सहारनपुर। हिंदी दिवस के अवसर पर अमर उजाला फाउंडेशन की मुहिम हिंदी हैं हम के तहत विभावरी संस्था की ओर से ऑनलाइन काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया। इस दौरान कवियों ने एक से बढ़कर एक रचना प्रस्तुत की।
विनोद भृंग ने पढ़ा - हिंदी हैं हम तो सारे, हिंदी से प्यार कीजे, हिंदी में आज ही से सब पत्राचार कीजे, हो जाए शीघ्रता से विकसित हमारी भाषा, ऐसा प्रयास मिलकर अब बार बार कीजे। डाक्टर विजेंद्रपाल शर्मा ने कोरोना के परिप्रेक्ष्य में याहिया छंद पढ़ा, अनुशासन मत खोना, खुद सिर पटकेगा, फिर वहशी कोरोना। कवि नरेंद्र मस्ताना ने पढ़ा, जिस पथ से भी हम गुजरेंगे उस पथ में फूल खिला देंगे, हम भारत मां के शूरवीर दुश्मन को धूल चटा देंगे। डॉ. आरपी सारस्वत ने पढ़ा, यों ही कहां बड़ा बन जाता है बैठे ढाले, बिना करे कुछ कब खुलते हैं किस्मत के ताले, आंखों में अरमानों को ले सोना पड़ता है, कुछ पाने के लिए बहुत कुछ खोना पड़ता है। हरिराम पथिक ने पढ़ा, आपस में संवाद जरूरी है भावों का अनुवाद जरूरी है, पथिक ने भौतिकवाद अमन देखा जीना छायावाद जरूरी है। सुरेश सपन ने शहीदों के प्रति पढ़ा, सबसे प्यारा रंग तुम्हारे पावनतम बलिदान का, वीर बांकुरों तुम्हें नमन है सारे हिंदुस्तान का। बालेश्वर जैन ने पढ़ा, यह जो भारत माता के माथे की बिंदी है, उतनी ही प्यारी हम सबको भाषा हिंदी है। काव्य गोष्ठी की अध्यक्षता विभावरी संस्था के अध्यक्ष बालेश्वर कुमार जैन और संस्था के सचिव डाक्टर विजेंद्रपाल शर्मा ने संचालन किया।