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हर साहिबे निसाब पर फर्ज हैं इलाही टैक्स ‘जक़ात’
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चंदौसी। जक़ात अर्थात इलाही टैक्स मुकद्दस माहे रमजान में हर साहिबे निसाब पर फर्ज होता है। वहीं सदक़ा-ए-फितर हर मुसलमान पर वाजिब माना गया है। ना कोई दुखी हो और ना ही कोई गरीब। कुछ ऐसी ही पवित्र भावना छिपी है जक़ात के पीछे। जकात दीन दूखियों और निर्धनों का जीवन स्तर ऊंचा उठाने में सहायक बनती है, उन्हें ईद की खुशियां प्रदान करती हैं।
माहे रमजान में रोजा रखना तो अफजल है ही, इसमें जकात देना और सदका-ए-फितर का विशेष महत्व है। संभल के मौलाना मोहम्मद रैयान और चंदौसी के शहर काजी हाजी मोहम्मद मरगूब के अनुसार मुकद्दस रमजान में हर साहिबे निसाब पर जकात फर्ज है। जकात देना हर उस मुसलमान पर फर्ज है, जिसके पास साढ़े सात तोला सोना या साढ़े बावन तोला चांदी हो या फिर इसके बराबर रुपये या तिजारत का सामान है। साथ ही इस संपत्ति को उसके पास रहते हुए सालभर पूरा हो गया है तो उस पर ढाई फीसदी जकात फर्ज है।
जकात गरीब और अनाथों को देनी चाहिए, जकात देते समय सबसे पहले अपने गरीब रिश्तेदारों का भी ध्यान रखना चाहिए। क्यों कि जकात के पीछे समानता और दूसरों की मदद करने की पवित्र भावना छिपी है। जकात पूरी ईमानदारी से सालभर में एक बार अवश्य देनी चाहिए, ताकि जो लोग गरीब हैं, वह संपन्नता की ओर बढ़ सके, वह भी पूरे जोशोखरोश के साथ ईद की खुशियां मना सकें। माहे रमजान के दौरान जो भी नेक काम किया जाए या जो भी जकात दी जाए। अल्लाह ताला उसका 70 गुना शबाब अता करता है।
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उलमा कहते हैं कि सदका-ए-फितर भी हर मुसलमान पर वाजिब है। यह सिर्फ रोजेदार या बालिगों पर ही नहीं बल्कि परिवार के प्रत्येक व्यक्ति पर वाजिब है। उसकी उम्र एक दिन से लेकर कितनी भी हो। सदका-ए-फितर में परिवार के हर मुसलमान सदस्य पर दो किलो 45 ग्राम गेहूं या उसकी कीमत के बराबर धन वास्तविक गरीबों को दान देना चाहिए।
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माहे रमजान में रोजा रखना तो अफजल है ही, इसमें जकात देना और सदका-ए-फितर का विशेष महत्व है। संभल के मौलाना मोहम्मद रैयान और चंदौसी के शहर काजी हाजी मोहम्मद मरगूब के अनुसार मुकद्दस रमजान में हर साहिबे निसाब पर जकात फर्ज है। जकात देना हर उस मुसलमान पर फर्ज है, जिसके पास साढ़े सात तोला सोना या साढ़े बावन तोला चांदी हो या फिर इसके बराबर रुपये या तिजारत का सामान है। साथ ही इस संपत्ति को उसके पास रहते हुए सालभर पूरा हो गया है तो उस पर ढाई फीसदी जकात फर्ज है।
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जकात गरीब और अनाथों को देनी चाहिए, जकात देते समय सबसे पहले अपने गरीब रिश्तेदारों का भी ध्यान रखना चाहिए। क्यों कि जकात के पीछे समानता और दूसरों की मदद करने की पवित्र भावना छिपी है। जकात पूरी ईमानदारी से सालभर में एक बार अवश्य देनी चाहिए, ताकि जो लोग गरीब हैं, वह संपन्नता की ओर बढ़ सके, वह भी पूरे जोशोखरोश के साथ ईद की खुशियां मना सकें। माहे रमजान के दौरान जो भी नेक काम किया जाए या जो भी जकात दी जाए। अल्लाह ताला उसका 70 गुना शबाब अता करता है।
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उलमा कहते हैं कि सदका-ए-फितर भी हर मुसलमान पर वाजिब है। यह सिर्फ रोजेदार या बालिगों पर ही नहीं बल्कि परिवार के प्रत्येक व्यक्ति पर वाजिब है। उसकी उम्र एक दिन से लेकर कितनी भी हो। सदका-ए-फितर में परिवार के हर मुसलमान सदस्य पर दो किलो 45 ग्राम गेहूं या उसकी कीमत के बराबर धन वास्तविक गरीबों को दान देना चाहिए।