख्याल
करीब एक दशक पुरानी मांग को शासन ने मंजूरी दी तो जमीन चिन्हित करने के निर्देश दिए गए। कई जमीनों को देखा गया पर किसी को फाइनल नहीं किया गया। गांव भरतरा में इस जमीन को विभागीय और राजस्व के अधिकारियों ने फाइनल कर प्रस्ताव भेज दिया था। शासन ने प्रस्ताव को मंजूरी देने के साथ ही कार्यदायी संस्था भी नामित कर दी थी। इसके अलावा जिले की जरूरत को समझते हुए पांच करोड़ रुपये भी दे दिए। लेकिन कार्यदायी संस्था ने डीपीआर में गंभीरता नहीं दिखाई। जिस मार्ग को रास्ता बनाया गया वह रेलवे की जमीन है और रेलवे अपनी जमीन देना नहीं चाहता है। अब विभागीय अधिकारियों के साथ कार्यदायी संस्था के सामने बड़ा संकट है।
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मुझे इस मामले की पूरी जानकारी नहीं है। फिलहाल मैं मेडिकल अवकाश पर हूं और शनिवार को ज्वाइन करूंगी। उसके बाद ही पूरी स्थिति से अवगत करा पाऊंगी।
चंचल मिश्रा, क्षेत्रीय क्रीड़ा अधिकारी, मुरादाबाद
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स्टेडियम के बिल्कुल नजदीक खेती करने वाले किसान लगातार अपनी मांग को लेकर अड़े हुए हैं। वे चाहते हैं कि उनके आवागमन के लिए पांच मीटर चौड़ी जमीन को खाली छोड़ा जाए। जबकि कार्यदायी संस्था बाउंड्री का निर्माण कर चुकी है। किसानों का कहना है कि यदि यह जमीन खाली नहीं रखी गई, तो उनके पास अपने खेतों तक पहुंचने का कोई वैकल्पिक रास्ता नहीं बचेगा। यह गंभीर विवाद अब खुलकर सामने आया है, जिससे निर्माण कार्य में बाधा आ रही है।
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कार्यदायी संस्था ने निर्माण परियोजना शुरू करने से पहले किसानों की इस महत्वपूर्ण मांग को समझने का कोई प्रयास नहीं किया। उन्होंने किसानों के लिए किसी वैकल्पिक रास्ते की व्यवस्था पर भी विचार नहीं किया। रेलवे लाइन पार कर किसान पैदल तो जा सकते हैं लेकिन बैलगाड़ी या ट्रैक्टर-ट्रॉली लेकर जाना संभव नहीं है। ऐसे 50 से ज्यादा किसान हैं जो लगातार रास्ते की मांग कर रहे हैं।
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किसानों की प्रमुख मांग
किसानों का मुख्य मुद्दा अपनी जमीन तक पहुंचने का मामला है। वे निर्माण स्थल के पास से गुजरने के लिए पांच मीटर का मार्ग चाहते हैं। यह मार्ग उनकी दैनिक गतिविधियों और कृषि कार्यों के लिए जरूरी है। किसानों ने अपनी इस मांग को लेकर कार्यदायी संस्था के समक्ष कई बार अपनी बात रखी है। उनका कहना है कि टाला जा रहा है। जबकि उनकी जमीन तक रास्ता मिलना जरूरी है।
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कार्यदायी संस्था की अनदेखी
कार्यदायी संस्था ने निर्माण शुरू करने से पहले जमीनी हकीकत को नहीं परखा। उन्होंने किसानों की जरूरतों और उनके आवागमन के मार्ग की अनदेखी की। रेलवे द्वारा भी रास्ता न दिए जाने से स्थिति और जटिल हो गई है। इस अनदेखी के कारण परियोजना में अनावश्यक देरी हो रही है। जबकि शासन से जारी किए गए पांच करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं।
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मुख्य मार्ग से कनेक्टिविटी का नहीं रखा ख्याल
करीब एक दशक पुरानी मांग को शासन ने मंजूरी दी तो जमीन चिन्हित करने के निर्देश दिए गए। कई जमीनों को देखा गया पर किसी को फाइनल नहीं किया गया। गांव भरतरा में इस जमीन को विभागीय और राजस्व के अधिकारियों ने फाइनल कर प्रस्ताव भेज दिया था। शासन ने प्रस्ताव को मंजूरी देने के साथ ही कार्यदायी संस्था भी नामित कर दी थी। इसके अलावा जिले की जरूरत को समझते हुए पांच करोड़ रुपये भी दे दिए। लेकिन कार्यदायी संस्था ने डीपीआर में गंभीरता नहीं दिखाई। जिस मार्ग को रास्ता बनाया गया वह रेलवे की जमीन है और रेलवे अपनी जमीन देना नहीं चाहता है। अब विभागीय अधिकारियों के साथ कार्यदायी संस्था के सामने बड़ा संकट है।
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मुझे इस मामले की पूरी जानकारी नहीं है। फिलहाल मैं मेडिकल अवकाश पर हूं और शनिवार को ज्वाइन करूंगी। उसके बाद ही पूरी स्थिति से अवगत करा पाऊंगी।
चंचल मिश्रा, क्षेत्रीय क्रीड़ा अधिकारी, मुरादाबाद