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कपासा में बच्चों पर जैट्रोफा का कहर
ब्यूरो/अमर उजाला, सहारनपुर
Updated Mon, 18 Jan 2016 12:52 AM IST
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नागल क्षेत्र के गांव कपासा में जैट्रोफा के बीज खाने से चार बच्चों की हालत बिगड़ गई। इनमें से तीन को जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया। इन बच्चों ने गांव के मंदिर के पास ही खेल खेल में जहरीले फल खा लिए थे। तबियत बिगड़ने के बाद ग्रामीण उन्हें अस्पताल लेकर पहुंचे। यहां उपचार के बाद उनकी हालत में सुधार है।
जिला अस्पताल में भर्ती बच्चों के साथ पहुंचे राजपाल, मनोज कुमार सहित अन्य ग्रामीणों ने बताया कि गांव में एक मंदिर के पास ही कई बच्चे खेल रहे थे। यहां खेल रहे कुछ बच्चों को अचानक उल्टी लगनी शुरू हो गई जबकि कुछ में बेचैनी के लक्षण रहे।
काफी देर तक तो यह समझ में नहीं आया कि उन्हें क्या हो गया है। हालत बिगड़ने के बाद रितिक (4) राजपाल, निशा (4) एवं गोलू (5) पुत्र पलट सिंह और आस्था (4) पुत्री मनोज को पहले तो गांव में ही पानी और मीठा आदि खिलाकर ठीक करने की कोशिश की गई। बाद में उनमें से तीन को उन्हें जिला अस्पताल लाना पड़ा।
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जबकि आस्था की हालत में गांव में ही सुधार हो गया। ग्रामीणों का कहना है कि बाद में उन्हें पता चला कि बच्चों की यह हालत मंदिर के पास खड़े जैट्रोफा के बीज खाने के कारण हुई है। जिला अस्पताल की प्रमुख अधीक्षक डा. आशा शर्मा ने बताया कि बच्चों को समय पर अस्पताल लाने से उनकी हालत में सुधार है।
उनकी ओर से ग्रामीणों को सलाह दी गई कि बच्चों के खेलने या पढ़ने के स्थानों के आसपास ऐसे पौधे नहीं रखे जाएं। उन्हें उखाड़ दिया जाए। भर्ती किए गए बच्चों की उम्र पांच से सात साल के बीच है।
जहरीले बीजों के पहले भी शिकार हो चुके हैं बच्चे
नागल के गांव कपासा से पहले भी जैट्रोफा के जहरीले बीजों के कारण बच्चों की जान पर बनी है। इससे पहले मुजफ्फराबाद, रामपुर मनिहारान, सरसावा और नकुड़ ब्लॉकों के गांवों से दर्जनों बच्चों की हालत बिगड़ चुकी है। अज्ञानता की वजह से बच्चे इसके बीज खा लेते हैं और उनकी हालत बिगड़ जाती है।
जैट्रोफा के फायदे और नुकसान
पर्यावरणविद् डा. एसके उपाध्याय बताते हैं कि जैट्रोफा लगभग 170 प्रजातियों की वनस्पतियों का समूह है। इसमें झाड़ियां और पौधे शामिल हैं। इसके पौधे भारत के अलावा उत्तरी अमेरिका, अफ्रीका और कैरेबियन क्षेत्रों में पाए जाते हैं। इसे रतनजोत, जंगली अरंडी, बंगरेड जैसे नामों से भी जाना जाता है।
इसके पौधे में कई टॉक्सिंग कंपाउंड होते हैं जिनकी वजह से इनके बीज मानव खासकर बच्चों को नुकसान पहुंचाते हैं। इनके बीज खाने से जी मिचलाना, उल्टी आना, बेसुध होना, बेचैनी बढ़ना और अधिक बीज खाने से कोमा में चले जाने तक की स्थिति आ सकती है।
इस नुकसान के अलावा जैट्रोफा बड़े काम का भी है। यह भूक्षरण को रोकता है। इसकी पत्तियों से भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ती है। इसके बीजों से तेल निकलने के बाद जो खली बचती है, वह उच्चकोटि का जैविक खाद है। यह जानवरों को खिलाया जा सकता है। बायो डीजल जैसे उत्पाद इससे मिलते हैं। कई तरह के कीट भी इससे दूर भागते हैं। इसके फूल और तने का इस्तेमाल कुछ औषधियों के लिए किया जाता है।
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जिला अस्पताल में भर्ती बच्चों के साथ पहुंचे राजपाल, मनोज कुमार सहित अन्य ग्रामीणों ने बताया कि गांव में एक मंदिर के पास ही कई बच्चे खेल रहे थे। यहां खेल रहे कुछ बच्चों को अचानक उल्टी लगनी शुरू हो गई जबकि कुछ में बेचैनी के लक्षण रहे।
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काफी देर तक तो यह समझ में नहीं आया कि उन्हें क्या हो गया है। हालत बिगड़ने के बाद रितिक (4) राजपाल, निशा (4) एवं गोलू (5) पुत्र पलट सिंह और आस्था (4) पुत्री मनोज को पहले तो गांव में ही पानी और मीठा आदि खिलाकर ठीक करने की कोशिश की गई। बाद में उनमें से तीन को उन्हें जिला अस्पताल लाना पड़ा।
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जबकि आस्था की हालत में गांव में ही सुधार हो गया। ग्रामीणों का कहना है कि बाद में उन्हें पता चला कि बच्चों की यह हालत मंदिर के पास खड़े जैट्रोफा के बीज खाने के कारण हुई है। जिला अस्पताल की प्रमुख अधीक्षक डा. आशा शर्मा ने बताया कि बच्चों को समय पर अस्पताल लाने से उनकी हालत में सुधार है।
उनकी ओर से ग्रामीणों को सलाह दी गई कि बच्चों के खेलने या पढ़ने के स्थानों के आसपास ऐसे पौधे नहीं रखे जाएं। उन्हें उखाड़ दिया जाए। भर्ती किए गए बच्चों की उम्र पांच से सात साल के बीच है।
जहरीले बीजों के पहले भी शिकार हो चुके हैं बच्चे
नागल के गांव कपासा से पहले भी जैट्रोफा के जहरीले बीजों के कारण बच्चों की जान पर बनी है। इससे पहले मुजफ्फराबाद, रामपुर मनिहारान, सरसावा और नकुड़ ब्लॉकों के गांवों से दर्जनों बच्चों की हालत बिगड़ चुकी है। अज्ञानता की वजह से बच्चे इसके बीज खा लेते हैं और उनकी हालत बिगड़ जाती है।
जैट्रोफा के फायदे और नुकसान
पर्यावरणविद् डा. एसके उपाध्याय बताते हैं कि जैट्रोफा लगभग 170 प्रजातियों की वनस्पतियों का समूह है। इसमें झाड़ियां और पौधे शामिल हैं। इसके पौधे भारत के अलावा उत्तरी अमेरिका, अफ्रीका और कैरेबियन क्षेत्रों में पाए जाते हैं। इसे रतनजोत, जंगली अरंडी, बंगरेड जैसे नामों से भी जाना जाता है।
इसके पौधे में कई टॉक्सिंग कंपाउंड होते हैं जिनकी वजह से इनके बीज मानव खासकर बच्चों को नुकसान पहुंचाते हैं। इनके बीज खाने से जी मिचलाना, उल्टी आना, बेसुध होना, बेचैनी बढ़ना और अधिक बीज खाने से कोमा में चले जाने तक की स्थिति आ सकती है।
इस नुकसान के अलावा जैट्रोफा बड़े काम का भी है। यह भूक्षरण को रोकता है। इसकी पत्तियों से भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ती है। इसके बीजों से तेल निकलने के बाद जो खली बचती है, वह उच्चकोटि का जैविक खाद है। यह जानवरों को खिलाया जा सकता है। बायो डीजल जैसे उत्पाद इससे मिलते हैं। कई तरह के कीट भी इससे दूर भागते हैं। इसके फूल और तने का इस्तेमाल कुछ औषधियों के लिए किया जाता है।