{"_id":"6135087c8ebc3eb50202850f","slug":"negligence-is-making-the-malnourished-victims-of-malnutrition-saharanpur-news-mrt5549190190","type":"story","status":"publish","title_hn":"लापरवाही बना रही नौनिहालों को कुपोषण का शिकार","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
लापरवाही बना रही नौनिहालों को कुपोषण का शिकार
विज्ञापन
सहारनपुर। बाल एवं पुष्टाहार विभाग की ओर से विभिन्न योजनाएं और कार्यक्रम चलाने के बाद भी बच्चे कुपोषण का शिकार हो रहे हैं। इसके पीछे बड़ी वजह जागरूकता का अभाव और लापरवाही सामने आई है। जन्म के बाद से ही सही तरह से देखरेख न होने की वजह से नौनिहालों की जान खतरे में पड़ती है।
जनपद में वर्तमान में 20357 कुपोषित और 2746 अत्यंत कुपोषित बच्चे हैं। चार वर्षों में जनपद में कुपोषित बच्चों की संख्या में कमी तो आई है, लेकिन वर्तमान में बड़ी संख्या में नौनिहाल कुपोषण का दंश झेल रहे हैं।
बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. मनदीप सिंह के मुताबिक बच्चे के जन्म से लेकर दो साल की उम्र तक उसके कुपोषण से ग्रस्त होने की संभावना अधिक होती है, जबकि यह समय बच्चे के शरीर के विकास के लिए महत्वपूर्ण होता है। देखा गया है कि बच्चों की देखरेख अच्छी तरह न होने की वजह वह कुपोषण का शिकार होते हैं। कुछ बच्चे जन्म से कुपोषित होते हैं, लेकिन अगर सावधानियां बरतने के साथ ही उन्हें समय पर उपचार और पौष्टिक आहार मिले तो वह छह माह के अंदर कुपोषण मुक्त हो जाएंगे। वहीं, जिला अस्पताल के बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. विरेंद्र भट्ट का कहना है कि अभिभावकों में जागरूकता की कमी देखी गई है, जिस वजह से कुपोषित बच्चों को ठीक होने में समय लगता है। अत्यंत कुपोषित बच्चों को तुरंत उपचार की आवश्यकता होती है, जिनके लिए अस्पताल में बेड भी आरक्षित हैं, लेकिन परिजन बच्चे को भर्ती कराकर उपचार दिलाने से कतराते हैं, जो कुपोषित बच्चे के लिए जीवन के लिए खतरनाक है।
विज्ञापन
कुपोषण के लक्षण
-- बच्चे का वजन नहीं बढ़ता है। जन्म के समय दो किलो से कम बचन वाला बच्चा कुपोषण की श्रेणी में आता है।
-- उम्र बढ़ने के साथ ही बच्चे की लंबाई न बढ़ना।
-- बच्चे में सुस्ती और चिड़चिड़ापन रहना।
-- अति कुपोषित बच्चे बैठ नहीं पाते हैं। खेलकूद में भी उनकी रुचि नहीं होती है।
-- बार-बार अनेक प्रकार की बीमारियों से बच्चे का ग्रस्त होना।
ऐसे करें बचाव
-- जन्म से लेकर दो साल तक बच्चे रोज तीन कप दूध पिलाएं।
-- छह माह की आयु तक बच्चे को मां अपना दूध पिलाए।
-- रोजाना डेढ़ से दो कटोरी दाल व दलिया दिया जाए।
-- मिला जुला अनाज की रोटी बनाकर खिलानी चाहिए।
-- बच्चे को उबला हुआ पानी देना चाहिए। ताकि किसी तरह संक्रमण न फैले।
-- बच्चे को मौसमी फल का सेवन जरूर कराना चाहिए।
वर्ष ----- कुपोषित ---- अति कुपोषित बच्चों की संख्या
2018------41869----------12547
2019------33825-----------6910
2020------21424 ----------5550
2021------20357-----------2746
कुपोषण से बच्चों को बचाने के लिए हर संभव प्रयास किया जाता है। इसके लिए विशेष शिविर भी लगाए जाते हैं। पुष्टाहार का वितरण भी समय पर किया जा रहा है। कई बार अभिभावकों की लापरवाही की वजह से दिक्कत होती है। - आशा त्रिपाठी, जिला कार्यक्रम अधिकारी
विज्ञापन
जनपद में वर्तमान में 20357 कुपोषित और 2746 अत्यंत कुपोषित बच्चे हैं। चार वर्षों में जनपद में कुपोषित बच्चों की संख्या में कमी तो आई है, लेकिन वर्तमान में बड़ी संख्या में नौनिहाल कुपोषण का दंश झेल रहे हैं।
विज्ञापन
बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. मनदीप सिंह के मुताबिक बच्चे के जन्म से लेकर दो साल की उम्र तक उसके कुपोषण से ग्रस्त होने की संभावना अधिक होती है, जबकि यह समय बच्चे के शरीर के विकास के लिए महत्वपूर्ण होता है। देखा गया है कि बच्चों की देखरेख अच्छी तरह न होने की वजह वह कुपोषण का शिकार होते हैं। कुछ बच्चे जन्म से कुपोषित होते हैं, लेकिन अगर सावधानियां बरतने के साथ ही उन्हें समय पर उपचार और पौष्टिक आहार मिले तो वह छह माह के अंदर कुपोषण मुक्त हो जाएंगे। वहीं, जिला अस्पताल के बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. विरेंद्र भट्ट का कहना है कि अभिभावकों में जागरूकता की कमी देखी गई है, जिस वजह से कुपोषित बच्चों को ठीक होने में समय लगता है। अत्यंत कुपोषित बच्चों को तुरंत उपचार की आवश्यकता होती है, जिनके लिए अस्पताल में बेड भी आरक्षित हैं, लेकिन परिजन बच्चे को भर्ती कराकर उपचार दिलाने से कतराते हैं, जो कुपोषित बच्चे के लिए जीवन के लिए खतरनाक है।
विज्ञापन
कुपोषण के लक्षण
-- बच्चे का वजन नहीं बढ़ता है। जन्म के समय दो किलो से कम बचन वाला बच्चा कुपोषण की श्रेणी में आता है।
-- उम्र बढ़ने के साथ ही बच्चे की लंबाई न बढ़ना।
-- बच्चे में सुस्ती और चिड़चिड़ापन रहना।
-- अति कुपोषित बच्चे बैठ नहीं पाते हैं। खेलकूद में भी उनकी रुचि नहीं होती है।
-- बार-बार अनेक प्रकार की बीमारियों से बच्चे का ग्रस्त होना।
ऐसे करें बचाव
-- जन्म से लेकर दो साल तक बच्चे रोज तीन कप दूध पिलाएं।
-- छह माह की आयु तक बच्चे को मां अपना दूध पिलाए।
-- रोजाना डेढ़ से दो कटोरी दाल व दलिया दिया जाए।
-- मिला जुला अनाज की रोटी बनाकर खिलानी चाहिए।
-- बच्चे को उबला हुआ पानी देना चाहिए। ताकि किसी तरह संक्रमण न फैले।
-- बच्चे को मौसमी फल का सेवन जरूर कराना चाहिए।
वर्ष ----- कुपोषित ---- अति कुपोषित बच्चों की संख्या
2018------41869----------12547
2019------33825-----------6910
2020------21424 ----------5550
2021------20357-----------2746
कुपोषण से बच्चों को बचाने के लिए हर संभव प्रयास किया जाता है। इसके लिए विशेष शिविर भी लगाए जाते हैं। पुष्टाहार का वितरण भी समय पर किया जा रहा है। कई बार अभिभावकों की लापरवाही की वजह से दिक्कत होती है। - आशा त्रिपाठी, जिला कार्यक्रम अधिकारी