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67 छात्रों पर भारी पड़ी मेडिकल कॉलेज की गलती
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सहारनपुर। ग्लोकल मेडिकल कॉलेज की गलती की 67 छात्रों और उनके परिवारों को भारी कीमत चुकानी पड़ी है। डॉक्टर बनने का सपना संजोने वाले 67 छात्रों के जीवन के पांच साल बर्बाद हो गए, साथ ही लोन लेकर लाखों रुपये फीस भरने वाले अभिभावक भी ठगे गए हैं।
वर्ष 2016 में नीट पास कर अनेक छात्रों ने ग्लोकल मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस में दाखिला लिया था। 67 छात्र ऐसे थे, जिन्हें कॉलेज ने निजी काउंसिलिंग कर एमबीबीएस में दाखिला दिया था। पहले वर्ष उनकी कक्षाएं चलीं और परीक्षा भी हुई। मगर दूसरे वर्ष पढ़ाई व्यवस्था ठप हो जाने की वजह से विद्यार्थी सड़कों पर आए थे। उन्होंने कॉलेज स्थानांतरित कराने की मांग को लेकर करीब 20 दिन तक धरना प्रदर्शन किए थे। साथ ही कैंडल मार्च तक निकाला था। इनमें से 24 छात्रों को अन्य कॉलेज में स्थानांतरित कर दिया गया था, मगर करीब 67 छात्रों को ग्लोकल मेडिकल कॉलेज में ही रखा गया था। ऐसे छात्रों ने कॉलेज बदलने की मांग को लेकर कोर्ट में भी याचिका दायर की तो, पता चला कि कॉलेज ने छात्र छात्राओं का रजिस्ट्रेशन ही नहीं कराया था, इसका ब्योरा एमसीआर (मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया) के पास भी नहीं था। यानी तभी तय हो गया था कि दाखिले फर्जी हैं। मगर छात्र और उनके परिवार न्याय की उम्मीद कर रहे थे। मगर सुप्रीम कोर्ट ने भी अब उनके दाखिले को अवैध बताया और छात्रों की याचिका को खारिज कर दिया। इस मामले में छात्रों के साथ जो भी हुआ है उसके लिए एक ओर जहां कॉलेज जिम्मेदार है, वहीं छात्रों और उनके अभिभावकों की नासमझी भी कम जिम्मेदार नहीं है।
प्रबंधक पर दर्ज कराई गई थी रिपोर्ट
ग्लोकल मेडिकल कॉलेज के प्रबंधक मोहम्मद वाजिद के खिलाफ एमसीआई के मानकों को पूरा नहीं करने, निर्धारित से अधिक फीस वसूलने और परीक्षा से वंचित रखने के आरोप में सितंबर 2019 में रिपोर्ट दर्ज कराई गई थी। छात्र छात्राओं द्वारा प्रदर्शन करने के बाद तत्कालीन जिलाधिकारी आलोक कुमार पांडेय ने उपजिलाधिकारी बेहट और सीएमओ को जांच सौंपी थी। इसके बाद सीएचसी बेहट प्रभारी डॉक्टर नितिन कंडवाल की तहरीर पर मिर्जापुर थाने में यह रिपोर्ट दर्ज हुई थी।
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ग्लोकल यूनिवर्सिटी के रजिस्ट्रार निजामुद्दीन का कहना है कि यह मेरी तैनाती से पहले का मामला है, उस वक्त में यहां नहीं था। सुप्रीम कोर्ट ने दाखिले के संबंध में क्या आदेश किया है, उसकी कॉपी मिलने पर ही कुछ कहा जा सकेगा। कॉलेज में नियमानुसार ही दाखिले किए जा रहे हैं।
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वर्ष 2016 में नीट पास कर अनेक छात्रों ने ग्लोकल मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस में दाखिला लिया था। 67 छात्र ऐसे थे, जिन्हें कॉलेज ने निजी काउंसिलिंग कर एमबीबीएस में दाखिला दिया था। पहले वर्ष उनकी कक्षाएं चलीं और परीक्षा भी हुई। मगर दूसरे वर्ष पढ़ाई व्यवस्था ठप हो जाने की वजह से विद्यार्थी सड़कों पर आए थे। उन्होंने कॉलेज स्थानांतरित कराने की मांग को लेकर करीब 20 दिन तक धरना प्रदर्शन किए थे। साथ ही कैंडल मार्च तक निकाला था। इनमें से 24 छात्रों को अन्य कॉलेज में स्थानांतरित कर दिया गया था, मगर करीब 67 छात्रों को ग्लोकल मेडिकल कॉलेज में ही रखा गया था। ऐसे छात्रों ने कॉलेज बदलने की मांग को लेकर कोर्ट में भी याचिका दायर की तो, पता चला कि कॉलेज ने छात्र छात्राओं का रजिस्ट्रेशन ही नहीं कराया था, इसका ब्योरा एमसीआर (मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया) के पास भी नहीं था। यानी तभी तय हो गया था कि दाखिले फर्जी हैं। मगर छात्र और उनके परिवार न्याय की उम्मीद कर रहे थे। मगर सुप्रीम कोर्ट ने भी अब उनके दाखिले को अवैध बताया और छात्रों की याचिका को खारिज कर दिया। इस मामले में छात्रों के साथ जो भी हुआ है उसके लिए एक ओर जहां कॉलेज जिम्मेदार है, वहीं छात्रों और उनके अभिभावकों की नासमझी भी कम जिम्मेदार नहीं है।
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प्रबंधक पर दर्ज कराई गई थी रिपोर्ट
ग्लोकल मेडिकल कॉलेज के प्रबंधक मोहम्मद वाजिद के खिलाफ एमसीआई के मानकों को पूरा नहीं करने, निर्धारित से अधिक फीस वसूलने और परीक्षा से वंचित रखने के आरोप में सितंबर 2019 में रिपोर्ट दर्ज कराई गई थी। छात्र छात्राओं द्वारा प्रदर्शन करने के बाद तत्कालीन जिलाधिकारी आलोक कुमार पांडेय ने उपजिलाधिकारी बेहट और सीएमओ को जांच सौंपी थी। इसके बाद सीएचसी बेहट प्रभारी डॉक्टर नितिन कंडवाल की तहरीर पर मिर्जापुर थाने में यह रिपोर्ट दर्ज हुई थी।
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ग्लोकल यूनिवर्सिटी के रजिस्ट्रार निजामुद्दीन का कहना है कि यह मेरी तैनाती से पहले का मामला है, उस वक्त में यहां नहीं था। सुप्रीम कोर्ट ने दाखिले के संबंध में क्या आदेश किया है, उसकी कॉपी मिलने पर ही कुछ कहा जा सकेगा। कॉलेज में नियमानुसार ही दाखिले किए जा रहे हैं।