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सामने मौत का मंजर देखकर कांप उठी थी रूह
ब्यूरो/अमर उजाला, सहारनपुर
Updated Mon, 21 Aug 2017 01:21 AM IST
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ट्रेन हादसे के बारे में बताती उजमा
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
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‘मैं अपनी बहन असमा, बेटे शयान और मौसी करिश्मा के साथ आगरा कैंट से उत्कल एक्सप्रेस में सवार हुई थी। हमें सहारनपुर आना था। मेरठ के पास हम सबने खाना खाया। शयान पास की सीट पर बैठे अन्य बच्चे के साथ अपनी चॉकलेट शेयर कर रहा था।
ट्रेन पूरी स्पीड पर थी। हम जिस कोच में थे, अचानक से तेज झटके के साथ वह कोच सीधा खड़ा हो गया और फिर दूसरे कोच पर टिक गया। एक झटके में मौसी हमारी आंखों के सामने से ओझल हो गई। चीख-पुकार के बीच हमने खुद को संभाला।
कोच के टूटे शीशे से बाहर हाथ निकालकर लोगों को इशारा किया, जिसके बाद लोगों ने हमें बाहर निकाला।’ यह बात घटना के वक्त ट्रेन में सफर कर रही उजमा ने बिलखते हुए बताई। हादसे में उसने अपनी मौसी 70 वर्षीय करिश्मा को खो दिया।
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हादसे में उजमा को भी काफी चोट आई हैं। उसकी बहन असमा भी चोटिल हुई। अमर उजाला से बातचीत में उजमा ने बताया कि वह सभी आरक्षित कोच में थे। माहौल सामान्य था, मगर मेरठ से निकलते ही ट्रेन की जो स्पीड थी। उसे लेकर हम लोग चर्चा कर रहे थे। मैं शायद पहली बार इतनी तेज गति से चल रही ट्रेन में सफर कर रही थी। जैसे ही ट्रेन खतौली के पास पहुंची तो तेज झटके और जोरदार धमाके के साथ कोच सीधा खड़ा हो गया।
देखते ही देखते सामने बैठी मौसी आंखों के सामने से ओझल हो गईं। अन्य यात्री, जो हमसे बात करते आ रहे थे अचानक लाशों में बदल गए। यह पूरा दृश्य देख हमारी रूह कांप उठी। हम समझ नहीं पा रहे थे कि क्या करें।
घायल लोग कराह रहे थे। जो कम घायल थे वह बचाओ-बचाओ चिल्ला रहे थे। झटके की वजह से हमारी बराबर का शीशा टूट गया था। हमने वहीं से बाहर हाथ निकालकर लोगों से बाहर निकालने की गुहार लगाई। लोगों ने हमें किसी तरह बाहर निकाला, मगर मौसी का कुछ पता नहीं था। बाहर आकर हम रोते-बिलखते मौसी को तलाशने लगे। घंटों बाद शवों को बाहर निकाले जाने लगा।
हमारे सामने एक महिला की लाश आई, जिसका शव पहचानने की हालत में नहीं था। कपड़े खून से लथपथ थे। बारीकी से देखने पर हमने कपड़ों से मौसी की पहचान की। घटना की जिक्र करते हुए उजमा बार-बार अपने आंसू पोंछती रही। बताया कि सामने बैठकर बातें करते लोगों को एक झटके में लाश बनता देखना किसी को भी भीतर से हिला देने वाली घटना हो सकती है।
भांजी को लेने गई करिश्मा खुद न लौटी
सहारनपुर। खतौली ट्रेन हादसे में जान गवांने वाली सहारनपुर के मेहंदी निवासी 70 वर्षीय करिश्मा अपनी भांजी उजमा को लेने के लिए उसकी ससुराल आगरा गई थी। शनिवार को भांजी उजमा और असमा तथा चार वर्षीय शयान के साथ उत्कल एक्सप्रेस से लौट रही थी। मगर हादसे ने उसकी जान ले ली। गनीमत रही कि उजमा, असमा और चार वर्षीय शयान सुरक्षित हैं। करिश्मा की मौत से घर में मातम है।
पड़ोसी और रिश्तेदार सांत्वना देने पहुंच रहे हैं। रविवार की दोपहर बाद करिश्मा का शव सहारनपुर पहुंचा। उनके जनाजे में बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए। करिश्मा के पति मोहम्मद इलियास का इंतकाल काफी समय पहले हो चुका है। उनके दो बेटे और तीन बेटियां हैं।
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ट्रेन पूरी स्पीड पर थी। हम जिस कोच में थे, अचानक से तेज झटके के साथ वह कोच सीधा खड़ा हो गया और फिर दूसरे कोच पर टिक गया। एक झटके में मौसी हमारी आंखों के सामने से ओझल हो गई। चीख-पुकार के बीच हमने खुद को संभाला।
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कोच के टूटे शीशे से बाहर हाथ निकालकर लोगों को इशारा किया, जिसके बाद लोगों ने हमें बाहर निकाला।’ यह बात घटना के वक्त ट्रेन में सफर कर रही उजमा ने बिलखते हुए बताई। हादसे में उसने अपनी मौसी 70 वर्षीय करिश्मा को खो दिया।
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हादसे में उजमा को भी काफी चोट आई हैं। उसकी बहन असमा भी चोटिल हुई। अमर उजाला से बातचीत में उजमा ने बताया कि वह सभी आरक्षित कोच में थे। माहौल सामान्य था, मगर मेरठ से निकलते ही ट्रेन की जो स्पीड थी। उसे लेकर हम लोग चर्चा कर रहे थे। मैं शायद पहली बार इतनी तेज गति से चल रही ट्रेन में सफर कर रही थी। जैसे ही ट्रेन खतौली के पास पहुंची तो तेज झटके और जोरदार धमाके के साथ कोच सीधा खड़ा हो गया।
देखते ही देखते सामने बैठी मौसी आंखों के सामने से ओझल हो गईं। अन्य यात्री, जो हमसे बात करते आ रहे थे अचानक लाशों में बदल गए। यह पूरा दृश्य देख हमारी रूह कांप उठी। हम समझ नहीं पा रहे थे कि क्या करें।
घायल लोग कराह रहे थे। जो कम घायल थे वह बचाओ-बचाओ चिल्ला रहे थे। झटके की वजह से हमारी बराबर का शीशा टूट गया था। हमने वहीं से बाहर हाथ निकालकर लोगों से बाहर निकालने की गुहार लगाई। लोगों ने हमें किसी तरह बाहर निकाला, मगर मौसी का कुछ पता नहीं था। बाहर आकर हम रोते-बिलखते मौसी को तलाशने लगे। घंटों बाद शवों को बाहर निकाले जाने लगा।
हमारे सामने एक महिला की लाश आई, जिसका शव पहचानने की हालत में नहीं था। कपड़े खून से लथपथ थे। बारीकी से देखने पर हमने कपड़ों से मौसी की पहचान की। घटना की जिक्र करते हुए उजमा बार-बार अपने आंसू पोंछती रही। बताया कि सामने बैठकर बातें करते लोगों को एक झटके में लाश बनता देखना किसी को भी भीतर से हिला देने वाली घटना हो सकती है।
भांजी को लेने गई करिश्मा खुद न लौटी
सहारनपुर। खतौली ट्रेन हादसे में जान गवांने वाली सहारनपुर के मेहंदी निवासी 70 वर्षीय करिश्मा अपनी भांजी उजमा को लेने के लिए उसकी ससुराल आगरा गई थी। शनिवार को भांजी उजमा और असमा तथा चार वर्षीय शयान के साथ उत्कल एक्सप्रेस से लौट रही थी। मगर हादसे ने उसकी जान ले ली। गनीमत रही कि उजमा, असमा और चार वर्षीय शयान सुरक्षित हैं। करिश्मा की मौत से घर में मातम है।
पड़ोसी और रिश्तेदार सांत्वना देने पहुंच रहे हैं। रविवार की दोपहर बाद करिश्मा का शव सहारनपुर पहुंचा। उनके जनाजे में बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए। करिश्मा के पति मोहम्मद इलियास का इंतकाल काफी समय पहले हो चुका है। उनके दो बेटे और तीन बेटियां हैं।