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कभी थे जिगरी दोस्त, आज हो गए सियासी दुश्मन
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कभी थे जिगरी दोस्त, आज हो गए सियासी दुश्मन
सहारनपुर। राजनीति में कब कौन किसका दामन थाम ले या छोड़ दे, यह आंक पाना बेहद मुश्किल है। जो कभी दोस्त होते हैं, वे सियासी दुश्मन बन जाते हैं। जिला पंचायत अध्यक्ष के खिलाफ लाए गए अविश्वास प्रस्ताव के दौरान एक बार फिर यही देखने को मिला। पूर्व बसपा विधायक रविन्द्र मोल्हू और जिला पंचायत अध्यक्ष प्रतिनिधि माजिद अली कभी बसपा के हक में आवाज बुलंद करते थे। पूर्व मुख्यमंत्री मायावती के साथ मंच साझा करते थे लेकिन आज दोनों ही एक-दूसरे पर तल्ख टिप्पणी कर रहे हैं।
जिला पंचायत अध्यक्ष प्रतिनिधि माजिद अली और पूर्व विधायक रविन्द्र मोल्हू में बीच कभी गहरी दोस्ती हुआ करती थी। यूं भी कह सकते हैं कि माजिद अली को जिला पंचायत की सियासत में लाने में रविन्द्र मोल्हू का बड़ा हाथ रहा। सियासी गलियारे में तो ये भी कहा जाता है कि जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी माजिद अली की पत्नी तसमीम बानो को दिलाने में मोल्हू की अहम भूमिका रही। वक्त के साथ राजनीति ने करवट तब ली, जब करीब दो महीने पहले रविन्द्र मोल्हू भाजपा में शामिल हो गए। इसके बाद मोल्हू और माजिद के बीच दूरियां बढ़ने लगीं। स्थिति ये आ पहुंची कि पर्दे के पीछे रहकर रविन्द्र मोल्हू ने जिला पंचायत के अध्यक्ष पद की कुर्सी सरकाने का ताना-बाना बुना। मोल्हू के इशारे पर ही 32 सदस्यों ने अविश्वास प्रस्ताव लाने को शपथ पत्र जिलाधिकारी को दिया था। इससे माजिद अली और मोल्हू के बीच खाई और गहरी हो गई। बृहस्पतिवार को अविश्वास प्रस्ताव गिरने के बाद पहले माजिद अली ने कह दिया कि अपनी संपत्ति बचाने के लिए मोल्हू बसपा में गए, जनता उन्हें जूते-चप्पल का हार देगी। इस पर पलटवार करते हुए मोल्हू ने कह दिया कि माजिद अली डी कंपनी से जुड़े हुए हैं। बॉलीवुड में उनका काला पैसा लगा है।
अब जिला पंचायत के चुनाव में कुछ ही माह शेष बचे हैं, देखना है कि दोनों की इस तल्खी का चुनाव पर क्या असर पड़ेगा और सियासी जंग कहां तक जाएगी।
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सहारनपुर। राजनीति में कब कौन किसका दामन थाम ले या छोड़ दे, यह आंक पाना बेहद मुश्किल है। जो कभी दोस्त होते हैं, वे सियासी दुश्मन बन जाते हैं। जिला पंचायत अध्यक्ष के खिलाफ लाए गए अविश्वास प्रस्ताव के दौरान एक बार फिर यही देखने को मिला। पूर्व बसपा विधायक रविन्द्र मोल्हू और जिला पंचायत अध्यक्ष प्रतिनिधि माजिद अली कभी बसपा के हक में आवाज बुलंद करते थे। पूर्व मुख्यमंत्री मायावती के साथ मंच साझा करते थे लेकिन आज दोनों ही एक-दूसरे पर तल्ख टिप्पणी कर रहे हैं।
जिला पंचायत अध्यक्ष प्रतिनिधि माजिद अली और पूर्व विधायक रविन्द्र मोल्हू में बीच कभी गहरी दोस्ती हुआ करती थी। यूं भी कह सकते हैं कि माजिद अली को जिला पंचायत की सियासत में लाने में रविन्द्र मोल्हू का बड़ा हाथ रहा। सियासी गलियारे में तो ये भी कहा जाता है कि जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी माजिद अली की पत्नी तसमीम बानो को दिलाने में मोल्हू की अहम भूमिका रही। वक्त के साथ राजनीति ने करवट तब ली, जब करीब दो महीने पहले रविन्द्र मोल्हू भाजपा में शामिल हो गए। इसके बाद मोल्हू और माजिद के बीच दूरियां बढ़ने लगीं। स्थिति ये आ पहुंची कि पर्दे के पीछे रहकर रविन्द्र मोल्हू ने जिला पंचायत के अध्यक्ष पद की कुर्सी सरकाने का ताना-बाना बुना। मोल्हू के इशारे पर ही 32 सदस्यों ने अविश्वास प्रस्ताव लाने को शपथ पत्र जिलाधिकारी को दिया था। इससे माजिद अली और मोल्हू के बीच खाई और गहरी हो गई। बृहस्पतिवार को अविश्वास प्रस्ताव गिरने के बाद पहले माजिद अली ने कह दिया कि अपनी संपत्ति बचाने के लिए मोल्हू बसपा में गए, जनता उन्हें जूते-चप्पल का हार देगी। इस पर पलटवार करते हुए मोल्हू ने कह दिया कि माजिद अली डी कंपनी से जुड़े हुए हैं। बॉलीवुड में उनका काला पैसा लगा है।
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अब जिला पंचायत के चुनाव में कुछ ही माह शेष बचे हैं, देखना है कि दोनों की इस तल्खी का चुनाव पर क्या असर पड़ेगा और सियासी जंग कहां तक जाएगी।