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सांप्रदायिक सौहार्द का प्रतीक बनेगा इंटीग्रेटेड सर्किट

Thu, 15 Oct 2020 12:06 AM IST
Meerut Bureau मेरठ ब्यूरो
Updated Thu, 15 Oct 2020 12:06 AM IST
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Integrated circuit will be a symbol of communal harmony
हाजी शाह कमाल की दरगाह। - फोटो : SAHARANPUR
सहारनपुर। जिला प्रशासन ने स्मार्ट सिटी योजना के तहत बाबा लाल दास मार्ग पर इंटीग्रेटेड सर्किट बनाने का निर्णय लिया है। खास बात यह है कि इस सर्किट में एक ओर जहां फुलवारी आश्रम का मंदिर होगा, वहीं हाजी शाह कमाल की दरगाह भी रहेगी। यानी यह स्थल केवल आध्यात्मिक या पर्यटन का स्थल ही नहीं होगा, बल्कि सांप्रदायिक सौहार्द का प्रतीक भी बनेगा। इसके अलावा पांवधोई नदी और उसके आसपास का प्राकृतिक सौंदर्य भी इसकी सुंदरता को बढ़ाएगा। खास बात यह है कि इंटीग्रेटेड सर्किट में आने वाले उक्त स्थलों का अपना इतिहास है, इसमें बाबा लाल दास और हाजी शाह कमाल की दोस्ती भी शामिल है। पेश है रिपोर्ट।
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बाबा लाल दास और हाजी शाह कमाल
बाबा लाल दास और हाजी शाह कमाल में गहरी दोस्ती थी। लाल दास सूर्योदय से पहले हर दिन हरिद्वार जाते और गंगा स्नान कर लौट आते थे। एक बार हाजी शाह ने बाबा से पूछा कि आप हर रोज गंगा के लिए हरिद्वार जाते हैं। क्या गंगा आपके लिए यहां नहीं आ सकती। बताते हैं कि उस समय बाबा मौन रहे, लेकिन अगले दिन जब वह गंगा के लिए गए, तो वहां उन्होंने मां गंगा से प्रार्थना की। मां गंगा से बाबा लाल दास ने कहा - मां अगर मैं सच्चे मन से आपका सेवक हूं और आप इस सेवक पर कृपा रखती हैं तो कल आप मेरी कुटिया पर आकर दर्शन देना। माना जाता है कि पांवधोई नदी का उद्गम बाबा लाल दास की तपस्या से ही हुआ है।
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शाहजहां भी हुए थे बाबा के मुरीद
कुछ लोगों ने मुगल सम्राट शाहजहां के दरबार में बाबा की शिकायत कर दी। शाहजहां ने अपने सिद्ध फकीर हाजी शाह कमाल को सही बात का पता लगाने के लिए भेजा। हाजी शाह कमाल कुटिया पर पहुंचे और उनसे पानी पीने की इच्छा जाहिर की। बाबा कमंडल का मीठा जल शाह कमाल पीते रहे और बाबा पिलाते रहे। न तो कमंडल का जल खत्म हो रहा था और न हाजी शाह कमाल की प्यास बुझ रही थी। हाजी शाह बाबा से इतने प्रभावित हुए कि कुटिया के पास ही अपना आसन जमा लिया। शाह जब दरबार में वापस नहीं लौटे तो फिर कुछ लोगों ने शाहजहां के कान भरे। इसके बाद शाहजहां ने बाबा की हकीकत जानने के लिए खुद सहारनपुर आने का फैसला किया। एक दिन शाहजहां अपने सिपाहियों के साथ बाबा के आश्रम में पहुंचे। बाबा की हकीकत जानने के बाद शाहजहां भी उनके मुरीद हो गए थे।
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फुलवारी आश्रम की महत्ता
फुलवारी आश्रम आजादी के मतवालों की शरण गाह व नमक आंदोलन का गवाह बना था। आज भी आश्रम में उन दिनों की स्मृतियां हैं। 1913 के लगे वृक्ष व मंदिर परिसर में हर रोज लगने वाला अखाड़ा आजादी के दीवानों की यादें ताजा करता है। लालता प्रसाद अख्तर ने 1919 में गोरक्षा और सामाजिक सुधार की शपथ लेकर हिंदू कुमार सभा की स्थापना की। इसी बीच उन्होंने फुलवारी आश्रम में अपने साथियों के साथ रक्षा बंधन पर एक मेला भी शुरू किया था। फरारी के दिनों में शहीद ए आजम भगत सिंह भी फुलवारी आश्रम में बने मंदिर की गुंबद में रहे थे।

बाबा लालदास का बाड़ा स्थित पांवधोई नदी घाट।

बाबा लालदास का बाड़ा स्थित पांवधोई नदी घाट।- फोटो : SAHARANPUR

फुलवारी आश्रम का गेट।

फुलवारी आश्रम का गेट।- फोटो : SAHARANPUR

फुलवारी आश्रम।

फुलवारी आश्रम।- फोटो : SAHARANPUR

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