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श्रद्धा और भक्ति का केंद्र है श्री ठाकुरद्वारा मंदिर
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देवबंद (सहारनपुर)। देववृंद (वर्तमान का देवबंद) श्रीकृष्ण भक्ति का केंद्र रहा है। यहां स्थापित श्री पंचायती ठाकुरद्वारा मंदिर हर्षवर्धन कालीन है। इसमें करीब 1400 वर्ष पूर्व युवा हिंदू सम्राट हर्षवर्धन ने ठाकुर जी की मूर्ति स्थापित कराई थी।
इतिहास विदों के अनुसार भ्रमण पर निकले सम्राट हर्षवर्धन दल बल सहित कन्नौज से थानेश्वर (पंजाब) जा रहे थे तो, रास्ते में चंदन के वनों से घिरे देवीवन (देवबंद) नामक जंगल में श्री त्रिपुर मां बाला सुंदरी देवी मंदिर के सामने पड़ाव डाला। पास में स्थित बस्ती के लोगों की पेयजल की समस्या के निदान के लिए कुएं की खोदाई कराई, तभी करीब दो फुट की मूर्ति प्रकट हुई, इसे सम्राट हर्षवर्धन ने ऋषि मुनियों के सुझाव पर ऊंचे टीले (वर्तमान स्थल) पर प्रतिष्ठित कराया। सम्राट हर्षवर्धन के पिता स्व. प्रभाकर वर्धन महाराजा धिराज की उपाधि से विभूषित थे। तभी से ठाकुरद्वारा मंदिर में स्थापित अखंड महाशक्ति को ठाकुरजी महाराजा धिराज भगवान श्रीकृष्ण नाम से पुकारा जाने लगा। 16वीं शताब्दी में छत्रपति शिवाजी के द्वितीय पुत्र राजा रामचंद्र मराठा ने मंदिर के गर्भग्रह का निर्माण कराया। इसमें ठाकुरजी के साथ राधा रानी की मूर्ति स्थापित की गई। भक्ति कालीन युग में चैतन्य महाप्रभु ने भी इस मंदिर में आकर भजन कीर्तन किया था।
16वीं शताब्दी में शुरू हुई थी शोभायात्रा की परंपरा
यहां श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दूसरे दिन भव्य शोभायात्रा निकाली जाती है। श्रद्धालु नगर परिक्रमा करते हुए श्रीराधा नवरंगी लाल मंदिर जाते हैं, वहां राधा नवरंगीलाल के मिलन की रस्म कराई जाती है। ठाकुरजी का लालजी के मिलन की परंपरा प्रतिवर्ष भाद्रपद कृष्ण पक्ष की दशमी को महोत्सव के रूप में मनाई जाती है। - विनोद प्रकाश गुप्ता, अध्यक्ष, श्री पंचायती ठाकुरद्वारा मंदिर सभा
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1916 में मंदिर कमेटी ने बनवाया स्वर्णिम रथ
17वीं शताब्दी तक श्रद्धालु पैदल ही परिक्रमा करते थे। फिर 18वीं शताब्दी में बैल तांगे के साथ सवारी निकाली जाती रही, जबकि 19वीं शताब्दी के प्रारंभ के कुछ वर्षों तक मथुरा से रथ किराये पर लाया गया। वर्ष 1916 में दो मंजिला रथ का निर्माण कराकर उस पर सोना चढ़वाया गया। 1917 में स्वर्णिम रथ पर ठाकुरजी को विराजमान कर शोभायात्रा निकाली, जो अब तक होती है। - अशोक गुप्ता, महामंत्री
इस बार शोभायात्रा में दो रथ और कीर्तन मंडली होंगी शामिल
मंदिर कमेटी ने नगर में परंपरागत शोभायात्रा निकालने की प्रशासन से अनुमति मांगी। प्रशासन ने केवल भगवान के दोनों रथ और कीर्तन मंडली के साथ शोभायात्रा निकालने की स्वीकृति दी है। मंदिर कमेटी के पदाधिकारियों ने कहा कि कोविड- 19 की गाइड लाइन का पालन करते हुए झांकी, अखाड़े व बैंडबाजों को शोभायात्रा में प्रतिबंधित किया है।
देवबंद में 32 साल रहे राधा वल्लभ संप्रदाय के संस्थापक श्री हित हरिवंश
देवबंद। राधा वल्लभ संप्रदाय की स्थापना करने वाले श्रीहित हरिवंश 32 साल तक देवबंद में रहे। उन्होंने ही छह साल की आयु में ठाकुर श्री राधा नवरंगी लाल का विग्रह स्थापित किया। यह विग्रह उन्हें खेलते समय कुएं से मिला था, जो आज भी मंदिर में मौजूद है। इसके बाद वह चरथावल में संत आत्मदेव के यहां से राधा वल्लभ का विग्रह प्राप्त करने के बाद वृंदावन पहुंचे और वहां सेवा कुंज में वह विग्रह स्थापित किया था।
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इतिहास विदों के अनुसार भ्रमण पर निकले सम्राट हर्षवर्धन दल बल सहित कन्नौज से थानेश्वर (पंजाब) जा रहे थे तो, रास्ते में चंदन के वनों से घिरे देवीवन (देवबंद) नामक जंगल में श्री त्रिपुर मां बाला सुंदरी देवी मंदिर के सामने पड़ाव डाला। पास में स्थित बस्ती के लोगों की पेयजल की समस्या के निदान के लिए कुएं की खोदाई कराई, तभी करीब दो फुट की मूर्ति प्रकट हुई, इसे सम्राट हर्षवर्धन ने ऋषि मुनियों के सुझाव पर ऊंचे टीले (वर्तमान स्थल) पर प्रतिष्ठित कराया। सम्राट हर्षवर्धन के पिता स्व. प्रभाकर वर्धन महाराजा धिराज की उपाधि से विभूषित थे। तभी से ठाकुरद्वारा मंदिर में स्थापित अखंड महाशक्ति को ठाकुरजी महाराजा धिराज भगवान श्रीकृष्ण नाम से पुकारा जाने लगा। 16वीं शताब्दी में छत्रपति शिवाजी के द्वितीय पुत्र राजा रामचंद्र मराठा ने मंदिर के गर्भग्रह का निर्माण कराया। इसमें ठाकुरजी के साथ राधा रानी की मूर्ति स्थापित की गई। भक्ति कालीन युग में चैतन्य महाप्रभु ने भी इस मंदिर में आकर भजन कीर्तन किया था।
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16वीं शताब्दी में शुरू हुई थी शोभायात्रा की परंपरा
यहां श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दूसरे दिन भव्य शोभायात्रा निकाली जाती है। श्रद्धालु नगर परिक्रमा करते हुए श्रीराधा नवरंगी लाल मंदिर जाते हैं, वहां राधा नवरंगीलाल के मिलन की रस्म कराई जाती है। ठाकुरजी का लालजी के मिलन की परंपरा प्रतिवर्ष भाद्रपद कृष्ण पक्ष की दशमी को महोत्सव के रूप में मनाई जाती है। - विनोद प्रकाश गुप्ता, अध्यक्ष, श्री पंचायती ठाकुरद्वारा मंदिर सभा
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1916 में मंदिर कमेटी ने बनवाया स्वर्णिम रथ
17वीं शताब्दी तक श्रद्धालु पैदल ही परिक्रमा करते थे। फिर 18वीं शताब्दी में बैल तांगे के साथ सवारी निकाली जाती रही, जबकि 19वीं शताब्दी के प्रारंभ के कुछ वर्षों तक मथुरा से रथ किराये पर लाया गया। वर्ष 1916 में दो मंजिला रथ का निर्माण कराकर उस पर सोना चढ़वाया गया। 1917 में स्वर्णिम रथ पर ठाकुरजी को विराजमान कर शोभायात्रा निकाली, जो अब तक होती है। - अशोक गुप्ता, महामंत्री
इस बार शोभायात्रा में दो रथ और कीर्तन मंडली होंगी शामिल
मंदिर कमेटी ने नगर में परंपरागत शोभायात्रा निकालने की प्रशासन से अनुमति मांगी। प्रशासन ने केवल भगवान के दोनों रथ और कीर्तन मंडली के साथ शोभायात्रा निकालने की स्वीकृति दी है। मंदिर कमेटी के पदाधिकारियों ने कहा कि कोविड- 19 की गाइड लाइन का पालन करते हुए झांकी, अखाड़े व बैंडबाजों को शोभायात्रा में प्रतिबंधित किया है।
देवबंद में 32 साल रहे राधा वल्लभ संप्रदाय के संस्थापक श्री हित हरिवंश
देवबंद। राधा वल्लभ संप्रदाय की स्थापना करने वाले श्रीहित हरिवंश 32 साल तक देवबंद में रहे। उन्होंने ही छह साल की आयु में ठाकुर श्री राधा नवरंगी लाल का विग्रह स्थापित किया। यह विग्रह उन्हें खेलते समय कुएं से मिला था, जो आज भी मंदिर में मौजूद है। इसके बाद वह चरथावल में संत आत्मदेव के यहां से राधा वल्लभ का विग्रह प्राप्त करने के बाद वृंदावन पहुंचे और वहां सेवा कुंज में वह विग्रह स्थापित किया था।

देवबंद में स्थित श्री पंचायती ठाकुरद्वारा मंदिर- फोटो : DEVBAND

स्वर्णिम रथ- फोटो : DEVBAND

श्री पंचायती ठाकुरद्वारा मंदिर में विराजमान भगवान श्रीकृष्ण व राधा रानी की भव्य मूर्ति- फोटो : DEVBAND