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लुप्त होती जा रही जनपद की मशहूर देसी बासमती

Sat, 05 Jun 2021 11:23 PM IST
Meerut Bureau मेरठ ब्यूरो
Updated Sat, 05 Jun 2021 11:23 PM IST
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The famous indigenous Basmati of the disappearing district
देशी बासमती का खेत फाइल फोटो - फोटो : SAHARANPUR
सहारनपुर। कभी जनपद की पहचान रही देसी बासमती की खेती धीरे-धीरे समाप्त हो रही है। एक जमाने में बड़े पैमाने पर जनपद में इसकी खेती होती थी, लेकिन अब करीब आधा दर्जन किसान ही इस प्रजाति की धान की खेती कर रहे हैं। इसका बड़ा कारण देशी बासमती का कम उत्पादन और किसानों का हाईब्रिड प्रजातियों की ओर झुकाव माना जा रहा है।
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खेती के व्यवसायीकरण के चलते किसान कई फसलों की देशी प्रजातियों की खेती को लगभग छोड़ चुके हैं। इसमें देशी उड़द के अलावा अपनी बेहतरीन खुशबू और स्वाद के लिए विख्यात देशी बासमती भी शामिल है। अधिक उत्पादन देने वाली बासमती की प्रजातियों के आने के बाद से इसकी खेती धीरे धीरे बेहद कम हो गई है। देशी बासमती का चावल बनने के बाद खासा लंबा हो जाता है, साथ ही इसकी महक दूर तक फैल जाती है।
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इन प्रजातियों को दे रहे प्राथमिकता
जिले में धान का कुल रकबा करीब 60 हजार हेक्टेयर है, जबकि बासमती धान की विभिन्न प्रजातियों की खेती का रकबा करीब 48 हजार हेक्टेयर रहता है। इसमें पूसा बासमती- 370, पूसा बासमती-01, पूसा बासमती- 1121, पूसा बासमती -1637, पूसा बासमती-1718, पूसा बासमती- 1509, तरावड़ी आदि प्रजातियां की खेती होती है।
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कम उत्पादन होने से छोड़ी इसकी खेती
गांव मीरपुर मोहनपुर निवासी किसान राजकुमार वालिया ने बताया कि पहले वे देसी बासमती की खेती बडे़ रकबे में करते थे। कम उत्पादन के चलते अब वे बासमती की इस प्रजाति को नहीं लगा रहे हैं। बासमती की अन्य प्रजातियां चार क्विंटल प्रति बीघा तक उत्पादन देती है। लंबाई अधिक होने के चलते देशी बासमती पकने के समय थोड़ी हवा आने पर भी गिर जाती है।
अब बासमती की अन्य प्रजातियों की कर रहे खेती
गांव बढेड़ी कोली निवासी दिनेश शर्मा का कहना है कि पहले ज्यादातर किसान देसी बासमती की खेती करते थे। इसका उत्पादन कम होता था। अब बासमती की अधिक पैदावार देने वाली प्रजातियां आ गई हैं। इसलिए किसान देशी बासमती की बजाए बासमती की अन्य प्रजातियों की खेती कर रहे हैं।
लगभग समाप्त हो गई देशी बासमती की खेती
गांव रंडौल के किसान सुनील राणा कहते हैं कि देशी बासमती की खेती तो लगभग समाप्त सी हो चुकी है। इसकी पैदावार कम होने से किसानों ने धीरे धीरे नई प्रजातियों को लगाना शुरू कर दिया है। देसी बासमती का प्रति बीघा उत्पादन एक से डेढ़ क्विंटल है, जबकि नई प्रजातियों की पैदावार तीन से चार क्विंटल तक हो जाती है। इसकी वजह से किसानों का देशी बासमती से मोहभंग हो गया।
देसी बासमती लगाकर कमा रहे मुनाफा
गांव कोठड़ी बहलोलपुर के प्रगतिशील किसान संजय चौहान देसी बासमती की खेती करके खासा लाभ कमा रहे हैं। उनका कहना है कि उनके यहां एक एकड़ में 12 क्विंटल तक देसी बासमती की उत्पादन हो जाता है। इसकी बिक्री वे राजस्थान के एक व्यापारी को छह से सात हजार रुपये प्रति क्विंटल तक करते हैं। इस बार भी करीब तीस बीघा में देशी बासमती लगाने की तैयारी में हैं।

बासमती की नई प्रजातियों के आने के बाद किसानों का देसी बासमती की खेती से मोहभंग हो गया है। नई प्रजातियों की तुलना में देसी बासमती का उत्पादन काफी कम है। अब तो जिले में कुछ किसान ही देसी बासमती की खेती अपने खाने के लिए कर रहे हैं।
- रामजतन मिश्र, उप निदेशक क़ृषि।
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