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सिर्फ नाम का ट्रामा सेंटर, गंभीर घायल कर दिए जाते हैं रेफर
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जिला अस्पताल में खस्ता हालत में ट्रामा सैंटर
- फोटो : SAHARANPUR
सहारनपुर। गंभीर घायलों के इलाज के लिए एसबीडी जिला अस्पताल में बना ट्रामा सेंटर बनने के 14 साल बाद भी पूरी तरह काम नहीं कर रहा है। यहां गंभीर घायलों के इलाज के लिए ऑपरेशन थिएटर तो है, लेकिन स्टाफ और डॉक्टर नहीं होने की वजह से वह बंद ही रहता है। नतीजा, गंभीर घायलों को बाहर से बाहर ही रेफर कर दिया जाता है।
ट्रामा सेंटर की स्थापना करीब 14 वर्ष पहले हुई थी। करीब दस साल से ट्रामा सेंटर चालू है, लेकिन आज तक यहां व्यवस्था ठीक नहीं हो सकी है, जबकि ट्रामा सेंटर एक अलग प्रकार का इमरजेंसी वार्ड होता है, जो 24 घंटे काम करता है। यहां आपातकाल में केवल गंभीर घायलों को इलाज के लिए लाया जाता है। घायल को तुुुरंत बेहतर इलाज मिले। इसके लिए ट्रामा सेंटर में 24 घंटे योग्य चिकित्सक, सर्जन और ओटी स्टाफ, नर्स आदि होने चाहिए। सभी जरूरी दवाएं और मरहम पट्टी आदि उपलब्ध हों। एसबीडी जिला अस्पताल के ट्रामा सेंटर में ऑपरेशन थिएटर तो है, लेकिन अलग से चिकित्सक जैसे न्यूरो सर्जन, न्यूरो फिजीशियन, कार्डियोलॉजिस्ट, ईसीजी टेक्नीशियन आदि नहीं हैं। जिसकी वजह से ऑपरेशन थिएटर बंद ही रहता है। कभी कभी ही ऑपरेशन थिएटर खोला जाता है, जिसके लिए एसबीडी जिला अस्पताल के सर्जन को बुलाया जाता है। ज्यादातर समय में गंभीर घायलों को एसबीडी जिला अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड से ही रेफर कर दिया जाता है। ऐसे में ट्रामा सेंटर केवल नाम का रह गया है। खास बात यह है कि ट्रामा सेंटर के प्रभारी कभी कभी अस्पताल आते हैं, जो संविदा के चिकित्सक हैं।
रखरखाव भी ठीक नहीं
- ट्रामा सेंटर के भवन की हालत भी बदतर हो रही है। पड़ताल करने पर पाया कि प्रवेश द्वार पर ही सबसे पहले फर्श की टाइलें टूटी नजर आईं। इसी की बगल में बनी सीमेंट की बेंच की टाइलें भी गायब मिलीं। वार्ड में स्टाफ ने पांच घायल भर्ती होना बताया, लेकिन वार्ड में 20 से अधिक तीमारदार मौजूद थे, जो बेड पर ही पसरे नजर आए। यह भी अव्यवस्था का ही हिस्सा है। ट्रामा सेंटर में बने एक्स-रे रूम में वाइपर रखा मिला। एक्स-रे रूम के फर्श पर धूल जमी नजर आई। स्टाफ रूम में डस्टबिन और कुछ कचरा रखा मिला। स्टाफ सदस्यों ने बताया कि स्टाफ रूम बदल दिया गया है। पुराने स्टाफ रूम इस्तेमाल नहीं रहा है।
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प्रतिदिन पहुंचते हैं 40 से 50 घायल
एसबीडी जिला अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में प्रतिदिन 40 से 50 घायल पहुंचते हैं। इनमें कुछ सड़क हादसों के चोटिल होते हैं तो कुछ अन्य घटनाओं में घायल। कभी कभी इनकी संख्या इससे भी अधिक हो जाती है। इस लिहाज से ट्रामा सेंटर काफी महत्व रखता है।
ट्रामा सेंटर एक महत्वपूर्ण विभाग है, जहां गंभीर घायलों का इलाज होता है। यह सच है कि ट्रामा सेंटर के लिए अलग से चिकित्सक और पर्याप्त मात्रा में स्टाफ नहीं है। फिर भी हमारा प्रयास यही है कि कोई भी घायल बिना इलाज के न लौटे। रही बात रखरखाव व सफाई की उसे तुरंत दूर कराया जाएगा। ट्रामा सेंटर के प्रभारी से जवाब भी मांगा जाएगा।
डॉ. रमेश चंद्रा, प्रमुख अधीक्षक, एसबीडी जिला अस्पताल।
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ट्रामा सेंटर की स्थापना करीब 14 वर्ष पहले हुई थी। करीब दस साल से ट्रामा सेंटर चालू है, लेकिन आज तक यहां व्यवस्था ठीक नहीं हो सकी है, जबकि ट्रामा सेंटर एक अलग प्रकार का इमरजेंसी वार्ड होता है, जो 24 घंटे काम करता है। यहां आपातकाल में केवल गंभीर घायलों को इलाज के लिए लाया जाता है। घायल को तुुुरंत बेहतर इलाज मिले। इसके लिए ट्रामा सेंटर में 24 घंटे योग्य चिकित्सक, सर्जन और ओटी स्टाफ, नर्स आदि होने चाहिए। सभी जरूरी दवाएं और मरहम पट्टी आदि उपलब्ध हों। एसबीडी जिला अस्पताल के ट्रामा सेंटर में ऑपरेशन थिएटर तो है, लेकिन अलग से चिकित्सक जैसे न्यूरो सर्जन, न्यूरो फिजीशियन, कार्डियोलॉजिस्ट, ईसीजी टेक्नीशियन आदि नहीं हैं। जिसकी वजह से ऑपरेशन थिएटर बंद ही रहता है। कभी कभी ही ऑपरेशन थिएटर खोला जाता है, जिसके लिए एसबीडी जिला अस्पताल के सर्जन को बुलाया जाता है। ज्यादातर समय में गंभीर घायलों को एसबीडी जिला अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड से ही रेफर कर दिया जाता है। ऐसे में ट्रामा सेंटर केवल नाम का रह गया है। खास बात यह है कि ट्रामा सेंटर के प्रभारी कभी कभी अस्पताल आते हैं, जो संविदा के चिकित्सक हैं।
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रखरखाव भी ठीक नहीं
- ट्रामा सेंटर के भवन की हालत भी बदतर हो रही है। पड़ताल करने पर पाया कि प्रवेश द्वार पर ही सबसे पहले फर्श की टाइलें टूटी नजर आईं। इसी की बगल में बनी सीमेंट की बेंच की टाइलें भी गायब मिलीं। वार्ड में स्टाफ ने पांच घायल भर्ती होना बताया, लेकिन वार्ड में 20 से अधिक तीमारदार मौजूद थे, जो बेड पर ही पसरे नजर आए। यह भी अव्यवस्था का ही हिस्सा है। ट्रामा सेंटर में बने एक्स-रे रूम में वाइपर रखा मिला। एक्स-रे रूम के फर्श पर धूल जमी नजर आई। स्टाफ रूम में डस्टबिन और कुछ कचरा रखा मिला। स्टाफ सदस्यों ने बताया कि स्टाफ रूम बदल दिया गया है। पुराने स्टाफ रूम इस्तेमाल नहीं रहा है।
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प्रतिदिन पहुंचते हैं 40 से 50 घायल
एसबीडी जिला अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में प्रतिदिन 40 से 50 घायल पहुंचते हैं। इनमें कुछ सड़क हादसों के चोटिल होते हैं तो कुछ अन्य घटनाओं में घायल। कभी कभी इनकी संख्या इससे भी अधिक हो जाती है। इस लिहाज से ट्रामा सेंटर काफी महत्व रखता है।
ट्रामा सेंटर एक महत्वपूर्ण विभाग है, जहां गंभीर घायलों का इलाज होता है। यह सच है कि ट्रामा सेंटर के लिए अलग से चिकित्सक और पर्याप्त मात्रा में स्टाफ नहीं है। फिर भी हमारा प्रयास यही है कि कोई भी घायल बिना इलाज के न लौटे। रही बात रखरखाव व सफाई की उसे तुरंत दूर कराया जाएगा। ट्रामा सेंटर के प्रभारी से जवाब भी मांगा जाएगा।
डॉ. रमेश चंद्रा, प्रमुख अधीक्षक, एसबीडी जिला अस्पताल।

जिला अस्पताल के ट्रामा सैंटर में टूटी टेल- फोटो : SAHARANPUR