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बिना सबूत किसी मुस्लिम को काफिर कहना जायज नहीं : दारुल उलूम
अमर उजाला ब्यूरो/ सहारनपुर
Updated Thu, 15 Feb 2018 12:10 AM IST
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दारुल उलूम द्वारा जारी किया गया फतवा।
- फोटो : अमर उजाला
सहारनपुर के देवबंद में दारुल उलूम के एक फतवे में कहा गया है कि बिना किसी पुख्ता सबूत के किसी भी ईमान को काफिर कहना या इस्लाम से बाहर कर देना सही नहीं है।
मध्यप्रदेश से एक व्यक्ति ने दारुल उलूम के इफ्ता विभाग से सवाल पूछा था कि अगर कोई व्यक्ति किसी ईमान वाले व्यक्ति को व्यक्तिगत दुश्मनी के चलते काफिर करार दे या काफिर कहते हुए उसे इस्लाम से बाहर कर दे तो क्या ऐसा व्यक्ति किसी मस्जिद की इमामत कर सकता है?।
जिसके जवाब में मुफ्तियों की खंडपीठ ने कहा कि मुसलमानों के लिए ठीक नहीं कि वो किसी ईमान वाले शख्स को काफिर करार दें। कुरआन और हदीस का हवाला देते हुए मुफ्तियों ने कहा कि जब तक कई पुख्ता शरई सबूत न हो उस वक्त तक किसी भी ईमान वाले शख्स पर कुफ्र का फतवा लगाना नामुनासिब है।
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उन्होंने कहा कि किसी मुस्लिम को काफिर कहने या उसे इस्लाम से बाहर करने के सिलसिले में हदीसों में सख्त हुक्म दिए गए हैं। जहां ऐसा करने वाले व्यक्ति के पीछे नमाज पढ़ने का मसला है तो नमाज तो हो जाएगी, लेकिन मकरुह होगी।
यानि जो सवाब मिलना चाहिए वो नहीं मिलेगा। फतवे पर तंजीम उलमा-ए-हिंद के प्रदेशाध्यक्ष व अरबी के प्रसिद्ध विद्वान मौलाना नदीमुलवाजदी का कहना है कि दारुल उलूम का फतवा एकदम दुरुस्त है। मुसलमानों को इससे बचना चाहिए। किसी ईमान वाले को काफिर कहना सरासर गलत बात है।
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मध्यप्रदेश से एक व्यक्ति ने दारुल उलूम के इफ्ता विभाग से सवाल पूछा था कि अगर कोई व्यक्ति किसी ईमान वाले व्यक्ति को व्यक्तिगत दुश्मनी के चलते काफिर करार दे या काफिर कहते हुए उसे इस्लाम से बाहर कर दे तो क्या ऐसा व्यक्ति किसी मस्जिद की इमामत कर सकता है?।
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जिसके जवाब में मुफ्तियों की खंडपीठ ने कहा कि मुसलमानों के लिए ठीक नहीं कि वो किसी ईमान वाले शख्स को काफिर करार दें। कुरआन और हदीस का हवाला देते हुए मुफ्तियों ने कहा कि जब तक कई पुख्ता शरई सबूत न हो उस वक्त तक किसी भी ईमान वाले शख्स पर कुफ्र का फतवा लगाना नामुनासिब है।
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उन्होंने कहा कि किसी मुस्लिम को काफिर कहने या उसे इस्लाम से बाहर करने के सिलसिले में हदीसों में सख्त हुक्म दिए गए हैं। जहां ऐसा करने वाले व्यक्ति के पीछे नमाज पढ़ने का मसला है तो नमाज तो हो जाएगी, लेकिन मकरुह होगी।
यानि जो सवाब मिलना चाहिए वो नहीं मिलेगा। फतवे पर तंजीम उलमा-ए-हिंद के प्रदेशाध्यक्ष व अरबी के प्रसिद्ध विद्वान मौलाना नदीमुलवाजदी का कहना है कि दारुल उलूम का फतवा एकदम दुरुस्त है। मुसलमानों को इससे बचना चाहिए। किसी ईमान वाले को काफिर कहना सरासर गलत बात है।