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बस नाम के बोर्ड ही बदले, हालात नहीं
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जिला अस्पताल स्थित ह्दय रोग विभाग
- फोटो : SAHARANPUR
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सहारनपुर। सरकारी अस्पताल और स्वास्थ्य सेवाएं बेशक आम लोगों का बड़ा सहारा हैं, लेकिन जिले में स्वास्थ्य विभाग वह सुविधाएं मरीजों को नहीं दे पा रहा है, जिसकी जरूरत है। विभाग ने कई प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र को उच्चीकृत कर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र का दर्जा तो दिया, लेकिन वहां स्वास्थ्य सुविधाएं देना भूल गया। उच्चीकृत होकर सीएचसी बने स्वास्थ्य केंद्रों पर आज भी सुविधाएं पीएचसी वाली ही चल रही हैं। उच्चीकृत होकर सीएचसी बने जनपद के स्वास्थ्य केंद्रों की धरातल पर पड़ताल करती अमर उजाला की रिपोर्ट।
सीएचसी जड़ौदा पांडा और सीएचसी अंबेहटा चांद पहले पीएचसी ही थे। दो साल पहले उच्चीकृत कर इन्हें सीएचसी बनाया गया है, लेकिन लोगों को स्वास्थ्य सेवाएं पीएचसी वाली ही मिल रही हैं। दोनों सीएचसी पर एक-एक चिकित्सक और एक-एक फार्मासिस्ट तैनात है। नई इमारतें जरूर बनी हैं, लेकिन एक्स-रे और खून की सामान्य जांच की सुविधा तक नहीं हैं। रोगियों को प्राथमिक उपचार देकर रेफर कर दिया जाता है, क्योंकि भर्ती के लिए बेड तक नहीं हैं। सीएचसी साढ़ौली कदीम भी पहले पीएचसी थी, जिसे उच्चीकृत कर सीएचसी बनाया गया, लेकिन यहां भी हालात पीएचसी वाले ही हैं। यहां प्रतिदिन 100 से 120 मरीज पहुंचते हैं, जिनमें गंभीर मरीज भी शामिल होते हैं, लेकिन मरीज को भर्ती करने की कोई सुविधा नहीं है। यहां मात्र दो चिकित्सक और तीन फार्मासिस्ट तैनात हैं। किसी प्रकार की जांच भी सुविधा नहीं है। चुन्हेटी खड़खड़ी की सीएचसी पर छह में से मात्र दो डॉक्टर हैं। एक्स-रे तक की सुविधा नहीं है। सीएचसी चिलकाना पर भी चिकित्सकों की कमी है। यहां अल्ट्रासाउंड की जांच की सुविधा नहीं। सीएचसी नानौता में भी एक्स-रे और अल्ट्रासाउंड जैसी जांच की सुविधा भी नहीं है।
अंबेहटा पीर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र को पांच साल पूर्व पीएचसी से सीएचसी का दर्जा दे दिया गया था, लेकिन यहां स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं बढ़ाई जा सकी। किसी भी तरह की जांच की यहां नहीं होती। गर्भवती महिलाओं के प्रसव तक की सुविधा यहां नहीं है।
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एसबीडी जिला अस्पताल
बिना कॉर्डियोलॉजिस्ट के चल रहा हृदय रोग विभाग
सहारनपुर। एसबीडी जिला अस्पताल में हृदय रोग विभाग स्थापित है। करीब डेढ़ दशक से संचालित इस विभाग में आज तक कॉर्डियोलॉजिस्ट यानी हृदय रोग विशेषज्ञ की तैनाती नहीं हुई है। कॉर्डियोलॉजिस्ट की जगह मरीजों का इलाज फिजीशियन करते हैं। विभाग में ईसीजी है, लेकिन ईसीजी टेक्नीशियन नहीं है।
ट्रामा सेंटर में आर्थोपैडिक सर्जन नहीं
ट्रामा सेंटर वर्ष 2011 में चालू किया गया था। आपातकालीन सेवा के लिए तैयार ट्रामा सेंटर को खुद इलाज की जरूरत है। यहां आर्थोपैडिक सर्जन की तैनाती नहीं है, जबकि वह बेहद जरूरी होता है। ऐसे में ज्यादातर गंभीर घायलों को प्राथमिक उपचार देकर रेफर कर दिया जाता है।
बिल्डिंग बनी, मशीन नहीं पहुंची
एसबीडी जिला अस्पताल में तीन साल पहले एमआरआई की बिल्डिंग बनाई गई थी। बिल्डिंग में एमआरआई की मशीन स्थापित की जानी थी, लेकिन तीन साल से मशीन का इंतजार हो रहा है। ऐसे में विभाग उक्त बिल्डिंग का इस्तेमाल कोविड टीकाकरण के रूप में कर रहा है।
चिकित्सा सुविधा के मामले में हम काफी बेहतर सेवाएं दे रहे हैं। जिन पीएचसी को उच्चीकृत कर सीएचसी बनाया गया है वहां धीरे धीरे स्वास्थ्य सुविधाएं और चिकित्सक बढ़ाए जा रहे हैं। जहां कमियां हैं वहां के लिए चिकित्सक और सुविधाएं मांगी गई हैं।
डॉ. संजीव मांगलिक, मुख्य चिकित्सा अधिकारी।
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सीएचसी जड़ौदा पांडा और सीएचसी अंबेहटा चांद पहले पीएचसी ही थे। दो साल पहले उच्चीकृत कर इन्हें सीएचसी बनाया गया है, लेकिन लोगों को स्वास्थ्य सेवाएं पीएचसी वाली ही मिल रही हैं। दोनों सीएचसी पर एक-एक चिकित्सक और एक-एक फार्मासिस्ट तैनात है। नई इमारतें जरूर बनी हैं, लेकिन एक्स-रे और खून की सामान्य जांच की सुविधा तक नहीं हैं। रोगियों को प्राथमिक उपचार देकर रेफर कर दिया जाता है, क्योंकि भर्ती के लिए बेड तक नहीं हैं। सीएचसी साढ़ौली कदीम भी पहले पीएचसी थी, जिसे उच्चीकृत कर सीएचसी बनाया गया, लेकिन यहां भी हालात पीएचसी वाले ही हैं। यहां प्रतिदिन 100 से 120 मरीज पहुंचते हैं, जिनमें गंभीर मरीज भी शामिल होते हैं, लेकिन मरीज को भर्ती करने की कोई सुविधा नहीं है। यहां मात्र दो चिकित्सक और तीन फार्मासिस्ट तैनात हैं। किसी प्रकार की जांच भी सुविधा नहीं है। चुन्हेटी खड़खड़ी की सीएचसी पर छह में से मात्र दो डॉक्टर हैं। एक्स-रे तक की सुविधा नहीं है। सीएचसी चिलकाना पर भी चिकित्सकों की कमी है। यहां अल्ट्रासाउंड की जांच की सुविधा नहीं। सीएचसी नानौता में भी एक्स-रे और अल्ट्रासाउंड जैसी जांच की सुविधा भी नहीं है।
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अंबेहटा पीर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र को पांच साल पूर्व पीएचसी से सीएचसी का दर्जा दे दिया गया था, लेकिन यहां स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं बढ़ाई जा सकी। किसी भी तरह की जांच की यहां नहीं होती। गर्भवती महिलाओं के प्रसव तक की सुविधा यहां नहीं है।
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एसबीडी जिला अस्पताल
बिना कॉर्डियोलॉजिस्ट के चल रहा हृदय रोग विभाग
सहारनपुर। एसबीडी जिला अस्पताल में हृदय रोग विभाग स्थापित है। करीब डेढ़ दशक से संचालित इस विभाग में आज तक कॉर्डियोलॉजिस्ट यानी हृदय रोग विशेषज्ञ की तैनाती नहीं हुई है। कॉर्डियोलॉजिस्ट की जगह मरीजों का इलाज फिजीशियन करते हैं। विभाग में ईसीजी है, लेकिन ईसीजी टेक्नीशियन नहीं है।
ट्रामा सेंटर में आर्थोपैडिक सर्जन नहीं
ट्रामा सेंटर वर्ष 2011 में चालू किया गया था। आपातकालीन सेवा के लिए तैयार ट्रामा सेंटर को खुद इलाज की जरूरत है। यहां आर्थोपैडिक सर्जन की तैनाती नहीं है, जबकि वह बेहद जरूरी होता है। ऐसे में ज्यादातर गंभीर घायलों को प्राथमिक उपचार देकर रेफर कर दिया जाता है।
बिल्डिंग बनी, मशीन नहीं पहुंची
एसबीडी जिला अस्पताल में तीन साल पहले एमआरआई की बिल्डिंग बनाई गई थी। बिल्डिंग में एमआरआई की मशीन स्थापित की जानी थी, लेकिन तीन साल से मशीन का इंतजार हो रहा है। ऐसे में विभाग उक्त बिल्डिंग का इस्तेमाल कोविड टीकाकरण के रूप में कर रहा है।
चिकित्सा सुविधा के मामले में हम काफी बेहतर सेवाएं दे रहे हैं। जिन पीएचसी को उच्चीकृत कर सीएचसी बनाया गया है वहां धीरे धीरे स्वास्थ्य सुविधाएं और चिकित्सक बढ़ाए जा रहे हैं। जहां कमियां हैं वहां के लिए चिकित्सक और सुविधाएं मांगी गई हैं।
डॉ. संजीव मांगलिक, मुख्य चिकित्सा अधिकारी।

जिला अस्पताल स्थित ट्रामा सैंटर- फोटो : SAHARANPUR

सामुदायिक स्वस्थ्य केन्द्र सढ़ोली कदीम- फोटो : SAHARANPUR

सामुदायिक स्वस्थ्य केन्द्र जडोदा पांडा- फोटो : SAHARANPUR