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थैलेसीमिया सहित कई बीमारियों के इलाज की दवा खत्म
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सहारनपुर। जनपद के सरकारी अस्पतालों के दवा स्टोरों में थैलेसीमिया सहित कई गंभीर बीमारियों के इलाज की दवाएं खत्म हैं। दवाओं की मांग के लिए अधिकारियों द्वारा लखनऊ पत्र लिखे जा रहे हैं, लेकिन कार्पोरेशन से दवाएं नहीं आ रही हैं। ऐसे में मरीजों को बाहर से दवाएं खरीदनी पड़ रही हैं।
एसबीडी जिला अस्पताल में थैलेसीमिया के 112 मरीज पंजीकृत हैं, जिनको खून चढ़ाने से लेकर इलाज तक की पूरी व्यवस्था अस्पताल की ओर से रहती है। मरीजों को खून तो बराबर मिल रहा है, लेकिन बीते करीब दो माह से दवाएं खत्म हैं। थैलेसीमिया के मरीजों के लिए आयरन चिलेटर डिफॉसिरॉक्स नाम की गोली आती है, जो आयरन को बाहर करने का काम करती है, लेकिन कार्पोरेशन से दवा नहीं आने की वजह से स्टोर में दवा खत्म है। ऐसे में मरीजों को मेरठ जाकर जिला अस्पताल से दवाएं लेने की सलाह दी जा रही है। कई मरीज मेरठ जाकर दवा लेने की बजाय निजी स्टोरों से दवा खरीद रहे हैं। इसके अलावा इंसुलिन बीते छह माह से खत्म है। अस्पतालों में चार से पांच प्रकार के इंसुलिन आते हैं, जो नहीं आ रहे हैं। यह दवाएं एनपीसीडीएस प्रोग्राम के तहत आती हैं। इसके लिए भी तीन से चार बार पत्र और रिमाइंडर भेजे जा चुके हैं। अस्पताल में इंसुलिन नहीं मिलने से मरीजों को बाहर से खरीदनी पड़ रही है। इनके अलावा मानसिक रोगियों के लिए रेस्पीरिडॉन इंजेक्शन और फ्लूफेंजाइन डिकोनेट दवा, सांस के मरीजों के लिए इप्राट्रोपियम ब्रोमाइट जैसी दवाएं भी नहीं आ रही हैं।
जीवन रक्षक दवाओं का भी अभाव
सड़क हादसों या अन्य किसी चोट आदि के ऐसे घायल, जिनका खून अत्यधिक बह चुका हो। उनको तुरंत हैमेक्सिल इंजेक्शन दिया जाता है जो खून को गाढ़ा कर उसका थक्का जमा देता है और खून का बहना बंद हो जाता है। यह इंजेक्शन लंबे समय से खत्म है। इसके अलावा घायलों के बीपी को कंट्रोल करने के लिए मैफेटिन नाम का इंजेक्शन दिया जाता है। यह इंजेक्शन भी खत्म है।
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बेहोशी के इंजेक्शन भी खत्म
एसबीडी जिला अस्पताल, जिला महिला अस्पताल आदि में मरीजों की सर्जरी भी होती हैं। बड़ी सर्जरी से पहले मरीज को बेहोश करना पड़ता है, जिसके लिए बूपीविकेनडेक्टॉज नाम का इंजेक्शन दिया जाता है। यह भी कारपोरेशन से नहीं आ रहा है। इसके अलावा कैटामिन आईवी नाम का इंजेक्शन भी आता है यह भी खत्म है।
यह हैं दवाएं आने की व्यवस्था
प्रदेश भर के सरकारी अस्पतालों में दवा की आपूर्ति के लिए लखनऊ में टेंडर छोड़े जाते हैं। वहां से ही जनपदों में दवाओं की आपूर्ति की जाती है। यहां भी लखनऊ से दवाएं आती हैं, जो जनता रोड पर बने ड्रग वेयर हाउस में रखी जाती हैं। यहां से जिला अस्पताल, जिला महिला अस्पताल और अन्य सरकारी अस्पतालों में दवाएं भेजी जाती हैं।
यह दवाएं और इंजेक्शन नहीं
सरकारी अस्पतालों में 287 प्रकार की दवाएं होनी चाहिए, जिनमें से 272 प्रकार की दवाएं ही उपलब्ध हैं। वर्तमान में जो दवाएं उपलब्ध नहीं हैं। उनमें आयरन चिलेटर डिफॉसिरॉक्स टेबलेट, इंसूलिन, हैमेक्सिल और मैफेटिन इंजेक्शन, बूपीविकेनडेक्टॉज इंजेक्शन, कैटामिन आईवी इंजेक्शन, सिफ्टॉजीटिन इंजेक्शन, मेरोपैनम इंजेक्शन, फेनोबार्विटॉन इंजेक्शन, ग्लेसिरिन ट्राइनाइट्रेट, मानसिक रोग के लिए फ्लूफैजाइन, रेस्पीरिडॉन इंजेक्शन, इप्राट्रोपियम ब्रोमाइट आदि दवाएं नहीं हैं।
सरकारी अस्पतालों में कुछ दवाओं की कमी है, जिसके लिए उच्चाधिकारियों को पत्र लिखे गए हैं। हालांकि कभी भी शत-प्रतिशत दवाएं उपलब्ध नहीं रहती हैं, लेकिन दवाओं की कमी से निपटने का उपाय यह है कि लोकल स्तर पर दवाएं खरीद ली जाएं।
डॉ. संजीव मांगलिक, मुख्य चिकित्सा अधिकारी।
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एसबीडी जिला अस्पताल में थैलेसीमिया के 112 मरीज पंजीकृत हैं, जिनको खून चढ़ाने से लेकर इलाज तक की पूरी व्यवस्था अस्पताल की ओर से रहती है। मरीजों को खून तो बराबर मिल रहा है, लेकिन बीते करीब दो माह से दवाएं खत्म हैं। थैलेसीमिया के मरीजों के लिए आयरन चिलेटर डिफॉसिरॉक्स नाम की गोली आती है, जो आयरन को बाहर करने का काम करती है, लेकिन कार्पोरेशन से दवा नहीं आने की वजह से स्टोर में दवा खत्म है। ऐसे में मरीजों को मेरठ जाकर जिला अस्पताल से दवाएं लेने की सलाह दी जा रही है। कई मरीज मेरठ जाकर दवा लेने की बजाय निजी स्टोरों से दवा खरीद रहे हैं। इसके अलावा इंसुलिन बीते छह माह से खत्म है। अस्पतालों में चार से पांच प्रकार के इंसुलिन आते हैं, जो नहीं आ रहे हैं। यह दवाएं एनपीसीडीएस प्रोग्राम के तहत आती हैं। इसके लिए भी तीन से चार बार पत्र और रिमाइंडर भेजे जा चुके हैं। अस्पताल में इंसुलिन नहीं मिलने से मरीजों को बाहर से खरीदनी पड़ रही है। इनके अलावा मानसिक रोगियों के लिए रेस्पीरिडॉन इंजेक्शन और फ्लूफेंजाइन डिकोनेट दवा, सांस के मरीजों के लिए इप्राट्रोपियम ब्रोमाइट जैसी दवाएं भी नहीं आ रही हैं।
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जीवन रक्षक दवाओं का भी अभाव
सड़क हादसों या अन्य किसी चोट आदि के ऐसे घायल, जिनका खून अत्यधिक बह चुका हो। उनको तुरंत हैमेक्सिल इंजेक्शन दिया जाता है जो खून को गाढ़ा कर उसका थक्का जमा देता है और खून का बहना बंद हो जाता है। यह इंजेक्शन लंबे समय से खत्म है। इसके अलावा घायलों के बीपी को कंट्रोल करने के लिए मैफेटिन नाम का इंजेक्शन दिया जाता है। यह इंजेक्शन भी खत्म है।
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बेहोशी के इंजेक्शन भी खत्म
एसबीडी जिला अस्पताल, जिला महिला अस्पताल आदि में मरीजों की सर्जरी भी होती हैं। बड़ी सर्जरी से पहले मरीज को बेहोश करना पड़ता है, जिसके लिए बूपीविकेनडेक्टॉज नाम का इंजेक्शन दिया जाता है। यह भी कारपोरेशन से नहीं आ रहा है। इसके अलावा कैटामिन आईवी नाम का इंजेक्शन भी आता है यह भी खत्म है।
यह हैं दवाएं आने की व्यवस्था
प्रदेश भर के सरकारी अस्पतालों में दवा की आपूर्ति के लिए लखनऊ में टेंडर छोड़े जाते हैं। वहां से ही जनपदों में दवाओं की आपूर्ति की जाती है। यहां भी लखनऊ से दवाएं आती हैं, जो जनता रोड पर बने ड्रग वेयर हाउस में रखी जाती हैं। यहां से जिला अस्पताल, जिला महिला अस्पताल और अन्य सरकारी अस्पतालों में दवाएं भेजी जाती हैं।
यह दवाएं और इंजेक्शन नहीं
सरकारी अस्पतालों में 287 प्रकार की दवाएं होनी चाहिए, जिनमें से 272 प्रकार की दवाएं ही उपलब्ध हैं। वर्तमान में जो दवाएं उपलब्ध नहीं हैं। उनमें आयरन चिलेटर डिफॉसिरॉक्स टेबलेट, इंसूलिन, हैमेक्सिल और मैफेटिन इंजेक्शन, बूपीविकेनडेक्टॉज इंजेक्शन, कैटामिन आईवी इंजेक्शन, सिफ्टॉजीटिन इंजेक्शन, मेरोपैनम इंजेक्शन, फेनोबार्विटॉन इंजेक्शन, ग्लेसिरिन ट्राइनाइट्रेट, मानसिक रोग के लिए फ्लूफैजाइन, रेस्पीरिडॉन इंजेक्शन, इप्राट्रोपियम ब्रोमाइट आदि दवाएं नहीं हैं।
सरकारी अस्पतालों में कुछ दवाओं की कमी है, जिसके लिए उच्चाधिकारियों को पत्र लिखे गए हैं। हालांकि कभी भी शत-प्रतिशत दवाएं उपलब्ध नहीं रहती हैं, लेकिन दवाओं की कमी से निपटने का उपाय यह है कि लोकल स्तर पर दवाएं खरीद ली जाएं।
डॉ. संजीव मांगलिक, मुख्य चिकित्सा अधिकारी।