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इतिहास समेटे हुए है सहारनपुर की जामा और शाहजहांनी मस्जिद 

Sat, 01 Jun 2019 11:54 PM IST
Prag Gupta ब्यूरो, सहारनपुर
ब्यूरो, सहारनपुर Published by: Prag Gupta Updated Sat, 01 Jun 2019 11:54 PM IST
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histrory of jama and sahajani maszid in saharanpur
सहारनपुर की जामा मस्जिद। - फोटो : अमर उजाला
सहारनपुर। पवित्र रमजान महीने में चारों तरफ खुदा की रहमतों की बरसात हो रही है। अल्लाह की इबादत का यह एक ऐसा खास मौका है, जब मस्जिदों का नूरानी मंजर देखने वाले के दिल पर अलग ही छाप छोड़ता है। वैसे तो महानगर सभी मस्जिदों की अपनी एक अलग कहानी है, लेकिन इनमें शहर की प्रमुख चौक फव्वारा स्थित वक्फ जामा मस्जिद कला वक्फ नंबर 374/1 और खानआलमपुरा के लाला वाला बाग में ढमोला नदी के किनारे बनी बादशाही शाहजहांनी मस्जिद अपने इतिहास समेटे हुए है, जो गंगा-यमुना बीच बसे सहारनपुर को देश में अलग ही पहचान दिलाती हैं। 
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- ऐसे हुई थी जामा मस्जिद की स्थापना 
सहारनपुर। 1857 से पूर्व चौकी सराय में एक छोटी मस्जिद होती थी, जिसे आईनों वाली मस्जिद कहा जाता है। तब यहां आसपास के लोग नमाज पढ़ने आते थे। बताते हैं कि दिल्ली के मौलाना अब्दुल रब का सहारनपुर आना हुआ था तो नमाजियों की बढ़ती संख्या को देखते हुए उन्होंने चौक फव्वारा पर 1857 में जामा मस्जिद की नींव रखी थी। इसी के साथ उन्होंने दिल्ली में एक मदरसे का निर्माण शुरू कराया था। 
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- दिल्ली की जामा मस्जिद से मेल खाता है नक्शा 
सहारनपुर। चौक फव्वारा स्थित जामा मस्जिद की नक्शा काफी हद तक दिल्ली की जामा मस्जिद से मिलता है। दिल्ली की जामा मस्जिद की तरह ही यहां भी दक्षिण, उत्तर और पूरब दिशा में मस्जिद के द्वार हे। बताते हैं कि 1857 में चंदे के पैसे अब्दुल रब ने मस्जिद की जमीन का बैनामा कराया था और धीरे-धीरे आसपास बने मकानों को खरीदकर 20 हजार वर्ग फीट में मस्जिद निर्माण कराया, तब यहां एक तालाब भी हुआ करता था।  
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- 16 साल में कार्य हुआ था पूरा, अब्दुल्ला की नक्काशी के मुरीद हैं लोग  
सहारनपुर। जामा मस्जिद का निर्माण कार्य 16 साल में पूरा हुआ था। इस काम की जिम्मेदारी मोहल्ला शाहबहलोल निवासी मिस्त्री अब्दुल्ला को दी गई थी, तब चूने की दीवारों से मस्जिद का निर्माण किया और दीवारों पर ऐसी नक्काशी की थी, जिसे देखकर वर्तमान में बड़े-बड़े इंजीनियर में हैरान रह जाते हैं। इसके साथ ही पेंटिंग बनाई थी, जो आज भी मस्जिद के इतिहास को बयां कर रही है। यह मस्जिद दो खंडों में विभाजित है। पहला हिस्सा नौ वर्ष में बनकर पूरा हुआ था, जो सात हजार वर्ग फीट में बना है। इसमें नमाजियों की सात सफें बैठती हैं। इसके बाद अगला हिस्सा 13 हजार वर्ग फिट में बना है। इसके निर्माण में सात वर्ष लगे थे। मस्जिद के प्रबंधक मौलवी फरीद बताते हैं मस्जिद का इतिहास काफी पुराना है। उन्होंने वर्ष 1993 में उन्होंने प्रबंधक का पदभार संभाला था। तब से वह मस्जिद की खिदमत करते आ रहे हैं। दिल्ली के मौलाना अब्दुल रब ने मस्जिद की नींव रखी थी। मस्जिद देश आजादी की लड़ाई की भी गवाह है। 1857 में बाजार शहीदगंज आजादी के परवानों का मरकज था। इसकी मिसाल मस्जिद के दक्षिण गेट पर बनी मजार से है, यह हजरत मियां अल्लहादाद का मजार है, जो आजादी की लड़ाई में शहीद हुए थे। यहां पर आने वाले व्यक्ति की मुराद पूरी होती है। 
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- फौज के साथ डाला पड़ाव, नदी किनारे बनाई थी शाहजहांनी मस्जिद 
सहारनपुर। मोहल्ला खानआलमपुरा के लालावाला बाग स्थित बादशाही शाहजहांनी मस्जिद की स्थापना मुगलशासक शाहजहां ने कराई थी। बताते हैं कि मुगलशासन काल में जो भी मस्जिदें बनी हैं, वह सभी नदी किनारे हैं। ताकि नमाजी नदी के साफ जल से वुजू कर सकें। मोहल्ला खानआलपुरा निवासी स्टाफ ऑफिसर सिविल डिफेंस मोहम्मद यूनुस बताते हैं कि बादशाह शाहजहां के वजीर ने फौज के साथ शाहजहांनी मस्जिद के पास 16वीं सदी में पड़ाव डाला था। फौज को नमाज पढ़ने के लिए स्थान मिल सके। इसलिए शाहजहां ने 16वीं सदी में शाहजहांनी मस्जिद की स्थापना की थी।
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- 1933 में हुआ था पुन: निर्माण 
सहारनपुर। खानआलमपुरा निवासी शाहजहांनी मस्जिद की प्रबंध कमेटी के सदस्य क्यू एस सिद्दीकी बताते हैं कि मस्जिद का पुन: निर्माण 1933 में कराया गया था। मस्जिद का इतिहास बहुत पुराना है। किसी जमाने में ढमोला नदी का पानी बेहद साफ और स्वच्छ होता था। मस्जिद ढमोला नदी किनारे ही बनी है, तब लोग इस नदी के पानी से ही वुजू करते थे। मस्जिद करीब 350 साल पुराना है। यह मस्जिद सहारनपुर को देश में अलग पहचान दिलाती है। 

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- कश्मीरियों वाली सहित सभी मस्जिदों का एक अपना इतिहास 
सहारनपुर। जामा मस्जिद और शाहजहांनी मस्जिद के अलावा महानगर की सभी प्रमुख मस्जिदों का अपना एक अलग इतिहास है। इन्हीं में स्टार पेपर मिल के निकट कश्मीरियों वाली मस्जिद है। मस्जिद की मार्केट में घड़ी की दुकान करने वाले इरफान बताते हैं कि पेपर मिल में कश्मीर के कर्मचारी काम करते थे, जिन्होंने 1964 में इस मस्जिद का निर्माण कराया था। इसीलिए इस मस्जिद को कश्मीरियों वाली मस्जिद कहा जाता है। इसके अलावा महानगर की मस्जिद शेखों वाली, मस्जिद दर्जियान लक्खी गेट प्रथम, मस्जिद घंटाघर, मस्जिद अंसारियान, मस्जिद मालियान, मस्जिद मंगलो वाली देहरादून चौक, पुरानी जामा मस्जिद चूड़ी बाजार, मस्जिद ख्वाजा वाली चौकी सराय, मस्जिद हलवाईयान नखासा बाजार, मस्जिद किले वाली, मस्जिद लिंक रोड, मस्जिद बड़ी सराय, मस्जिद कमंगारान नखासा बाजार, मस्जिद चौकी सराय, मस्जिद शाहबिलोल, मस्जिद जालवाली शाह विलायत, मस्जिद शिराजा, मस्जिद खिरनी वाली किशनपुरा भी अपने पहलू में इतिहास समेटे हुए है। 
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